सरकारी खर्च पर धर्म को बढ़ावा लोकतंत्र-विरोधी

संपादकीय
7 अप्रैल 2016

महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने वहां पर भाजपा-प्रशासित म्युनिसिपल द्वारा एड्स को रोकने के लिए करवाए जा रहे हनुमान-चालीसा पाठ को लेकर कड़ी फटकार लगाई है, और कहा है कि क्या भारत सिर्फ हिन्दुओं का है? धर्म को लेकर सरकार का इस्तेमाल भारत में कोई नई बात नहीं है, और नेहरू के बाद से देश की कई सरकारें, और कई प्रदेशों की सरकारें धर्म को सिर पर बिठाए चली आ रही हैं। पुराने लोगों को याद होगा कि जब पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से ब्राम्हणों के पैर धोने का काम किया तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इससे असहमति जाहिर करते हुए नाराजगी जताई थी। लेकिन इंदिरा गांधी के आने के बाद धीरेन्द्र ब्रम्हचारी से लेकर देवरहा बाबा तक, और अनगिनत मंदिर-दरगाहों तक प्रधानमंत्री और सत्ता पर बैठे बाकी लोगों का जाना-आना लगे रहा। निजी आस्था को सार्वजनिक प्रदर्शन का सामान बनाया गया, और फिर उसे सरकारी खर्च से किए जाने लगा।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम हज यात्रा के लिए केन्द्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी सहित किसी भी धर्म पर होने वाले सरकारी खर्च के खिलाफ लिखते आए हैं। सरकारी बंगलों पर सरकारी खर्च से रमजान के दौरान होने वाली इफ्तार दावतों के खिलाफ भी हमने लिखा है। लेकिन वोटों की राजनीति में जनता को बहलाए रखने के लिए राजनीतिक दल और नेता धर्म से बेहतर और कोई तरीका नहीं जानते, और ऐसे बहलाने के लिए सरकारी फिजूलखर्च से बेहतर भला और कौन सा तरीका हो सकता है? लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश में जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री निवास में एक मंदिर बनवाया, बल्कि मुख्यमंत्री दफ्तर की सरकारी मेज पर किसी हिन्दू देवी-देवता की प्रतिमा भी फूलों से लदी हुई सजा दी थी। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग धर्म के दबदबे, और उनके लोगों की बहुतायत को देखते हुए यह सिलसिला चलते रहता है। इसलिए अब जब नागपुर में एड्स की जागरूकता के लिए, या एड्स की रोकथाम के लिए जब एक विशाल सार्वजनिक कार्यक्रम में हनुमान चालीसा का पाठ करवाया जा रहा है, तो अदालत चाहे इस पर नाराजगी जाहिर करे, राजनीतिक दलों में वामपंथियों को छोड़कर भला और किसका यह नैतिक अधिकार बचा हुआ है कि वे विरोध कर सकें?
राजनीति और धर्म का घालमेल अपने आपमें जानलेवा है, और जब इसमें सरकारी खर्च की सुविधा और जुट जाती है तो फिर भला क्या बचता है। लेकिन अदालतों का सकारात्मक आलोचना का यह रूख ही देश को बचा सकता है। एक धर्म पर सरकारी खर्च की देखादेखी से फिर दूसरे धर्मों की उम्मीदें जागेंगी, और कुपोषण के शिकार इस देश में भूखे बच्चों के दूध को प्रतिमाओं पर बहाया जाएगा। सरकार को हर धर्म से दूर रहना चाहिए, बजाय इसके कि वह हर धर्म को खुश रखने को खर्च करके अपने आपको धर्मनिरपेक्ष साबित करे। सब पर खर्च करके धर्मनिरपेक्ष साबित करने के बजाय किसी भी धर्म पर कुछ भी खर्च किए बिना धर्मनिरपेक्ष साबित करना बेहतर है, और वही सही है। फिर इन दिनों तो देश में जिस तरह से सत्तारूढ़ पार्टी अपनी पसंद के धर्म को खुलकर बढ़ावा दे रही है, और उस रंग को ओढ़कर सरकारी खर्च पर आस्था का प्रदर्शन कर रही है, वह लोकतंत्र के बिल्कुल ही खिलाफ है। 

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