फोन में पैनिक-बटन तो ठीक है, लेकिन इसका नाम कुछ और रखा जाए

संपादकीय
26 अप्रैल 2016
एक-एक कर दुनिया के कई देशों में मोबाइल फोन पर एक पैनिक-बटन जोड़ा जा रहा है जिससे किसी भी खतरे की नौबत आने पर महज एक बटन दबाकर पुलिस और घरवालों तक खबर भेजी जा सके, और इन दिनों आम हो चले फोन-लोकेशन की वजह से सबको फोन की जगह भी खबर के साथ मिल जाएगी। नए टेलीफोन ऐसी बटनों के साथ आ रहे हैं, और पुराने फोन पर भी कोई रास्ता निकालकर मौजूदा किसी बटन के साथ ऐसी सुविधा जोड़ी जा रही है। भारत में भी कुछ महीनों बाद सारे फोन ऐसे ही आने लगेंगे, क्योंकि जनवरी 2017 से यह शर्त सरकार लागू कर रही है, और बाजार उसके पहले ही यह कर चुका होगा।
टेक्नॉलॉजी अपने साथ कई तरह की सुविधाएं लाती हैं, और खतरों से बचने का रास्ता निकलता है। फोन पर ऐसी सुविधा की बात भारत में तब से हो रही है जबसे बलात्कार की कुछ घटनाओं के बाद देश विचलित हुआ, और नए कानून का बनना शुरू हुआ। लेकिन ऐसी नौबत के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि पैनिक-बटन दबाते हुए किसी जिन्न या किसी ईश्वर की तरह मदद नहीं पहुंच जाएगी, वह समय तो लेगी ही, और तब तक जो खतरे में हैं, उन्हें अपने-आप ही नौबत से निपटना होगा। अब इस नई तकनीकी-सहूलियत का नाम पैनिक-बटन रखा गया है, और इस शब्द का मतलब होता है घबराहट, आतंक, दहशत में पडऩा। जबकि किसी भी मुसीबत में फंसे हुए लोगों को बाहर से मदद के पहले की सलाह में यही कहा जाता है कि पैनिक मत होओ। मतलब यह कि घबराओ मत, दहशत में मत पड़ो, आतंक के शिकार मत होओ, क्योंकि बाहरी मदद जब तक आएगी, तब तक तो खुद ही निपटना है। और दहशत में पड़े हुए लोग अपनी खुद की कोई मदद नहीं कर सकते।
भाषा का बड़ा असर होता है। भारत में ट्रकों और बसों के पीछे लिखा होता है- हॉर्न प्लीज। कुछ अलग-अलग इलाकों में इसके लिए आवाज दो, या भोंपू बजाओ भी लिखा जाता है। आज भारत में सड़कों पर जितना बुरा ध्वनि प्रदूषण है, उसे देखते हुए अब यह विचार चल रहा है कि हॉर्न प्लीज शब्द को लिखने पर रोक लगाई जाए, क्योंकि उस शब्द से लोग बिना जरूरत भी हॉर्न बजाते चलते हैं। भाषा का मकसद कुछ होता है, लेकिन उसका असर जरूरी नहीं है कि वहीं तक सीमित रहता हो। एक वक्त जिन्हें बलात्कार की शिकार लिखा जाता था, उनके लिए पिछले कुछ समय से रेप-विक्टिम के बजाय रेप-सर्वाइवर, यानी बलात्कार से उबरकर, जीतकर निकली, ऐसी शब्दावली इस्तेमाल हो रही है। इसका मकसद यह है कि बलात्कार का शिकार होने के बाद ऐसी लड़की या महिला बाकी जिंदगी ऐसी भाषा का शिकार भी न होती जाए।
इसके अलावा भी दुनिया के बोलचाल से धीरे-धीरे ऐसे शब्द खत्म किए जा रहे हैं जो कि अपमानजनक हैं, या कि लोगों का हौसला पस्त करते हैं। चमड़े और जूतों का काम करने वाले लोगों की जाति को चमार लिखा जाता था, और उनके पेशे को भी। लेकिन जैसे-जैसे समाज में जागरूकता आई, वैसे-वैसे लोगों को समझ आया कि यह भाषा जाति-व्यवस्था को बताने के साथ-साथ अपमान के हथियार की तरह भी इस्तेमाल हो रही है, तो उसे खत्म किया गया, और भारतीय कानून में इसके लिए सजा जोड़ी गई।
इसलिए भाषा सिर्फ एक शब्द नहीं होती है, उस शब्द के प्रचलित और गूढ़ दोनों किस्म के शब्दों के साथ जुड़ी हुई सामाजिक परिभाषाएं  भी देखी जाती हैं। इसीलिए एक वक्त गांधी ने दलितों के लिए जो शब्द, हरिजन, शुरू किया था, उसे दलित समुदाय ने खारिज कर दिया, और उसे अब सरकारी और अदालती कामकाज से पूरी तरह हटा दिया गया है। अब उसकी जगह अनुसूचित जाति ही लिखा जाता है। और सामाजिक लेखन में इस तबके के लिए दलित शब्द लिखा जाता है, और हो सकता है कि कुछ बरस बाद इस शब्द को भी खारिज कर दिया जाए।
शब्दों के साथ जुड़ी मानसिकता को ध्यान में रखना चाहिए। अभी तो पैनिक-बटन शुरू होने को है, इसके लिए कोई और शब्द छांटना चाहिए, क्योंकि ऐसा शब्द जो कि खुद ही दशहत सुझाए, वह हिम्मत नहीं दे सकता, हौसला पस्त ही कर सकता है।

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