असुरक्षित धरती पर कोई सुरक्षित टापू संभव नहीं

संपादकीय
22 अप्रैल 2016
आज 22 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस मनाया जाता है, और धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए, धरती को बचाने के लिए दुनिया भर में कार्यक्रम होते हैं। लेकिन एक दिक्कत यह है कि पर्यावरण को कुछ शहरी या औद्योगिक चीजों से जोड़कर देखा जाता है, और उससे परे के खतरे अनदेखे रह जाते हैं। अभी दो दिन तक दिल्ली में सेंटर फॉर साईंस एंड एनवॉयरमेंट में वायु प्रदूषण पर एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम किया जिसमें कई देशों के जानकार शामिल हुए, और भारत के अलग-अलग हिस्सों में जनता के बीच काम करने वाले लोग भी शामिल हुए। इस संपादक को भी दो दिनों की इस बहस को सुनने का मौका मिला, और उससे तस्वीर का एक पहलू उभरकर सामने आया।
वायु प्रदूषण के भारत के आंकड़े यह बताते हैं कि जिन शहरों में प्रदूषण नापा जा रहा है, वह सिर्फ उन्हीं शहरों का न होकर, आसपास के कई गांवों को जोड़कर बने हुए एक बड़े इलाके का प्रदूषण रहता है, जो कि हवा के झोंकों से और दूर-दूर तक सफर करता है या फैलता है। गांवों का यह प्रदूषण मोटे तौर पर घरेलू चूल्हों से उपजता है जो कि एक तरफ तो हवा में धुआं छोड़ते हैं, दूसरी तरफ वे खाना पकाने वाली घरेलू महिला और उसी छोटे घर में रहने वाले बच्चों के फेंफड़ों को छलनी भी करते चलते हैं। भारत में दशकों से इस मुद्दे पर काम करने वाले एक अमरीकी वैज्ञानिक का यह निष्कर्ष है कि दुनिया में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले लकड़ी या कोयले के चूल्हे ऐसी अकेली सबसे बड़ी वजह हैं जिनसे कि इंसानों की सेहत को सबसे अधिक और सबसे बुरा नुकसान पहुंचता है। उनका मानना है कि धरती और हवा के प्रदूषण के साथ-साथ सेहत को होने वाला यह नुकसान सबसे अधिक महंगा है। लेकिन शहरी गाडिय़ों के प्रदूषण और कारखानों के प्रदूषण से परे इस घरेलू या ग्रामीण प्रदूषण की तरफ अधिक ध्यान नहीं जाता है।
गांवों से आने वाला प्रदूषण दो और वजहों से भी होता है, जंगल की आग, जो कि कई बार वनोपज इक_ा करने के लिए लोग लगा देते हैं, और दूसरी तरफ फसल के बाद खेतों में लगाई गई आग, या आग तापने के लिए फसल के बचे हुए हिस्से या पत्तों को जलाने से निकला हुआ धुआं। वैज्ञानिक परीक्षण बताते हैं कि किसी शहर को आसपास के दायरे से काटकर सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। सरहदें प्रदूषण के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं, इसलिए पर्यावरण को सुधारने के लिए, हवा को साफ रखने के लिए लोगों को आसपास के सौ-पचास किलोमीटर के दायरे को साथ-साथ सुधारने की योजना बनानी पड़ेगी, उसके बिना केवल शहर या औद्योगिक क्षेत्रों को सुधारने से कोई बात बनने वाली नहीं है।
यह बात कुछ उसी तरह की है जिस तरह धरती के नीचे के भूजल को किसी एक जगह नहीं बढ़ाया जा सकता है, या साफ नहीं किया जा सकता है। धरती के नीचे पानी इतनी दूर-दूर तक सफर करता है कि किसी एक जगह का प्रदूषण सौ-पचास किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है, और किसी एक जगह गहरे नलकूप से निकाला गया पानी आसपास के कई किलोमीटर के भूजल को खींच सकता है। इसके साथ-साथ एक यह संभावना भी बनती है कि धरती में आसमानी पानी को वापिस डालने की तरकीबें अगर बड़े पैमाने पर की जाएं, तो उससे दूर-दूर तक सैकड़ों किलोमीटर तक भी भूजल स्तर सुधर सकता है।
आज जो लोग महंगे और साफ-सुथरे दिखते इलाकों में बैठकर सोचते हैं कि उनकी सेहत को प्रदूषण से कोई खतरा नहीं है, उन्हें यह जानना चाहिए कि सेंटर फॉर साईंस एंड एनवॉयरमेंट ने अपनी दायर की हुई एक जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के जज के सामने प्रदूषण नापने का मीटर लगा दिया था और दिन भर नाप-नापकर उन्हें थोड़ी-थोड़ी देर में यह बताया था कि दिल्ली के सबसे साफ इलाके की इस एयर कंडीशंड अदालत के भीतर भी कितना प्रदूषण है। इसलिए लोग चाहे कितने ही संपन्न या ताकतवर न हों, वे अपने लिए एक सुरक्षित हवा-पानी का टापू नहीं पा सकते। वे उतने ही सुरक्षित रह सकते हैं जितने कि उनके आसपास के शहर या गांव हैं। आज की यह पूरी बातचीत पृथ्वी दिवस पर सिर्फ हवा और पानी के दो मुद्दों को छू रही है, धरती को प्रभावित करने वाली बाकी बातों को एक साथ यहां पर लिखना मुमकिन नहीं है। लेकिन जब लोगों में जागरूकता आएगी तो वह सिर्फ हवा-पानी के लिए नहीं आएगी, वह जिंदगी और धरती की हर बात के लिए आएगी। फिलहाल आज जरूरत यह है कि अपने आपको अकेले सुरक्षित मान लेने और सोच लेने से परे इस वैज्ञानिक तथ्य को माना जाए कि असुरक्षित धरती पर कोई सुरक्षित टापू संभव नहीं है।

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