जितने भ्रष्ट पकड़ाते हैं, उनसे हजार गुना अनछुए रह जाते हैं

संपादकीय
9 अप्रैल 2016

छत्तीसगढ़ में आज सुबह से एंटीकरप्शन ब्यूरो के छापे कई शहरों में कई विभागों के अफसरों पर पड़ रहे हैं, और अभी तक मिली पहली जानकारी के मुताबिक एक अफसर के घर से तकिये के खोल में डालकर बाहर फेंके जाते 35 लाख रूपए नगद भी पकड़ा गए हैं। वैसे तो पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ के अफसरों पर पड़े छापे देखते हुए 35 लाख की यह रकम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन राज्य के लिए यह नौबत सोचने की बात जरूर है कि सरकार का भ्रष्टाचार विरोधी अमला हजार में से एक किसी पर ही छापा डाल पाता है, और बाकी लोगों के भ्रष्टाचार के बाद सरकारी खजाने में बचता क्या होगा?
एक तरफ तो हर बरस बजट किसी हिरण की तरह छलांग लगाते हुए आगे बढ़ता है, और दसियों हजार करोड़ रूपए एक-एक विभाग को मिलते हैं। फिर लोगों को लगता है कि जनता की दिक्कतें दूर क्यों नहीं हो रही हैं? राजधानी से परे, गौरवपथों से परे, बाकी जगह बदहाली क्यों हैं, क्यों मजदूरों को सैकड़ों करोड़ की मजदूरी देना बकाया है? जिन निर्माण विभागों के तहत काम होते हैं, वहां पर भ्रष्टाचार का रेट बच्चे-बच्चे को मालूम रहता है, किस कुर्सी की कितनी कमाई रहती है, वह दफ्तर के बाबू से लेकर ठेकेदार के मुंशी तक को पता रहता है। अफसरों के तबादलों में लेन-देन का रेट भी सबको पता रहता है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक इतना छोटा अमला बनाया गया है जो कि हजार में से एक भ्रष्ट पर भी हाथ डालने की क्षमता नहीं रखता। इसलिए भ्रष्ट अफसरों पर होती ऐसी कार्रवाई को लेकर खुश होने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह समझने की जरूरत है कि जिस भ्रष्ट पर छापा पड़ रहा है, उसकी बराबरी के ओहदों पर कितने और लोग बाकी हैं जिन पर छापा नहीं पड़ा है।
छत्तीसगढ़ सरकार मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद भी भ्रष्टाचार से अलग नहीं हो पाई है। इस राज्य में नेता, अफसर, और ठेकेदार अरबपति होते जा रहे हैं, और मनरेगा जैसी मजदूरी में लगे हुए मजदूरों को महीनों से रोजी नहीं मिली है। लोगों के बीच नाराजगी का अंदाज सत्ता को अभी नहीं है, इसलिए कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी का कोई बेहतर और विश्वसनीय विकल्प चुनाव में सामने नहीं आ पा रहा है, और विपक्ष के भीतर आपसी खरीदी-बिक्री से तश्तरी पर रखकर सत्ता के हाथ में जीत दे दी जाती है। नतीजा यह है कि सत्ता और सत्तारूढ़ पार्टी को भ्रष्टाचार से थकी हुई जनता के दिल-दिमाग की हालत का अंदाज ही नहीं है।
हम पहले भी ऐसे कई मौकों पर यह लिखते आए हैं कि हजारों अफसरों के भ्रष्टाचार के बाद कुछ गिने-चुने पर कार्रवाई होने तक भ्रष्ट कमाई का एक फीसदी भी पकड़ में आने के लिए नहीं बचता। छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध की रोकथाम के लिए एक निगरानी एजेंसी बनानी चाहिए जो खुफिया निगरानी से समय रहते भ्रष्टाचार की जानकारी सरकार को देकर उसे पहले ही रोके, और यह जानकारी बाद में एसीबी जैसी एजेंसी की छापामारी के लिए भी काम आ सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार का भ्रष्टाचार रोकने का रिकॉर्ड एकदम ही कमजोर है, और हम देश के दूसरे राज्यों से यहां पर तुलना करना नहीं चाहते, क्योंकि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे कई राज्य अभी भी हैं जहां पर भ्रष्टाचार दिखाई नहीं पड़ता है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपने बचे हुए कार्यकाल में अपना रिकॉर्ड दुरूस्त करना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें