भवन निर्माण कबाड़ निपटाने सरकार जनभागीदारी बढ़ाए

संपादकीय
8 अप्रैल 2016

केन्द्र सरकार ने देश में भवन निर्माण सामग्री के निपटारे के लिए कड़े नियम बनाए हैं। आज शहरों में हालत यह है कि सरकारी और निजी, सभी तरह के निर्माण जब टूटते हैं, या उनमें कोई मरम्मत होती है, तो ढेरों कांक्रीट और बाकी सामान निकलकर सड़कों के किनारे पड़े रहते हैं, और म्युनिसिपल उन्हें कचरे की तरह ढोने के लिए मजबूर होती है। फिर यह भी होता है कि शहर के बाहर ऐसे कचरे के लिए बनाए गए बड़े-बड़े मैदानों पर जब कांक्रीट-ईंट जैसे सामान भी जाकर मिल जाते हैं, तो उनका किसी तरह का निपटारा नहीं हो सकता। एक दूसरी बात यह कि निर्माण सामग्री का कचरा पैदा करने वाले लोग अगर नियमों के मुताबिक उसके निपटारे के लिए जिम्मेदार रहें, तो उसमें से बहुत सा सामान दुबारा भी इस्तेमाल हो सकता है, और ऐसा होने पर धरती पर रेत निकालने जैसे दूसरे काम घट भी सकते हैं। सामान की री-साइकिलिंग से नए सामान के इस्तेमाल में कमी आती है और धरती पर बोझ घटता है। लेकिन पर्यावरण को बचाने की ऐसी तरकीबें लोगों पर कुछ महंगी पड़ती हैं, क्योंकि उनको निर्माण-कबाड़ के निपटारे के लिए कुछ खर्च भी करना पड़ेगा। आज तो लोग एक ट्रक मलबा भी ले जाकर घूरे पर फेंक देते हैं, और म्युनिसिपल उसे अपने खर्च पर उठाने पर भी मजबूर रहती है, और बाहर ट्रेंचिंग ग्राऊंड पर जाकर वह हमेशा के लिए बोझ बन जाता है, उसका कचरे से कोई बिजली भी नहीं बन सकती, उसका कोई और इलाज भी नहीं हो सकता।
दरअसल पर्यावरण को बचाने और प्रदूषण को घटाने की सारी तरकीबें कारखानों से लेकर घरों तक शुरू में महंगी पड़ती हैं, और इसीलिए लोग उससे कतराते हैं, और सरकारें लोगों को नाराज करने से बचती हैं। यही वजह है कि कारखानों की चिमनियां काला धुआं उगलती दिखती हैं, और पर्यावरण के नियम कागजों में दबे रह जाते हैं। भारत में जहां पर कि सरकारी अमला सीमित है, वहां पर ऐसे नियम लागू करने के लिए एक जनभागीदारी विकसित की जानी चाहिए। आज जब लोग बात-बात पर फोन पर तस्वीरें खींचकर दुनिया भर में भेज देते हैं, तो राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं के अफसरों को ऐसे फोन नंबर और ऐसी वेबसाईटें बनानी चाहिए जिन पर लोग भवन निर्माण सामग्री के कचरे की तस्वीर भेज सकें, और सरकार पर से निगरानी का बोझ कुछ घटे। जो शहर अधिक विकसित हैं, वहीं पर ऐसा भवन-कबाड़ बढ़ता है, और वहां की संपन्नता इसके निपटारे की ताकत भी रखती है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इन नियमों को कड़ाई से लागू करे, और जनभागीदारी बढ़ाई जाए।

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