स्कूलों में दूध के बाद मौतों से डरने की नहीं, जांच की जरूरत

संपादकीय
31 मई  2016
बस्तर के स्कूलों में दूध पीने के बाद दो बच्चों की मौत डराने वाली है। हम इस पर लिखते हुए यह सावधानी बरत रहे हैं कि इसे दूध पीने की वजह से हुई मौत नहीं बता रहे, क्योंकि यह बात तो सिर्फ पोस्टमार्टम या प्रयोगशाला की जांच से सामने आ सकती है। लेकिन एक अच्छा काम जो कि शुरू हुआ है, उसके खतरे सामने आ रहे हैं। और चूंकि प्रदेश में दसियों लाख बच्चे रोज दोपहर का भोजन स्कूलों में पाते हैं, इसलिए इस बारे में बहुत बड़ी सावधानी की जरूरत भी है।
लंबे समय से देश का संगठित कारोबार यह कोशिश कर रहा था कि स्कूलों का दोपहर का भोजन पकाकर न खिलाया जाए, और उसकी जगह बिस्किट खिला दिए जाएं। जब अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री थे तब उनकी बेटी ने मंत्रालय के एक बड़े अफसर से मिलकर बिस्किट निर्माता संघ की वकालत की थी, और वह बात फाईलों पर आ भी गई थी। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक एक बड़ा अभियान चलाया था, और देश के दसियों करोड़ बच्चों को बिस्किटों से बचाया था। तब से लेकर अब तक गांव-गांव तक स्कूलों में बच्चों को गर्म खाना मिलता है, और बहुत सी जगहों पर इससे जाति व्यवस्था भी टूट रही है क्योंकि खाना पकाने वाली महिला किसी जाति की होती है, और खाने वाले बच्चे सभी जातियों के होते हैं। इसके बाद दोपहर के भोजन को लेकर एक नई बहस शुरू हो रही है जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को कहा जा रहा है कि वे बच्चों की पौष्टिक जरूरतों के लिए हफ्ते में कुछ दिन उन्हें अंडा भी खिलाएं। लेकिन दूसरी तरफ कुछ शुद्धतावादी ताकतें इसके खिलाफ हैं, और मध्यप्रदेश में इसे लेकर एक राजनीतिक बहस भी चल रही है जहां भाजपा सरकार घोषित रूप से इसके खिलाफ है। छत्तीसगढ़ में अभी यह बात मुद्दा नहीं बनी है।
इस राज्य में अभी कुछ हफ्ते पहले ही स्कूली बच्चों को दूध देने के लिए राज्य के दुग्ध महासंघ के साथ शासन  ने यह कार्यक्रम शुरू किया था, और इसमें यह हादसा हो गया। यह बात सही है कि पैकेटबंद दूध में बहुत दूर के गांवों तक इतनी गर्मी में पहुंचते हुए खराब हो सकता है, लेकिन इस एक हादसे से इस योजना को खत्म नहीं करना चाहिए बल्कि इसकी जांच करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि बच्चों को दूध मिल सके, और दूध खराब होने से पहले मिल सके। हमको याद है कि आज से पचास बरस पहले इस राज्य की स्कूलों में यूनिसेफ की तरफ से आए दूध पावडर को उबालकर उससे दूध बनाकर बच्चों को पिलाया जाता था, और विटामिन की गोली भी दी जाती थी। अब शासन और दुग्ध महासंघ को यह देखना है कि क्या दूर के इलाकों में दूध की जगह दूध पावडर भेजना सेहत के फायदे का होगा और अधिक व्यावहारिक भी होगा? जो भी हो एक तरीका ऐसा निकालना चाहिए कि बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना-पीना मिल सके जिससे छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढिय़ां कुपोषण से निकलें।

इंसान की बेइंसाफ जुबान, जानवर से इंसान तक जारी

30 मई 2016

अभी कुछ दिन पहले बिहार की एक बच्ची की तस्वीर आई जिसमें एक जेनेटिक गड़बड़ी की वजह से उसकी आंखें बाहर निकली हुई दिखती थीं। नतीजा यह था कि उसे स्कूल के दूसरे बच्चे मेढकी कहकर इस कदर चिढ़ाते थे कि उसने स्कूल जाना बंद कर दिया। अब उसकी हसरत तो है एक डॉक्टर बनकर इस बीमारी का इलाज ढूंढने की ताकि ऐसे दूसरे बच्चे तकलीफ न पाएं, दूसरे बच्चों की यातना का शिकार न हों, लेकिन जब स्कूल में ही बच्चे उसका जाना मुश्किल कर चुके हैं, तो मेडिकल कॉलेज भला पहुंचे भी तो कैसे।
लेकिन दुनिया के देशों के सभ्य होने का यह एक सबसे बड़ा पैमाना है कि वहां पर कमजोर लोगों के साथ कैसा बर्ताव होता है। रूपए-पैसे से कमजोर, रूप-रंग से कमजोर (माने जाने वाले), देह की ताकत से कमजोर, इम्तिहान में नंबरों से कमजोर, ऐसे कई किस्म के लोगों के साथ बाकी लोगों का बर्ताव बताता है कि वह समाज कितना सभ्य है। आमतौर पर किसी देश को उसके शहरी ढांचे से, उसकी अर्थव्यवस्था से, आसमान को छूती इमारतों से विकसित मान लिया जाता है, लेकिन विकास का यह एक बहुत ही सतही और कम अहमियत वाला पैमाना है। विकास का असल पैमाना है कि वहां के लोगों में अपनी जिम्मेदारी और दूसरों के हक को लेकर कितनी जागरूकता है। भारत जैसे देश में अगर देखें तो लगभग तमाम लोगों की लगभग तमाम जागरूकता दूसरों की जिम्मेदारी और अपने हक को लेकर होती है।
भारत की जुबान जो कि हजारों बरस से चली आ रही है, ऐसी गजब की बेइंसाफी से भरी हुई है कि उसके बारे में लिखते हुए हम कभी थकते नहीं हैं। यहां की आज की खड़ी बोली कही जाने वाली हिन्दी से परे भी जो लोकभाषाएं हैं, क्षेत्रीय बोलियां हैं, यहां का जो पुराना साहित्य है, लोकोक्तियां और कहावत-मुहावरे हैं, वे सबके सब कमजोर लोगों पर हमला करने वाले हैं। सबसे पहले तो देखें कि इंसानी बिरादरी अपनी आधी आबादी, औरतों को लेकर जिस जुबान का इस्तेमाल करती है, उससे वहां पर महिलाओं की बदहाली का अंदाज लगता है।
कहने के लिए तो भारत देवियों की पूजा करने वाला देश है, लेकिन यह देवियां जब तक मिट्टी या पत्थर की प्रतिमाओं में कैद रहती हैं, तभी तक उनकी पूजा होती है, और इस कैद से बाहर निकलते ही महिलाओं को मारना शुरू हो जाता है। अब महिलाओं के बारे में अपमानजनक जुबान पहले शुरू हुई, या उनका अपमान पहले शुरू हुआ यह तो पहले मुर्गी या पहले अंडे जैसी बात है। लेकिन औरत को बदचलन कहना, उसके पति खोने को उसका जुर्म मान लेना, उसे सती होने के लायक करार देना, उसे लात-घूंसों के लायक समझना जैसी बातें भारत की जुबानों में बड़ी आम हैं। हो सकता है कि एक वक्त सामाजिक बेइंसाफी को देखते हुए यह जुबान बनी हो, लेकिन आज इस बेइंसाफी के खिलाफ कानूनी इंतजाम के बावजूद यह जुबान गई नहीं है। आज भी कदम-कदम पर महिलाओं को जींस से लेकर मोबाइल फोन तक से रोका जाता है, और अंधेरे के बाद घर के बाहर निकली महिला को अनिवार्य रूप से बदचलन, और बलात्कार का न्यौता बांटते घूमने वाली मान लिया जाता है।
लेकिन लोगों की सोच में बेइंसाफी कतरे-कतरे में नहीं आती, एकमुश्त आती है, या एकमुश्त जाती है। भारत की जुबानों की ही हमको अधिक समझ है इसलिए यहीं की बात करना ठीक है। यहां हिन्दी से परे भी कई क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में कमजोर लोगों के लिए जितनी हिकारत है, उसका सदियों का इस्तेमाल लोगों को उस हिकारत को न्यायसंगत और तर्कसंगत मनवाने लगता है। अब इंसानों के लिए ही इस्तेमाल होने वाले कुछ शब्दों को देखें, तो जिसके पैरों में दिक्कत है उसे लंगड़ू कहना, जिसके हाथ कटे हैं या नहीं हैं, उसे ठुठवा कहना, जिसके कान कमजोर हैं, उसे भैरा (बहरा) कहना, जिसकी चमड़ी पर काले-सफेद दाग हैं उसे कबरा (चितकबरा)कहना, जो अधिक गोरा है उसे भुरवा कहना, जिसकी रीढ़ की हड्डी में दिक्कत है उसे कुबड़ा कहना, जिसे देखने में दिक्कत हो उसे अंधड़ा कहना, कद कम हो तो बठवा, दुबला हो तो सुकड़ू कहना भारत में आम चलन में है, और जब तक अपने खुद के घरवाले इनमें से किसी किस्म की दिक्कत न झेल रहे हों, तब तक तकरीबन तमाम लोग धड़ल्ले से इन बातों का इस्तेमाल करते हैं।
किसी के रंग को लेकर, जिस पर कि उसका कोई बस नहीं हो सकता, उसे काली-कलूटी कहना, दांत आड़े-तिरछे हों, तो उसे खेबड़ा कहना बड़ी आम बात है। और इसके साथ-साथ लोगों की आर्थिक स्थिति को देखकर उसे फटीचर कहना, दो कौड़ी का कहना, सड़कछाप कहना भी हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा है।
लेकिन इसके साथ-साथ जिस तरह की हिकारत हमारे मन में जानवरों को लेकर है, उसके खत्म हुए बिना इंसानों के लिए हिकारत अलग से खत्म नहीं हो सकते। हिन्दी और इससे जुड़ी हुई बोलियों में हजारों ऐसी कहावतें हैं जिनमें इंसान के सबसे वफादार जानवर-साथी, कुत्ते के लिए गालियां हैं। यहां तक कि शाकाहारी इंसान भी गाली देते हुए कुत्ते का खून पीने की बात कहते हैं, दूसरों को कुत्ते की मौत मरने की दुआ देते हैं, किसी की हरकतों को बहुत ही कुत्ती कहकर गाली देते हैं, और यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। इंसान से अधिक अहसानफरामोश कोई नस्ल नहीं है क्योंकि यह सबसे अधिक मेहनत करने वाले प्राणी को गधा या बैल कहकर गाली देती है। अब मान लो गधा इंसान का लादा बोझ लेकर भाग निकलता, और किसी ट्रक ड्राइवर की तरह बाजार में बेचकर चल निकलता तो शायद इंसान गधे को मूर्ख कहना बंद करता। लेकिन जब तक गधा इंसान को धोखा नहीं दे रहा है, वह गालियों का ही हकदार है। ऐसी नाजायज सोच वाले इंसान अपनी इस सोच के चलते ही बाकी इंसानों के लिए भी नाजायज समझ विकसित कर लेते हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे आगे बढ़ाते चलते हैं।
हैरानी इस बात की है कि इंसानों या बाकी प्राणियों में भी जो वफादार हैं, और जो मेहनतकश हैं, उनको गालियों का हकदार मान लिया जाता है। इस सोच के बारे में सोचने की जरूरत है, जुबान को बेइंसाफी से परे लाने की जरूरत है, अहिंसक बनाने की जरूरत है।

सरकारी अस्पताल बिगडऩे देकर निजी को बढ़ावा...

संपादकीय
30 मई  2016
मध्यप्रदेश के इंदौर में सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन और नाइट्रस ऑक्साईड के अलग-अलग गैस पाईपों में किसी गलतफहमी की आशंका है और दो बच्चों की मौत हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि ऑक्सीजन की जगह यह दूसरी गैस उनको दे दी गई। इस मामले की जांच हो रही है, लेकिन हम मध्यप्रदेश से परे छत्तीसगढ़ को देखते हैं तो सरकारी अस्पतालों की बदहाली के किस्सों से यहां के अखबार रोज ही रंगे रहते हैं। किस तरह कहीं मशीनें खराब रहती हैं, कहीं लाशों को भी छूने के लिए वसूली की जाती है, कहीं दवाइयां घटिया या नकली खरीदी जाती हैं, और किस तरह प्रदेश भर के सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं। अगर अखबारों में छपी खबरों पर ही सरकार रोज के रोज जांच करके चीजों को सुधारने की कोशिश करती, तो भी राज्य बनने के बाद से अब तक तस्वीर बदल चुकी होती। लेकिन इस डेढ़ दशक में सरकारी खर्च तो इलाज के ढांचे पर बढ़ते चले गया है, लेकिन सुधार नहीं आया है। दूसरी तरफ सरकार ने गरीबों के इलाज के लिए उनको एक स्वास्थ्य बीमा कार्ड दिया है जिससे निजी अस्पतालों में भी उनका इलाज हो सकता है, और प्रदेश भर में एम्बुलेंस का एक ढांचा खड़ा किया है जिससे किसी जख्मी या बीमार को, या किसी मां बनने वाली महिला को तेजी से अस्पताल या स्वास्थ्य केन्द्र तक पहुंचाया जा सकता है। इससे मरीज के अस्पतालों तक जाना तो आसान हो गया है, निजी अस्पतालों में इलाज भी संभव हो गया है, लेकिन सरकार अपने ढांचे को सुधार नहीं पाई है। इस प्रदेश में नकली मशीनों से लेकर नकली दवाओं तक का कारोबार सरकारी खरीदी पर पनपते रहता है, और निजी अस्पताल बिना जरूरत गरीबों का इलाज करके, उनका गर्भाशय निकालकर उनके स्मार्ट कार्ड से दसियों हजार रूपए पाते रहते हैं, लेकिन इलाज की बुनियादी सरकारी व्यवस्था को सरकार बिल्कुल भी नहीं सुधार पा रही है।
आज ही छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े, राजधानी के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कैंसर के इलाज की एक करोड़ों की मशीन शुरू होने जा रही है, लेकिन इसके बाद भी सरकारी मदद से, सरकारी खर्च से हर बरस हजारों लोग निजी अस्पतालों में कैंसर के इलाज के लिए जाते हैं। प्रदेश के बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में जिन ऑपरेशनों की सहूलियत है, या होनी चाहिए, उनके लिए सरकार निजी अस्पतालों को हर बरस हजारों करोड़ रूपए दे रही है। इसमें सरकार के अपने अमले का इलाज भी शामिल है। यह नौबत देखकर लगता है कि कुछ लोगों की यह आशंका शायद पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है कि जान-बूझकर भी सरकारी इंतजाम को खराब रखा जाता है ताकि निजी अस्पतालों का कारोबार अधिक चल सके। इसमें सरकार के किस स्तर पर साजिश होती है, और कौन-कौन लोग शामिल होते हैं, यह अंदाज लगाना मुश्किल है, लेकिन जो सरकार राशन के गली-गली तक के इंतजाम को सुधार सकती है, वह सरकार अपने गिने-चुने मेडिकल कॉलेज-अस्पतालों को क्यों नहीं सुधार सकती, यह कोई बड़ा रहस्य नहीं लगता।
धीरे-धीरे करके सरकार पढ़ाई और इलाज जैसी अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को छोड़ती जा रही है, और सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, महंगे निजी स्कूल बढ़ रहे हैं, महंगे निजी कॉलेज बढ़ रहे हैं, और सरकारी इंतजाम की साख घटती जा रही है। इसी तरह पीने के पानी से लेकर सफाई तक के काम निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, और यह समझाने की कोशिश होती है कि सरकारी इंतजाम कभी अच्छा नहीं हो सकता। छत्तीसगढ़ की पहली कांग्रेस सरकार ने सरकारी बसों को बंद कर दिया था। आज निजी बसें रोज सड़कों पर अंधाधुंध रफ्तार से हादसे करती हैं, और लोगों के पास उन रास्तों पर बसें नहीं रहतीं जो कि कम कमाई के हैं। दूसरी तरफ पड़ोस के महाराष्ट्र से रोज छत्तीसगढ़ में सरकारी बसें आती हैं, और महाराष्ट्र जाएं तो वे कामयाबी से चलती हुई दिखती हैं। सरकार को अपने इंतजाम को ठीक करने पर मेहनत करनी चाहिए, न कि उसकी साख को बिगडऩे देकर निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए। छत्तीसगढ़ में देश के बाकी हिस्सों की तरह निजी अस्पताल जिस तरह के कारोबार में लगे हैं, उनसे बचने का एक जरिया सरकारी अस्पताल हो सकते थे, लेकिन उनको धीरे-धीरे कमजोर होने दिया जा रहा है। 

एक खालिस अमरीकी की तरह ओबामा ने नोबल पाया पहले उसके लायक काम बाद में किए

संपादकीय
29 मई  2016
बराक ओबामा के अमरीकी राष्ट्रपति बनने पर जब जल्द ही उन्हें नोबल शांति पुरस्कार दिया गया तो बाकी दुनिया के साथ-साथ वे खुद भी हैरान रह गए थे क्योंकि न तो राष्ट्रपति बनने के पहले, और न ही राष्ट्रपति बनने के बाद उनका कोई ऐसा काम था जिसके लिए ही उन्हें विश्व का यह सबसे बड़ा सम्मान दिया जाता। खुद अमरीकी विश्लेषकों ने हैरानी जाहिर की थी और नोबल कमेटी के फैसले की आलोचना भी की थी। लेकिन यह पहला मौका नहीं था कि नोबल शांति पुरस्कार को लेकर विवाद न हुए हों। इस पसंद को लेकर जब आवाजें उठीं तो कमेटी ने कहा कि यह पुरस्कार ओबामा को इसलिए नहीं दिया गया है कि वे भविष्य में क्या करेंगे, बल्कि इसलिए दिया जा रहा है कि उन्होंने पिछले बरस में क्या किया है। और हम यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि जो वे कर रहे हैं उस दिशा में और भी करेंगे।
ओबामा अपने पिछले अमरीकी राष्ट्रपति, अपनी विपक्षी पार्टी के जॉर्ज डब्ल्यू बुश के मुकाबले उस वक्त भी अधिक उदारवादी थे, और इन आठ बरसों के कार्यकाल के आखिर में पहुंचते हुए भी वे उदार दिख रहे हैं। लेकिन फिर भी आज उनके बारे में लिखने की जरूरत इसलिए पड़ रही है कि बराक ओबामा ने पहले नोबल शांति पुरस्कार पा लिया, और अब उसे चुकता कर रहे हैं। पिछले छह महीनों की ही बात करें, तो उन्होंने तीन ऐसे काम किए हैं जो उन्हें नोबल शांति पुरस्कार का हकदार बनाते हैं, और इनमें से पहला फैसला था, कई दशकों से चले आ रहा क्यूबा का बहिष्कार, और उस पर लादी गई अमरीकी बंदिशों का खात्मा। इसके बाद दूसरा फैसला था वियतनाम पर लादी गई बंदिशें खत्म करना। और अब तीसरा काम उन्होंने किया है जापान के उस हिरोशिमा में जाकर श्रद्धांजलि देने का जिस पर परमाणु बम गिराकर अमरीका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में तबाही का एक नया इतिहास रचा था। हालांकि ओबामा ने हिरोशिमा जाकर श्रद्धांजलि तो दी, लेकिन बम गिराने के उस वक्त के अमरीकी फैसले पर माफी नहीं मांगी। खैर, हम इसे भी कम नहीं समझते कि पहली बार एक अमरीकी राष्ट्रपति ने हिरोशिमा जाकर श्रद्धांजलि देने का मुश्किल काम किया।
अमरीकी संस्कृति का एक हिस्सा है कि पहले खाओ, फिर कमाओ। वहां की जिंदगी क्रेडिट कार्ड पर चलती है। लोग उधारी में जीते हैं। पहले खा लेते हैं, और फिर कमाकर चुकाते हैं। नोबल शांति पुरस्कार चयन समिति के फैसले में चाहे जितनी बुनियादी खामी रही हो, ओबामा ने अपने कुछ फैसलों से यह उधारी चुका दी है। उन्हें मानो नोबल शांति पुरस्कार क्रेडिट पर मिला था, और उन्होंने इन तीन फैसलों के अलावा इंसानियत के कुछ और फैसले भी किए, मुस्लिमों के खिलाफ गोरी दुनिया में फैलती नफरत को घटाने का काम किया, लोगों का बर्दाश्त बढ़ाया, और अमरीकी फौज के कुख्यात प्रताडऩा केन्द्रों को बंद किया। ओबामा ने अमरीकी राष्ट्रपति भवन में एक इंसानियत की वापिसी की जो कि उनके पहले के आठ बरसों में उखाड़कर बाहर फेंक दी गई थी।
दुनिया में इतिहास आमतौर पर काम करके रचा जाता है, और ओहदों से जाने के बाद इतिहास में दर्ज होता है। बराक ओबामा का नाम अमरीका के इतिहास में इसलिए दर्ज नहीं हो सकता था कि उन्होंने कुछ और देशों पर फौजी हमले किए, कुछ और देशों में अपनी फौजों की मौजूदगी बढ़ाई, कुछ और देशों की सरकारें पलटीं, और अपने देश की अर्थव्यवस्था बेहतर की। ओबामा ने अमरीकी अहंकार को घटाने की कोशिश की, और दूसरे देशों से अपनी फौज को हटाने की कोशिश भी की। उन्होंने दुनिया में फैलते हुए इस्लाम से खौफ, इस्लाम से नापसंदगी को भी घटाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने अमरीका में चारों तरफ, घर-घर, कमरे-कमरे तक फैली हुई बंदूकों के खिलाफ एक जनचेतना खड़ी करने की कोशिश की, और अमरीका के भीतर नस्ल या रंग के आधार पर, धर्म या राष्ट्रीयता के आधार पर जो अल्पसंख्यक हैं, उन सबको हिफाजत देने की कोशिश भी की।
इस बात को लिखने की जरूरत आज इसलिए है कि अमरीका और दुनिया के इतिहास में ओबामा के ठीक पहले के रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का नाम एक जंगखोर, युद्धोन्मादी राष्ट्रपति के रूप में दर्ज हुआ है, और ओबामा ने अपने उदार फैसलों से उस कुर्सी की तस्वीर को बदलने की भरसक कोशिश की है। बाकी दुनिया को भी ओबामा के तौर-तरीकों से सीखने की जरूरत है। दुनिया में तंगदिली और नफरत को बढ़ाकर कोई आगे नहीं बढ़ सकते। और यह भी नहीं हो सकता कि लोग अपने आपको तो दरियादिल बताते चलें, और उनके साथ के लोग इस दरिया की मछलियों को रंग और नस्ल के आधार पर अलग-अलग मछली घरों में बांटते चलें। अमरीका के ताजा इतिहास में ओबामा का नाम अलग से दर्ज रहेगा। और अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यकाल तो चार बरस का होता है, और अधिकतम दो बार का हो सकता है। लेकिन भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री के सामने एक अलग मौका रहता है, और आज है भी। नेहरू, इंदिरा जैसे लोग मरने तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे, और आज भी किसी प्रधानमंत्री पर ऐसी कोई रोक नहीं है कि वे दस-बीस बरस इस ओहदे पर न रह सकें। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह सोचना चाहिए कि वर्तमान के फैसलों से अपने खुद के इतिहास को भी पीछे छोड़ा जा सकता है, और एक नया भविष्य बनाया जा सकता है, आने वाले इतिहास में न महज अपना नाम, बल्कि अपने देश का नाम भी दर्ज किया या करवाया जा सकता है।
ओबामा ने अपने कार्यकाल के आखिरी दौर की दावतों को देना शुरू कर दिया है। आठ बरस तक राष्ट्रपति रहने के बाद अमरीकी नेताओं के पास सरकार में कोई काम नहीं बचता, लेकिन वे दुनिया भर में अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि के रूप में, देशों के बीच मध्यस्थ के रूप में, या संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में बहुत से काम कर सकते हैं। लेकिन ऐसी किसी भी भूमिका के लिए राष्ट्रपति की हैसियत से किए गए उनके काम मायने रखते हैं। जॉर्ज बुश ने जितने देशों पर बमबारी करके जितने लाख बेकसूर मारे हैं, उस इतिहास के साथ न उनका कोई वर्तमान रहा, और न ही कोई भविष्य रह सकता। दुनिया में जब जंगखोरों का कोई जमावड़ा होगा, तो शायद उसमें बुश को बुलाया जाए, लेकिन पिछले कोई सात बरसों में हमको ऐसा कोई मौका याद नहीं पड़ता। इसलिए आज की दुनिया के राष्ट्रप्रमुखों, या शासनप्रमुखों यह याद रखना चाहिए कि उनका इतिहास चाहे जो रहा हो, उनके भविष्य को उनका वर्तमान ही तय करता है। 

मोदी के दो बरस पूरे होने पर सीखने की एक बात यह भी...

संपादकीय
28 मई  2016
मोदी सरकार के दो बरस पूरे होने पर कई तरह के विश्लेषण जारी हैं। सरकार के कामकाज, उनकी पार्टी के कामकाज, उनकी पार्टी या उनके राष्ट्रीय गठबंधन की पार्टियों की राज्य सरकारों के कामकाज, ऐसे कई पैमानों पर मोदी को आंका जा रहा है। भारत के बाहर भी ऐसे लोग मोदी के बारे में लिख रहे हैं जिनकी भारत में भी कोई दिलचस्पी है। अब तक तीन दर्जन से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके नरेन्द्र मोदी को लेकर दुनिया के अधिकतर देशों के पास कहने को कुछ न कुछ तो है ही। लेकिन आज सुबह टीवी शुरू करते ही उत्तर-पूर्व में मेघालय के एक गांव में वहां के स्थानीय लोक नर्तकों के साथ वहां का वाद्य बजाते हुए मोदी को देखकर यह भी लगा कि मेहनत का भी कोई विकल्प नहीं है। कल ही अरूण जेटली ने भी यह कहा था कि अपने मंत्रियों के लिए प्रधानमंत्री मोदी का एक ही फार्मूला है कि न सोऊंगा, न सोने दूंगा।
हम मोदी की बहुत सी दूसरी बातों को अलग रख रहे हैं क्योंकि उनके बारे में हम दो बरस से लिखते ही आ रहे हैं। लेकिन राजनीति से परे जो एक बात देश के तमाम लोगों को सोचने की हो सकती है, वह यह है कि लोग अपनी कड़ी मेहनत से कितना कुछ हासिल कर सकते हैं। हम यहां मोदी की कामयाबी और नाकामयाबी, और जलते-सुलगते राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी की बात नहीं छेड़ रहे, क्योंकि उस पर जाने से आज की इस बात का आज का पहलू धरा रह जाएगा। आज देश में तरह-तरह के इम्तिहानों के नतीजे निकल रहे हैं, और कई लोग नाकामयाब होकर, या उम्मीद जितनी कामयाबी न मिलने से खुदकुशी भी कर रहे हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि इनमें शायद ही ऐसे लोग होंगे जिन्होंने मोदी जितनी मेहनत की हों। और यह मेहनत एक खास दायरे में तब कुछ अधिक मायने रखती है, जब मोदी बिना किसी तजुर्बे के अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर इतनी अधिक मेहनत कर रहे हैं और वहां तारीफ भी पा रहे हैं। मतलब यह एक कड़ी मेहनत बेकार नहीं जाती। इस उम्र में वे अगर रोज 18 घंटे काम करते दिखते हैं, तो वे काम तो पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जितना ही कर रहे हैं, लेकिन बहुत से मोर्चों पर वे मनमोहन सिंह से अलग एक अलग किस्म की सक्रियता के साथ, मौलिकता के साथ काम कर रहे हैं और रफ्तार से सीख भी रहे हैं।
देश के बहुत से लोगों को इससे यह सीख लेनी चाहिए कि बिना किसी तजुर्बे के भी किसी नए काम को कैसे बखूबी किया जा सकता है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी अपने प्रदेश के दंगों की वजह से पूरी दुनिया में अछूत की तरह माने गए थे, और एक के बाद एक अनगिनत देशों ने उनका अघोषित और घोषित बहिष्कार कर रखा था। अमरीका और योरप के कई देशों में उन्हें वीजा देने से भी इंकार कर दिया था, और आज भी उन्हें कई देशों में प्रधानमंत्री के पद की वजह से वीजा मिला है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक भी दिन के तजुर्बे के बिना, केन्द्रीय राजनीति या केन्द्र सरकार में एक दिन भी काम किए बिना अगर नरेन्द्र मोदी इस रफ्तार से केन्द्र सरकार, केन्द्रीय राजनीति, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सीख रहे हैं, और बखूबी कर रहे हैं, तो यह देश के अनगिनत लोगों के लिए अधिक उम्र में भी नई बातों को सीखने की एक राह है।
बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि 60 बरस की उम्र के बाद लोगों को अपना ध्यान भजन-पूजन में लगाना चाहिए, लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी इस उम्र के बाद ही पाई है। इनमें मोदी भी एक हैं, और दुनिया के एक सबसे कामयाब कारोबारी वारेन बफे भी हैं, जिन्होंने अपनी लगभग सारी दौलत 60 बरस की उम्र के बाद ही कमाई। वारेन बफे की मिसाल हमने दो-चार दिन पहले ही इसी जगह पर और दी थी, और दुनिया की सकारात्मक मिसालों से सीखने की जरूरत बहुतों को रहती है। मोदी के दो बरस पूरे होने पर उनके बाकी अच्छे और बुरे कामों पर बात तो होती रहेगी, लेकिन उनके व्यक्तित्व के इस पहलू पर भी सोचने की जरूरत है, और उससे कुछ सीखने की जरूरत भी उन लोगों को है जो कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं।

दुनिया के सामानों में किफायत बरते बिना धरती नहीं बचेगी..

संपादकीय
27 मई  2016
एक ऐसा नया मोबाइल फोन बन रहा है जिसमें लोग अपनी मर्जी के हिस्से जोड़-जोड़कर अपने काम का फोन बना लेंगे, और उसमें बिना जरूरत का कोई हिस्सा नहीं रहेगा। कुछ लोगों को कैमरे की जरूरत नहीं रहती है, कुछ लोगों को संगीत की जरूरत नहीं रहती, और कुछ लोगों को एफएम बैंड के रेडियो की जरूरत नहीं रहती। लेकिन आज सारे फोन न सिर्फ एक पैकेज की तरह आते हैं, बल्कि उनके साथ चार्जर या ईयरफोन या जोडऩे वाला तार, ये सब अनिवार्य रूप से आते हैं, और कई लोगों के पास ये हिस्से पहले से रहने से प्लास्टिक का कबाड़ बढ़ते चलता है। जिस तरह सजी हुई थाली के बजाय अपने हाथ से उठाकर लेने और खाने की बर्बादी कुछ कम हो सकती है, उसी तरह कम्प्यूटर और मोबाइल फोन रहने चाहिए, और मुमकिन हो तो जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले कई और उपकरण भी ऐसे ही होने चाहिए जिसमें लोग जरूरत और पसंद के मुताबिक हिस्से कम या अधिक कर सकें।
विज्ञान और टेक्नालॉजी को कुछ और मोर्चों पर भी काम करने की जरूरत है, जिसमें से एक तो अलग-अलग उपकरणों में लगने वाली बैटरियों का मामला है। कैमरों से लेकर मोबाइल फोन तक, और संगीत के उपकरणों तक सैकड़ों तरह की बैटरियां लगती हैं। इनको सीमित करने की कोशिश होनी चाहिए, ताकि बैटरियों का कबाड़ धरती पर बढ़ता न चला जाए। इसी तरह उपकरणों के चार्जर की बात है, कम्प्यूटरों से उनके जुडऩे की बात है, और इन सामानों की पैकिंग की बात भी है। आज तरह-तरह के भारी-भरकम और सजावटी बक्सों में सामान आते हैं, और ये बक्से सामान निकलते ही बेकार हो जाते हैं। धरती पर कबाड़ और कचरे का बोझ इस रफ्तार से बढ़ रहा है कि वह कुदरत को दफन करते जा रहा है। शहरों में ठोस कचरे का निपटारा पूरी दुनिया की एक बड़ी दिक्कत बन गई है, और ऐसे में पैकिंग को घटाकर, उपकरणों के साथ आने वाले सामानों को घटाकर धरती की बर्बादी धीमी की जा सकती है। आज विकसित दुनिया के देश कम्प्यूटरों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों का कचरा गरीब देशों पर थोप रहे हैं, और इनके नुकसानदेह हिस्से अलग करने वाले मजदूर और इलाके लगातार खतरा झेल रहे हैं।
लेकिन टेक्नालॉजी और बाजार से परे की एक और बात है। धरती के लोगों के अपनी जरूरतों को बढ़ाने, और हसरतों को रात-दिन पंजों पर तैयार रखने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि उन्हें सचमुच किन नए सामानों की जरूरत है, और क्या उनके मौजूदा सामान सचमुच दम तोड़ चुके हैं, या कि वे सामान उनकी ताजा जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं? बाजार की रणनीति तो होती ही यही है कि वह सामानों में आए दिन कुछ नई बातों को जोड़कर लोगों के मन में उनके मौजूदा सामानों के लिए एक हिकारत पैदा करे, और हीन भावना भर दे। लोगों को किसी सामान का नया मॉडल आते ही अपना मौजूदा मॉडल कमजोर और बेकार लगने लगता है। बहुत से लोग ऐसी स्थायी बेचैनी के साथ जीते हैं और रात-दिन वे इन खबरों पर नजर रखते हैं कि कब कौन सा नया फोन आ रहा है, नया कम्प्यूटर, नया कैमरा, नई मोटरसाइकिल या नई कार कब आ रही है। ऐसी बेचैनी के चलते जो लोग नए सामान का खर्च उठाने की ताकत रखते हैं, वे तमाम लोग खुद भी नए मॉडल खरीदते हैं, और अपने आसपास एक संक्रामक रोग की तरह हसरत और बेचैनी को फैलाते हैं। इंसानों को खुद भी अपनी इस सोच से बचना होगा, वरना धरती का बचना मुश्किल होगा।
टेक्नालॉजी बाजार की मांग को बढ़ाती भी है, लेकिन कई किस्म की टेक्नालॉजी लोगों के काम को आसान करती है, और जरूरतों को सीमित भी करती है। पर्यावरण का फायदा करने वाली ऐसी टेक्नालॉजी को हर कदम पर बढ़ावा देने की जरूरत है, ऐसा इसलिए नहीं हो पाता है कि यह बाजार के हितों के खिलाफ रहता है। लेकिन फिर भी जब आसान और कम खर्च तकनीक आ ही जाती है, तो फिर बाजार की उसे रोकने की ताकत आखिर तक नहीं टिक पाती। इसलिए दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को लोगों की जिंदगी को आसान करने वाले सामान बनाने की कोशिश करनी चाहिए। और मोबाइल फोन में अपनी जरूरत के हिस्सों को जोड़कर अगर कोई अपने लायक फोन बना सके, तो यह सचमुच बड़ी अच्छी बात होगी, और इससेलोगों की, धरती की बड़ी बचत भी होगी।

धर्म और सेक्स-शोषण

संपादकीय
26 मई  2016
अंधविश्वास में पड़ी महिलाओं का सेक्स-शोषण करने के आरोप में एक और चर्चित परमानंद नाम का बाबा गिरफ्तार हुआ है। आसाराम को एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में बिना जमानत जेल में पड़े बरसों हो रहे हैं, और दक्षिण भारत का नित्यानंद नाम का एक स्वामी अपने सेक्स-वीडियो के बावजूद उज्जैन के सिंहस्थ में सिंहासन पर विराजमान देखने में आया। और अभी बिना कपड़ों वाले एक ऐसे नागा साधू की पैर फैलाए बैठे तस्वीर सामने आई है जिसके पैर दबाते एक भक्त महिला बैठी है। और हिन्दू धर्म से परे अगर देखें, तो ईसाई पादरियों के बच्चों से बलात्कार की खबरें हम पूरी जिंदगी से देखते आ रहे हैं, और बहुत किस्म की जांच में यह साबित हो चुका है कि कई कोप आए-गए, और उन्होंने ऐसे मुजरिम पादरियों को बचाना जारी रखा। भारत की कई धार्मिक परंपराओं को देखें, तो मंदिरों में देवदासी प्रथा के तहत महिलाओं के देह शोषण की लंबी परंपरा रही है।
अब इससे दो बातें निकलकर आती हैं, एक तो यह कि धर्म को किसी तरह के जुर्म से कोई परहेज नहीं होता। और धर्म का जो केन्द्र है, उस ईश्वर का कोई भी बस ऐसे जुर्मों पर नहीं चलता। अलग-अलग घरों में और खेत-खलिहानों में होने वाले बलात्कारों को ईश्वर हो सकता है कि देख न पाता हो, हालांकि उसे कण-कण में व्याप्त बताया जाता है, सर्वत्र उपस्थित बताया जाता है, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ बताया जाता है, लेकिन हो सकता है कि हर जगह तक उसकी नजरों के द्रोन न पहुंच पाते हों। फिर भी यह कैसे माना जा सकता है कि मंदिर और चर्च में, पुजारियों या साधुओं के हाथों, या कि पादरियों के हाथों महिलाओं और बच्चों के होने वाले सेक्स-शोषण पर भी उसकी नजर न पड़ती हो? इन जगहों पर तो वह प्रतिमाओं से लेकर तस्वीरों तक मौजूद रहता है, और इन जगहों की दुकानदारी उसके नाम पर ही चलती है, यहां पर तो हर सांस में उसका नाम लिया जाता है, फिर भी यहां का बलात्कार उससे अनदेखा रह जाता है। अब ऐसे ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहकर यह कहना कहां तक ठीक है कि दुनिया में उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। तो क्या बलात्कार की शिकार इन महिलाओं और इन बच्चों के कपड़े उसकी मर्जी के बिना हिल जाते हैं और उतर जाते हैं? क्या इन पर हिंसा ईश्वर की मर्जी के बिना हो जाती है?
अब इससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह खड़ा होता है कि महिलाओं को अलग-अलग धर्मों में मंदिरों से लेकर दरगाहों तक घुसने नहीं मिलता। जिस महिला को धरती के तमाम लोगों की जननी कहा गया है, जिसके अनगिनत रूप अलग-अलग कई धर्मों में पूजे जाते हैं, वहां पर महिलाओं को ईश्वर से दूर रखना, या भारत के कुछ हिन्दू सम्प्रदायों में तो उन्हें सम्प्रदाय-प्रमुख की नजरों से भी परे रखना आम बात है। तो एक तरफ तो ईश्वर को महिलाओं से, या महिलाओं को ईश्वर से दूर रखा जाता है, और दूसरी तरफ ईश्वर का नाम लेकर अपनी दुकान चलाने वाले आसाराम से लेकर इस नए ताजे बाबा, परमानंद तक, बलात्कार के आरोपों से घिरे रहते हैं। तो फिर धर्म की नजर में महिला ईश्वर के सामने तक पहुंचने के लायक भी नहीं हैं, लेकिन बलात्कार और सेक्स के लायक है? यह सब देखते हुए जो कुछ बातें हमें समझ नहीं आती है, उनमें से एक तो यह है कि महिलाएं क्यों ऐसे बाबाओं के चक्कर में अपनी देह लुटाती हैं जो कि उन्हें जन्नत की सैर का सपना दिखाते हैं? और दूसरी बात यह कि उन धर्मस्थलों में घुसने को महिलाएं क्यों बेताब रहती हैं जिन धर्मस्थलों में बसे हुए ईश्वर के हाथ में न तो उन महिलाओं को वहां तक दाखिला देने की ताकत है, और न ही उन्हें धर्मगुरुओं के बलात्कार से बचाने की ताकत है। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि ईश्वर और धर्म के नाम पर हिंसक पाखंड का जो जुर्म बहुत से धर्मों में फैला हुआ है, उससे एकमुश्त लडऩे की जरूरत है, सिर्फ महिला अधिकारों के लिए वहां दाखिले के हक के लिए लडऩा काफी नहीं है।
आज लोगों को आस्था से परे धर्म को उसकी जगह दिखाना चाहिए, और आस्था को अपने भीतर, अपने घर के भीतर सीमित रखना चाहिए।

झीरम हमले के तीन बरस बाद कांगे्रस के घरेलू सवाल खड़े हुए

विशेष संपादकीय 
25 मई  2016 
-सुनील कुमार
देश के नक्सल हिंसा के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले, झीरम घाटी, को आज 3 बरस पूरे हो रहे हैं, और छत्तीसगढ़ के सामने इससे जुड़े हुए कई सवालों के जवाब नहीं आ पाए हैं। इस हमले में छत्तीसगढ़ कांगे्रस के बहुत से बड़े नेताओं को नक्सलियों ने पहचान-पहचानकर, छांट-छांटकर मारा था, या छोड़ा था। इसकी पुलिस जांच के बाद इसकी जांच एनआईए ने की, और अब राज्य सरकार ने यह जांच कांगे्रस की मांग पर सीबीआई को दे दी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने यूपीए सरकार के वक्त ही यह जांच शुरू की थी, लेकिन कांगे्रस लगातार इसके लिए सीबीआई जांच मांगती रही। केंद्र में अब मोदी सरकार के रहते हुए कांगे्रस की इस मांग को तो पूरा कर दिया गया है, लेकिन एक सवाल यह उठ रहा है कि आतंक की जैसी वारदातों की जांच के लिए एनआईए को बनाया गया है, वैसी इस वारदात की जांच सीबीआई क्या ज्यादा अच्छे तरीके से कर सकेगी?
इससे परे एक सवाल लोगों के मन में यह भी है कि झीरम के नक्सल-हमले की साजिश के पीछे कांगे्रस के कुछ लोगों का हाथ होने का जो शक कांगे्रस के ही बाकी लोगों को है, उस शक का 3 बरस पूरे होने पर भी कुछ नहीं हो पाया है। और जैसे-जैसे यह जांच एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को जा रही है, वैसे-वैसे सच के पुराने होने और धुंधले होने का खतरा भी बढ़ते चल रहा है। आज झीरम की बरसी पर कांगे्रस के इस हमले में मारे गए बड़े-बड़े नेताओं को याद करते हुए पार्टी के कई लोग यह भी कह रहे हैं कि कांगे्रस के ही जो लोग इस साजिश के पीछे थे, वे शायद कभी सजा तक न पहुंच पाएं।
इन तीन बरसों में इस नक्सल हमले से जुड़े जितने भी तथ्य सामने आए हैं, इनमें पुलिस के इंतजाम की लापरवाही की बात हो सकती है, लेकिन अगर किसी साजिश के तहत कांगे्रस के नेताओं को चुन-चुनकर मारा गया, और नक्सलियों ने भाड़े के हत्यारों की तरह काम किया था, तो ऐसी साजिश कांगे्रस के भीतर की साजिश होने के आसार अधिक दिखते हैं, और इससे राज्य की सरकार का लेना-देना नहीं दिखता है। कांगे्रस के भीतर अगर ऐसी साजिश हुई थी, तो वह ऐसी पहली साजिश नहीं थी, और छत्तीसगढ़ कांगे्रस लगातार इस तरह की भीतरघाती साजिशें झेल ही रही है।
आज जब कांगे्रस के पास देश भर में करने को बहुत ही कम बचा हुआ है, तो यह सही मौका है जब वह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अपनी पार्टी को साजिशों और भीतरघात से आजाद कराए। अगले विधानसभा चुनावों में जिन राज्यों में कांगे्रस के पास एक जीत हासिल करने की संभावना है, उनमें छत्तीसगढ़ को भी गिना जा सकता है। यहां पर कांगे्रस पिछले 3 चुनावों में भाजपा से पीछे तो रही है, लेकिन उसकी हालत देश के दूसरे राज्यों से बेहतर भी रही है। ऐसे में कांगे्रस को अपना घर सुधारना चाहिए और अपनी पार्टी को इस राज्य में जीतने का एक मौका देना चाहिए। झीरम से परे भी छत्तीसगढ़ में यह बात आम कही जाती है कि कांगे्रस भाजपा से तो जीत ले, लेकिन अपने खुद के भीतरघात से जीत ले, उसके बाद ही वह जीत हो सकती है।
झीरम हमले को लेकर कांगे्रस की सीबीआई जांच की मांग पूरी होने के बाद, राज्य सरकार द्वारा केंद्र को यह सिफारिश भेज देने के बाद अब राज्य सरकार के पास इस मामले में करने को और कुछ नहीं बचा है। लेकिन कांगे्रस पार्टी ने जांच को एनआईए से सीबीआई को दिलवा दिया, लेकिन भारत के राजनीतिक दल लगातार सीबीआई को केंद्र सरकार का हथियार, औजार, तोता, या प्रधानमंत्री का थाना कहते आए हैं। जबकि एनआईए आंतरिक सुरक्षा के कई राज्यों में बिखरे हुए मामलों की जांच के लिए काम करने वाली एक एजेंसी है, जो कि अदालत में इस मामले को पेश कर भी चुकी थी, और उसे यह जिम्मा यूपीए सरकार के समय से मिला हुआ था।
अब मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली एक एजेंसी से यह जांच दूसरी एजेंसी को चली गई है, और इसके साथ ही छत्तीसगढ़ कांगे्रस एक मुद्दा भी खो बैठी है। अब अगर छत्तीसगढ़ कांगे्रस संगठन के पास कोई विकल्प हैं, तो वे अपनी पार्टी के भीतर ही हैं, किसी जांच एजेंसी के पास नहीं। झीरम हमले के तीन बरस होने के बाद भी कांगे्रस अपने भीतर इन्हीं सवालों के जवाब नहीं ढूंढ पाई है, और छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में कांगे्रस की जीत इस पर्चे को हल किए बिना मुमकिन नहीं है। 

सोशल मीडिया पर बदनीयत झूठ पर तेजी से सजा हो

संपादकीय
24 मई  2016
इंटरनेट पर सोशल मीडिया को लेकर कुछ बातों को हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं लेकिन आज की जिंदगी में सोशल मीडिया की दखल जितनी बढ़ गई है, उसे देखते हुए एक बार फिर इस पर लिखने की जरूरत है। असम में एक फिल्म अभिनेत्री अंगूरलता डेका भाजपा की टिकट पर चुनाव लडऩे के बाद जीतकर विधायक बन गईं, तो फिल्म निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने उनकी एक खूबसूरत तस्वीर के साथ लिखा कि अगर एमएलए इतनी सुंदर हो रही हैं तो राजनीति से  उनकी चिढ़ खत्म हो रही है। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोगों ने भाजपा के खिलाफ हमला बोलने की मुहिम के तहत एक स्वीमिंग पूल में बैठी हुई एक ऐसी महिला की तस्वीर अंगूरलता की बताते हुए पोस्ट की, जिसके हाथ में एक गिलास में शराब सरीखा कुछ दिख रहा है। इसके साथ-साथ यह लिखा गया कि शाम होते ही भाजपा की यह विधायक डूब जाती है शराब और शबाब में। फिर क्या था, बात की बात में भाजपा विरोधी लोगों ने इस तस्वीर को चारों तरफ फैलाना शुरू किया, और हमने अपनी आम आदत के मुताबिक सबसे पहले तो इसे झूठा मानते हुए इसे परखना शुरू किया। नतीजा यह निकला कि पहली नजर में ही यह पता लग गया कि यह महिला अंगूरलता नहीं है।
अब इसके आगे की बात करें तो पल भर के लिए, बहस के लिए यह मान भी लें कि यह भाजपा की विधायक है, तो न तो किसी महिला का स्वीमिंग पूल में बैठना जुर्म है, और अगर वह शराब भी पी रही है, तो वह भी जुर्म नहीं है। ये हमले सिर्फ भाजपा विरोधियों द्वारा भाजपा के लोगों पर नहीं होते, बहुत सी पार्टियों के लोग अपने विरोधियों पर ऐसे हमले करते हैं, और दिल्ली के विधानसभा चुनाव के दौरान बीयर या शराब पीने वाले लोगों को डिजिटल तकनीक से आम आदमी पार्टी की टोपी पहनाकर उन्हें शराबी साबित करने की कोशिश पूरे चुनाव के दौरान होते रही। आज सोशल मीडिया पर हम इसीलिए लिखना चाह रहे हैं कि इस तरह के झूठे, गढ़े हुए, और ओछे हमले जो लोग भी करते हैं, वे किसी और को नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि वे सिर्फ उन लोगों को नुकसान पहुंचाते हैं जिनका भला करने की कोशिश वे करते हैं। आज किसी महिला की तस्वीर को भाजपा विधायक बताकर अगर ओछा हमला किया जा रहा है तो यह झूठ कुछ घंटों से ज्यादा खड़े नहीं रह सकता। और इसके उजागर हो जाने के बाद भाजपा-विरोधियों की ऐसी हरकत से बहुत सी समाचार वेबसाईटें भी उजागर हो रही हैं जो कि इस झूठ को फैला रही थीं।
लोगों को अभी तक भारत के आईटी कानून के खतरे पूरी तरह से समझ नहीं आ रहे हैं। ऐसे झूठ को फैलाने पर कैद हो सकती है, चाहे वह समाचार वेबसाईट हो, या कि ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया वेबसाईटें हों। इन पर झूठ फैलाना जितना आसान है, उतना ही आसान ऐसे लोगों को जेल पहुंचाना भी है। हमारा तो यह मानना है कि चाहे किसी भी राजनीतिक या धार्मिक, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय विचारधारा के लिए, या उसके विरोध के लिए ऐसे झूठ फैलाने वाले लोगों को तेजी से जेल भेजना चाहिए, ताकि बाकी लोगों को भी यह समझ आए कि यह बदनीयत-शरारत कितनी महंगी पड़ सकती है। हमारी दूसरी सलाह सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से है कि झूठ का भांडाफोड़ करने में उनको पीछे नहीं रहना चाहिए चाहे झूठ किसी भी विचारधारा का क्यों न हो।

इतिहास भविष्य नहीं होता, आने वाले कल कुछ भी हो सकता है

संपादकीय
23 मई  2016
जिन लोगों को इतिहास के साथ जीना अच्छा लगता है, और जो इतिहास को भविष्य के लिए एक पैमाना बनाकर चलते हैं, जो इतिहास से मिलने वाली नसीहतों से परे जाना नहीं चाहते हैं, उनके लिए दक्षिण भारत के अगल-बगल के दो राज्यों, और उत्तर-पूर्व के एक राज्य से कुछ अच्छी मिसालें सामने आई हैं। जयललिता की पार्टी ने तमिलनाडु में करीब तीस बरस बाद सत्ता पर लगातार दूसरी बार वापिस लौटने का रिकॉर्ड बनाया है। इसके पहले वहां पर द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता तवे के पराठे की तरह बारी-बारी से पलटती रहती थी, लेकिन जेल जाकर भी, मुकदमे झेलकर भी जयललिता ने यह रिकॉर्ड बनाया है, अकेले अपने दम पर, बिना किसी गठबंधन के। दूसरी तरफ केरल है जहां पर 92 बरस के माक्र्सवादी नेता वी.एस. अच्युतानंदन ने धुंआधार चुनाव प्रचार करके अपनी पार्टी को सत्ता पर पहुंचाया, और उस कांगे्रस को परास्त किया जो कि पश्चिम बंगाल में माक्र्सवादियों के साथ तालमेल से चुनाव लड़ रही थी। यह एक अलग बात है कि इतना करने के बाद भी इस बुजुर्ग नेता के बजाय वापमंथी किसी और को मुख्यमंत्री बना रहे हैं, लेकिन इस उम्र में कोई नेता चिलचिलाती धूप में साठ से अधिक आमसभाओं में भाषण देकर अपनी पार्टी को जिता सकता है, इससे देश के बाकी उन लोगों को एक सबक लेना चाहिए जो अपनी उम्र निकल जाने के मलाल में कई तरह की मंजिलों को अपनी पहुंच से परे का मानते हैं। फिर उत्तर-पूर्व है जहां पर देश की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला दूसरा राज्य है असम। इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने कांगे्रस की तीन बार की सरकार को परास्त करके अकेले अपने दम पर सरकार बनाई है, और एक नया इतिहास रचा है। इससे भी लोगों को यह सबक लेने की जरूरत है कि एक बंजर जमीन पर भी किस तरह अपनी फसल को लहलहाया जा सकता है।
अगर कोई महज इतिहास से चिपके रहते, तो तमिलनाडु, केरल, और असम में ऐसे चुनावी नतीजे नहीं आते। इससे एक तो यह बात निकलकर आती है कि इतिहास से सबक लेकर लोगों को आगे बढऩा आना चाहिए। जिस तरह कोई कार या दुपहिया चलाते हुए उसके पीछे देखने के शीशे में लगातार देखते हुए आगे बढऩा मुमकिन नहीं होता है, उसी तरह असल जिंदगी में भी पीछे तभी देखना चाहिए जब कोई जरूरत हो, वरना आगे बढऩे के लिए आगे देखना जरूरी होता है।
जो बात आज तक नहीं हुई है, वह आगे भी कभी नहीं होगी, इस सोच के साथ कोई कामयाब नहीं हो सकते। क्या दुनिया में ईमेल बनने के पहले कभी किसी ने सोचा था कि चिट्ठयां इस कदर बेदखल हो जाएंगी? इंटरनेट के पहले किसी ने यह सोचा था कि दुनिया के अरबों लोग सुबह उठकर घरवालों का चेहरा देखने से पहले इंटरनेट देखेंगे? क्या किसी ने कभी गूगल के बारे में कल्पना की थी? फेसबुक या ट्विटर जैसी चीज सोची थी? लेकिन ये तमाम बातें उन लोगों ने कर दिखाईं जिनके परिवार कभी कारोबार में नहीं थे। और यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया के एक सबसे संपन्न कारोबारी वारेट बफे ने अपनी तकरीबन पूरी ही दौलत बुढ़ापा शुरू होने के बाद कमाई। दूसरी तरफ उम्र में जब उनसे आधे से भी कम वर्षों का रहा होगा, तब मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक से खरबों की दौलत खड़ी कर ली। इसलिए इतिहास की मिसालों को उन लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए जिनके पास किसी जीत या हार, कामयाबी या नाकामयाबी का विश्लेषण करने के लिए समय ही समय है।

मां का नाम ही काफी है

संपादकीय
22 मई  2016
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक ताजा फैसले में आदेश दिया कि पासपोर्ट जारी करते वक्त जैविक पिता का नाम बताना जरूरी ना समझा जाए। यह फैसला बहुत से पहलुओं से देश के सामाजिक और प्रशासनिक हालात  सामने रखता है। यह फैसला एक ऐसी महिला की याचिका पर आया जिसे अपनी बेटी के पासपोर्ट का दूसरी बार नवीनीकरण करवाना था। पहली दो मर्तबा  जैविक पिता के नाम का जि़क्र किए बिना उसे पासपोर्ट जारी कर देने वाला पासपोर्ट दफ्तर इस बार उसके जैविक पिता का नाम फार्म में लिखे बिना पासपोर्ट जारी करने से इंकार कर रहा था। इस लड़की की मां का कहना था कि उसके पिता ने जन्मते ही उसे उसकी मां के साथ इसलिए छोड़ दिया कि वह एक लड़की थी, लिहाजा उसके किसी भी दस्तावेज में उसके पालक के रूप में जगह पाने का हकदार उसका पिता  नहीं था, इसलिए मां ने कभी पालक की जगह पिता का नाम लिखा ही नहीं। बेटी जन्मने के कथित जुर्म में तलाक पाने वाली इस महिला ने अदालत से कहा कि पासपोर्ट दफ्तर का उसके पिता के नाम के जिक्र पर ज़ोर देना खुद के नाम, और पहचान के बारे में तय करने के उसकी बेटी के अधिकार का हनन है।
भारत में एक महिला की ऐसी सोच, और कोशिश, देश में महिला अधिकारों के बारे में सोचने और लडऩे वालों का हौसला बढ़ाने वाली है। अमूमन तलाकशुदा जोड़ों के बच्चे बिना किसी उज्र के अपने पिता का नाम तरह-तरह के फार्मों पर लिख दिया करते हंै। शायद इसके पीछे यह सोच हो कि तलाक माता-पिता में हुआ है, औलादें उनके आपसी झगड़े से परे हैं। शायद यह महिला भी ऐसा करके अपनी बेटी का पासपोर्ट ले सकती थी, लेकिन उसने अपनी बेटी के सम्मान के लिए लडऩे की जहमत उठाना बेहतर समझा। अगर वह ऐसा ना करती तो शायद आज अदालत ऐसा फैसला ना देती, और ना ही यह पता चलता कि सरकारी महकमों को संवेदनशील बनाने के लिए अभी कितना कुछ किया जाना बाकी है।
एक लड़की के लिए यह उसके अस्तित्व का मसला है कि उसका दुनिया में आना जिस पिता को इतना नागवार गुजरा के उसने उसने रिश्ते ही खत्म कर दिए, उसे वह अपना पालक कैसे माने। लेकिन सरकारी दफ्तर में यह महज कम्प्यूटर को राजी करने की एक औपचारिकता ही है। अब अदालत के  फैसले के बाद सॉफ्ट्वेयर में सुधार किया जाएगा। इसकी जरूरत भी थी, क्यंूकि अकेले बूते औलादों की परवरिश करने वाला तबका देश में तेजी से बढ़ रहा है। इसमें  तलाकशुदा  औरतें भी हो सकती हैं या ऐसे ही छोड़ दी गई  महिलाएं, विधवाएं, यौनकर्मी, बलात्कार के कारण मां बनी महिलाएं, और अब तो कृत्रिम गर्भाधान के जरिये औलाद का सुख पाने वाले लोगों की भी कमी नहीं। अदालत ने भी अपने फैसले में इस बात का जिक्र किया है। पासपोर्ट दफ्तर ऐसे तबके को नजरअंदाज करके न केवल अपनी असंवेदनशीलता जता रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि उसे अपने ग्राहकों की सुविधा की भी कुछ पड़ी नहीं। अगर पर्यटन मंत्रालय इलाके विशेष के सैलानियों को अपनी ओर खींचने के लिए तरह-तरह का लचीलापन और सुविधाएं दे सकता है, तो दूसरे सरकारी महकमे  ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्या इसलिए कि नागरिकों के पास उनकी बात माने बिना कोई चारा नहीं, इसलिए उन्हें नागरिकों के अधिकारों के बारे में बारीकी से सोचने की जरूरत नहीं!
इस फैसले में तीसरी अहम बात यह है कि पासपोर्ट दफ्तर ने पहले दो मौकों पर इस लड़की को पिता के नाम के जिक्र के बिना पासपोर्ट जारी किया था। तीसरी बार यह कहा गया कि कम्प्यूटर पिता का नाम लिखे बिना फॉर्म स्वीकार नहीं करेगा। औरतों के हक के लिए  देश में अर्से से जारी लड़ाई के कारण हालात बहुत सुधरे हैं, और तकरीबन तमाम दस्तावेजों में अब केवल माता का नाम ही काफी माना जाता है। लेकिन यह मामला बताता है कि ऐसे भी सरकारी महकमे हैं जिन्हें ना तो सरकार की सोच से कोई सरोकार है, ना ही वहां हर समय एक जैसे मामलों में एक जैसे फैसले लेने की कोई व्यवस्था है। जिसे जब जो समझ में आया, वैसा फैसला लिया जाता है। जनता भले परेशान होती उसकी बला से! देश में पौराणिक काल में भी इसकी मिसाल थी, और 21 वीं सदी में भी है कि कैसे बच्चों की परवरिश में पिता के मुकाबले ज्यादा मेहनत करने वाली मां के नाम से बच्चों को जाना गया है। अर्जुन को  पांडु पुत्र ही नहीं, कुंती पुत्र भी कह कर पुकारा गया है, और आज के मशहूर फिल्म निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली अपने नाम के पीछे अपनी मां का नाम  लिखते हंै। जिनका  जनता से रोजमर्रा साबिके का काम है, क्या वह इन बातों से भी कुछ सीख नहीं सकते, जबकि कायदों में उन पर ऐसी कोई रोक लगाई नहीं गई है। अदालत ने कहा कि तक्नालॉजी लोगों का काम आसान बनाने के लिए है, उन्हें उलझाने के लिए नहीं। अच्छा होता कि पासपोर्ट  विभाग ने खुद ही यह बात सोची होती, अदालत से झाड़ खाने की नौबत से बच जाता!

छत्तीसगढ़ में बस्तर निलंबित लोकतंत्र का अफसरी टापू

संपादकीय
21 मई  2016
बस्तर के कलेक्टर अमित कटारिया की वहां के एक पत्रकार के साथ फोन पर बातचीत की रिकॉर्डिंग भयानक है और वह छत्तीसगढ़ के इस नक्सल-हिंसाग्रस्त इलाके में लोकतंत्र की मौजूदा हालत को साबित करती है। एक अफसर अगर अपनी आलोचना पर किसी को कीड़ा और चूहा कहकर कुचल देने की धमकी दे, तो फिर यह बातचीत सामने आने पर यह कलेक्टर की बात नहीं, सरकार की बात है कि इस पर वह क्या कर रही है। इस ताजा सुबूत से दो बातें उठती हैं कि नक्सल हिंसा से घिरे बस्तर के लिए सरकार की सोच, बंदूकों के अलावा और कैसी है। दूसरी बात यह कि सत्ता लोगों में जैसी बददिमागी ला रही है उसे सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी कब तक, और किस हद तक बर्दाश्त करेंगी?
बस्तर में अब स्थानीय प्रशासन और पुलिस को राजधानी से यह खुली छूट मिली दिखती है कि वे जिनसे नाखुश हों, उन्हें नक्सल बताकर बस्तर से भगा दें। इसके अलावा पत्रकारों को जेल में डाल दें, सामाजिक कार्यकर्ताओं का सरकारी खर्च पर प्रायोजित-विरोध करवाएं। सुरक्षा बलों की हिंसा के सच कहने वाली राष्ट्रीय संवैधानिक संस्थाओं की बातों को अनदेखा करें और मीडिया को अपनी पसंद के मुताबिक राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी दो कतारों में खड़ा करें। यह सिलसिला बस्तर में लगातार चल रहा है और छत्तीसगढ़ के बाहर इस प्रदेश को पूरी दुनिया में स्थायी बदनामी दिला रहा है।
जहां सरकार के पास अनगिनत बंदूकें हैं, लोगों के फोन टैप करने की सहूलियत है वहां पर सुबूतों से कार्रवाई के बजाय सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्राध्यापकों को नक्सली कहकर भगाना लोकतंत्र की एक शर्मनाक नौबत है। अभी जेएनयू के प्राध्यापकों की एक टीम पर आरोप लगाया जा रहा है कि उसके प्राध्यापकों ने गांवों के आदिवासियों की बैैठक में कहा कि वे नक्सलियों से मिलकर रहें। जिस बस्तर में गांव-गांव में पुलिस, खुफिया पुलिस, पुलिस के खबरची हैं, वहां पर या तो पुलिस ऐसे सुबूत जुटाकर दुनिया को सुनाती, या किसी पर नक्सली होने का आरोप लगाने के पहले सोचती कि यह अपने आप में अपराध है, लेकिन बस्तर के बेकाबू अफसरों को लोकतांत्रिक समझ और जिम्मेदारियों से आजाद कर दिया गया है। हम पहले भी लिख चुके हैं कि बस्तर एक निलंबित लोकतंत्र से गुजर रहा है और वह अफसरों के प्रशासन वाला एक स्वायत्तशासी टापू बना दिया गया है। ऐसे अफसरों को यह माकूल बैठता है कि वहां के पत्रकार बाहरी दुनिया को हालात न बताएं, और बाकी दुनिया वहां न आए, लेकिन इससे नक्सल हिंसा खत्म नहीं होगी, आदिवासियों पर सरकारी जुल्म बेधड़क बढ़ते चलेगा, जिससे नक्सली वहां अधिक जनाधार पाते चलेंगे।
अब दूसरी बात, बस्तर से परे भी छत्तीसगढ़ में जगह-जगह सत्ता या पैसों की ताकत से बददिमागी दिखती ही रहती है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित कई ऐसे मंत्री और अफसर हैं जो अपने विनम्र बर्ताव के लिए जाने जाते हैं, लेकिन जब उनके मातहत मंत्री और अफसर लोगों को लात मारते दिखते हैं, धमकाते दिखते हैं, तो सत्ता की साख चौपट हो जाती है। जिस तरह कहा जाता है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है, उसी तरह सत्ता की एक बददिमागी पूरी सत्ता के लिए लोगों के मन में हिकारत और नफरत भर देती है। ऐसे में कुछ लोगों का अच्छा बर्ताव भी लोगों को याद नहीं रहता है।
राज्य सरकार को तुरंत ही इन दोनों बातों पर ध्यान देना चाहिए। अकेले बस्तर के अफसरों की हरकतें इस राज्य की सारी कामयाबी को खबरों से परे धकेल रही है और लोकतंत्र में रमन-सरकार को यह बहुत भारी पड़ रहा है। 

क्षेत्रीय दलों के लगातार कब्जे और राष्ट्रीय दलों पर दबाव

संपादकीय
20 मई  2016
कल पांच राज्यों के जो चुनावी नतीजे सामने आए, उनसे देश भर में भाजपा में कामयाबी की एक खुशी दौड़ गई है, लेकिन देश की व्यापक राजनीतिक तस्वीर को देखने वालों को यह बात भी समझ आई कि असम तो एक राष्ट्रीय पार्टी के हाथ से निकलकर दूसरी राष्ट्रीय पार्टी के हाथ गया, लेकिन दो बड़े राज्य तमिलनाडु और बंगाल दोनों ही किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की पहुंच से खासे दूर बने हुए हैं, और तो और वे किसी राष्ट्रीय पार्टी के गठबंधन वाली स्थानीय पार्टी से भी दूर बने हुए हैं। ममता और जयललिता ने क्षेत्रीय पार्टियों के अकेले लडऩे और कामयाबी पाने का एक अलग रिकॉर्ड बनाया है। और इसके साथ ही यह भी सवाल उठता है कि देश में क्षेत्रीय पार्टियों की राष्ट्रीय राजनीति में क्या भूमिका है, और देश के अगले आम चुनावों में इन पार्टियों के गठबंधन का राष्ट्रीय सरकार पर कैसा असर पड़ेगा।
क्षेत्रीय पार्टियों के लगातार दबदबे वाले कुछ राज्यों को देखें तो बंगाल और तमिलनाडु के अलावा आंध्र और तेलंगाना क्षेत्रीय पार्टियों के कब्जे में बने हुए हैं, कश्मीर और पंजाब, बिहार और यूपी, ओडिशा और उत्तर-पूर्व के कुछ छोटे राज्य भी क्षेत्रीय पार्टियों के कब्जे में हैं। एक मजबूत केन्द्र और उसके नियंत्रण में चलने वाली राज्य सरकारों के हिमायती लोग क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत और बढ़ती कामयाबी के खिलाफ रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में लगातार क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने आपको किसी भी तरह के राष्ट्रीय गठबंधन के लिए जरूरी बना लिया है, और उनकी हस्ती को अनदेखा करके कोई राष्ट्रीय सरकार नहीं बन पाई। दूसरी तरफ मौजूदा केन्द्रीय सरकार के साथ एक अनोखी बात यह भी है कि वह एक गठबंधन की सरकार तो है, लेकिन वह सहयोगी दलों के बिना भी अकेले अपने दम पर सरकार बनाने का दम-खम रखने वाली भाजपा की अगुवाई वाली सरकार भी है। केन्द्र चलाने के लिए आज भाजपा को किसी और पार्टी की जरूरत नहीं है, लेकिन राज्यों में जगह-जगह अपने पैर जमाने के लिए उसे क्षेत्रीय दलों की जरूरत है, और इसीलिए वह अभी तक गठबंधन की सरकार में सहयोगियों को साथ लेकर चल रही है। यह एक और बात है कि हाल ही में यह चर्चा शुरू हुई है कि अगले आम चुनाव के पहले भाजपा आन्ध्र और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में अपने आपको इतना मजबूत बना लेना चाहती है कि वह तेलुगुदेशम या शिवसेना के बिना भी चुनाव में उतर सके।
देश की राजनीति में और संघीय ढांचे में पिछले दो दशकों में ही क्षेत्रीय दलों की भूमिका में इतना बड़ा उतार-चढ़ाव आया, और राष्ट्रीय गठबंधनों में वे इस तरह जुड़ते और घटते रहे, कि आज कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए के किसी और गठबंधन में जुड़कर अगला आम चुनाव लडऩे की एक संभावना खड़ी हो गई है। मोदी सरकार के बचे हुए कार्यकाल में यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि क्षेत्रीय पार्टियां किसके साथ जुड़ती हैं, किससे दूर हटती हैं, और अगले राष्ट्रीय गठबंधन में वे कितने हिस्से का दावा करती हैं। एक यह संभावना राजनीतिक विश्लेषणों में उभरकर सामने आती है कि मोदी विरोधी मोर्चे की अगुवाई करते हुए एक क्षेत्रीय दल जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार एक सबसे सर्वमान्य उम्मीदवार हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो शायद पहली बार राष्ट्रीय गठबंधन में चुनाव के पहले से एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता की अगुवाई की एक अलग तरह की मिसाल बनेगी।
अब जहां तक देश की व्यवस्था का सवाल है, तो बहुत से लोग यह मानते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियां देश के हित में नहीं रहतीं, क्योंकि उनकी सोच राज्य के हितों तक सीमित रहती है, और वे अपने राज्य में लोकप्रियता बनाए रखने के लिए अनुपातहीन तरीके से खर्च करती हैं, और केन्द्रीय गठबंधन में अपने दबदबे का इस्तेमाल करके दिल्ली से राज्य के लिए अनुपातहीन अधिक आबंटन लाती हैं। इसके अलावा एक बात यह कही जाती है कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय हितों की क्षेत्रीय पार्टियों की समझ कमजोर होती है और वे केन्द्र सरकार के लिए कई बार दिक्कत बनती हैं। तमिलनाडु की मिसाल गिनाई जाती है जहां पर सरकारें श्रीलंका के साथ भारत के संबंध को लेकर कई बार विदेश नीति पर दबाव डालती हैं। लेकिन हम इन तमाम दबावों के साथ भी क्षेत्रीय पार्टियों की अधिक कामयाबी और देश को चलाने में उनकी अधिक हिस्सेदारी के हिमायती हैं क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर जब किसी एक पार्टी का शासन पर एकाधिकार होता है तो उसके बहुत से नुकसान होते हैं, और भारतीय लोकतंत्र में देश का ढांचा एक संघीय ढांचा है जिसमें राज्यों के अधिकार और उनकी हिस्सेदारी जितनी है उससे अधिक रहनी चाहिए। ऐसे में ममता, जयललिता, के बाद अगर माया की बारी आती है, तो वह क्षेत्रीय दलों के दबदबे को और मजबूत ही करेगी। 

पांच राज्यों की जनता का एक ही फैसला, पंजा मरोड़कर रख दिया

संपादकीय
19 मई  2016
पांच राज्यों की विधानसभाओं के नतीजों को देखें, तो उत्तर-पूर्वी असम में पहली बार भाजपा की सरकार बनना इस चुनाव की सबसे बड़ी बात है। दो दूसरे बड़े राज्यों, बंगाल और तमिलनाडु में सत्तारूढ़ महिला मुख्यमंत्री अपने दम पर चुनाव जिताकर अपनी पार्टी को सत्ता पर बनाए रखने में कामयाब हुई हैं। केरल में कांग्रेस की सरकार का सफाया करके वामपंथी गठबंधन सत्ता पर आया है। एक छोटे राज्य पुदुचेरी में इन शब्दों के लिखे जाने तक कांग्रेस बेहतर हालत में दिख रही है, लेकिन वहां स्थिति साफ नहीं है। और अगर एक वाक्य में इन सभी राज्यों के नतीजों को लिखा जाए तो यह देश से कांग्रेस के सफाए की तरफ एक बड़ा कदम है। उसने असम और केरल दो राज्यों को खोया है, और हासिल तकरीबन कुछ भी नहीं किया है। देश के नक्शे को अगर देखें, तो सबसे नीचे और दक्षिण के तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की दुर्गति सामने आई है, पश्चिम में वह बंगाल में वामपंथियों के साथ मिलकर चुनाव लडऩे के बाद भी सत्ता के कोसों दूर तक नहीं पहुंच पाई, और उत्तर-पूर्व के असम में पन्द्रह बरस की उसकी सरकार छिन गई है। इस तरह दक्षिण से पश्चिम होते हुए उत्तर-पूर्व तक पंजे को चुनावों ने मरोड़कर रख दिया है।
अब अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग स्थितियां हैं, और जाहिर तौर पर भाजपा सबसे बड़ी विजेता बनकर सामने आई है। बिहार के चुनाव में भाजपा की बुरी शिकस्त के बाद उसे ऐसी ही किसी राहत की भारी जरूरत थी, और पिछले दिनों उत्तराखंड विधानसभा में दलबदल और राष्ट्रपति शासन के बाद जो शर्मिंदगी भाजपा को झेलनी पड़ी थी, वह भी इन राज्यों के नतीजों से अब दब गई है। भाजपा तो आने वाले महीनों में उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्यों के चुनाव को लेकर एक तैयारी में जुटी हुई है, और उसे आज के नतीजों से एक बड़ी ताकत भी मिलेगी। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के इन नतीजों से एक ऐसी नसीहत मिल सकती है, जिसका न आज उसके पास कोई इस्तेमाल बचा है, और न ही उसके भीतर किसी नसीहत को सुनने की चाहत भी दिखती है। आज टीवी पर कांग्रेस का कोई प्रवक्ता ये कहते सुनाई पड़ रहा था कि कांग्रेस राख से भी उठकर खड़ी होने की ताकत रखती है, लेकिन अपनी इस ताकत को साबित करने के लिए वह जिस लापरवाही के साथ राख में तब्दील हुई है, और होती जा रही है, वह देखना भी भयानक है। हम बीच-बीच में हर कुछ महीनों में कांग्रेस के बारे में फिक्र जाहिर करते हैं कि देश में एक मजबूत विपक्ष का न रहना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है, लेकिन कांग्रेस है कि वह इस तमाम नौबत से बेफिक्र है।
इन चुनावों के स्थानीय मुद्दों से परे उभरकर जो बात सामने आई है, वह वही है जो उत्तरप्रदेश में राहुल गांधी के विकल्प के रूप में प्रियंका गांधी को पेश करने की एक पेशेवर सलाह, और जनभावना की शक्ल में बार-बार दिख रही है। कांग्रेस की अगली लीडरशिप देश के मतदाताओं को हर पहलू से निराश कर रही है। और हमारा यह मानना है कि कांग्रेस के सामने यह पसंद कोई आसान बात नहीं है कि कोई सोनिया-राहुल से यह कह सके कि वे किसी दूसरे जनाधार वाले, और लोकप्रिय नेता को पार्टी की अगुवाई दे दें। ऐसा कहना कांग्रेस के भीतर देशद्रोह जैसा होगा, और ऐसे कुलकलंक को आनन-फानन पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। लेकिन कांग्रेस की किसी भी तरह की कामयाबी में वापिसी का रास्ता राहुल गांधी की अगुवाई में दिख नहीं रहा है। कोई करिश्मा हो जाए और राहुल अचानक लोकप्रिय हो जाएं, तो अलग बात है। लेकिन हम करिश्मों को लेकर कोई विश्लेषण करने की ताकत नहीं रखते हैं।
फिलहाल केरल के चुनाव प्रचार में, और बंगाल के भी चुनाव भाषणों में जिस तरह की कड़वाहट सामने आई थी, उससे उबरने की जरूरत है। भाजपा के बहुत ही तीखे हमलों के बावजूद न ममता की जीत रूक पाई, और न ही केरल में गैरभाजपा, वामपंथी मोर्चा सत्ता में आने से रूका। फिर भी देश के संघीय ढांचे के केन्द्र और राज्यों कड़वाहट छोड़कर देश और प्रदेश के हित में दरियादिली से साथ में काम करना चाहिए। इन चुनावों के बाकी पहलुओं पर इसी जगह आने वाले दिनों में।

राज्यसभा में पहुंचाए गए जमालघोटे के कुछ बीज

संपादकीय
18 मई  2016
भाजपा में बाहर रहकर लौटे हुए सुब्रमण्यम स्वामी को प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर राज्यसभा में लाया गया है। उनकी पहचान वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ लगातार तीखे और सार्वजनिक हमले करने को लेकर है। अब उन्होंने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के खिलाफ एक बहुत ही हमलावर अभियान छेड़ा है, और उन्हें देश के हितों के खिलाफ बताते हुए हटाने की सार्वजनिक मांग लगातार दुहराना शुरू किया है। सुब्रमण्यम स्वामी के काम का तरीका यह भी है कि वे न सिर्फ सार्वजनिक बयान देते हैं, बल्कि औपचारिक चि_ियां लिखकर भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अपनी सोच के मुताबिक कार्रवाई की मांग करते हैं। वे वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ इतना कुछ लिख चुके हैं, और उनके वित्तमंत्री रहते कालाधन देश में न लौटने की बात कह चुके हैं, कि लोगों को उनके राज्यसभा में लाए जाने पर कुछ हैरानी भी हुई है। विपक्ष के कोई भी नेता जेटली पर जितने तीखे हमले कर सकते हैं, उससे अधिक तीखी बातें सुब्रमण्यम स्वामी और राम जेठमलानी जैसे भाजपा सांसद लगातार कहते रहे हैं और यह भाजपा के भीतर का एक बड़ा विरोधाभास भी है। एक तरफ तो आज ही ऐसी चर्चा है कि भाजपा शिवसेना जैसे अपने कटु आलोचक हो गए सहयोगी दल से किनारा करने की सोच रही है, और उसके बाद स्वामी जैसे स्थायी आलोचक को राज्यसभा की भाजपा बेंच पर लाकर पता नहीं पार्टी को आगे कैसी फजीहत देखनी पड़ेगी।
वैसे तो हम घरेलू आलोचकों की तारीफ भी करते हैं कि वे बड़ी गलतियां करने से बचाते हैं, लेकिन फिर भी किसी भी संगठन, संस्था, या सरकार के लिए यह एक फिक्र की बात होती है अगर उसके लोग एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चलाने में लगे रहें, तो उसके भीतर की दरारें भी उजागर होती हैं, और उसकी कमजोरियां भी इस तरह सार्वजनिक होती हैं कि जनता की नजर में वे कमजोरियां चढऩे लगती हैं। राम जेठमलानी और सुब्रमण्यम स्वामी इसी तरह की संपत्ति हैं, जो कब सम्पत्ति से बोझ साबित होने लगें, वह समझना मुश्किल है। राम जेठमलानी को भी भाजपा ने राज्यसभा में भेजा, और वे भी लगातार अरूण जेटली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के दफ्तरों तक लिखते रहते हैं, और खुलकर सार्वजनिक बयान देते रहते हैं। यह एक तरफ तो पार्टी या सरकार के भीतर एक बड़े दिलचस्प और अनोखे लोकतंत्र का सुबूत है, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी जगजाहिर है कि मोदी सरकार और भाजपा में ऐसा लोकतांत्रिक अधिकार और लोगों के खिलाफ हासिल है नहीं।
स्वामी और जेठमलानी जैसे लोग विपक्ष पर हमला करने के लिए तो बहुत अच्छे हैं क्योंकि इनके खुद के ऐसे कोई पुराने कुकर्म नहीं हैं जिन्हें लेकर ये लोगों से दबें, और इनकी जुबान बंद हो जाए। दूसरी तरफ ये दोनों ही लोग कांग्रेस के मुखिया परिवार के खिलाफ बरसों से बहुत ही तीखे तेवरों के साथ हमले करते आए हैं, और भाजपा के भीतर भी ऐसे दूसरे नेता नहीं हैं जो कि ऐसे तेवर रखते हों, लगातार रखते हों, बिना किसी लिहाज के रखते हों। इसलिए भाजपा के भीतर ऐसे लोगों को लाने, और सांसद बनाने का एक इस्तेमाल तो है, लेकिन कब्ज को दूर करने वाले जमालघोटे के बीज का एक इस्तेमाल तो होता है, लेकिन उसकी ताकत से पेट नहीं भरा जा सकता। इसलिए भाजपा के भीतर ये दो नेता, और अभी-अभी समाजवादी पार्टी से राज्यसभा के लिए घोषित अमर सिंह और बेनीप्रसाद वर्मा का इतिहास भी जमालघोटे जैसा ही रहा है, और ऐसे लोग राज्यसभा को बुजुर्गों की एक मनोनीत सभा से बढ़ाकर एक जिंदा और गर्मागर्म बहस की चौपाल बना देंगे। आने वाले दिनों में लोग राज्यसभा कुछ अधिक दिलचस्पी से देख पाएंगे। अब इनकी पार्टियां इसका कितना बड़ा मनोरंजन शुल्क पटाएंगी, यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे।

योग को स्वस्थ जीवन शैली के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत

संपादकीय
17 मई  2016
अभी कुछ दिन पहले कबीरधाम के नए पुलिस अधीक्षक डी रविशंकर की अगुवाई में योग शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें एसपी दफ्तर, पुलिस लाईन, के अलावा थाने और चौकियों से आए हुए पुलिसकर्मियों, और उनके परिवार के बच्चे शामिल हुए। वहीं योग को हर थाने में सुबह अनिवार्य रूप से लागू किया जा रहा है ताकि पुलिसकर्मियों की शारीरिक और मानसिक शक्तियों का विकास हो सके। एक नए जिले में शुरू हुई इस पहल से प्रदेश के दीगर महकमे भी प्रेरणा ले सकते हैं।
भारत हजारों बरस से योग का उपयोग करते आ रहा है, और भारतीय जीवन शैली में पूरे देश में योग प्रचलित भी है, हम अपने अखबार में कई बार इस बात को लिखते आए हैं कि योग और कसरत जैसी जीवन शैली से बीमारियों से बचा जा सकता है, सेहत को बेहतर रखा जा सकता है, और ऐसा होने पर सरकार का भी इलाज का खर्च घटेगा। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को पूरी दुनिया में विश्व योग दिवस मनाने की घोषणा की है।  
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम विचारों की इसी कॉलम में पहले कई बार इस पर लिख चुके हैं और अभी हमारे सामने 31 मार्च 2012 का संपादकीय है जिसमें हमने लिखा था कि हम समाज और सरकार दोनों के स्तर पर एक सेहतमंद जीवनशैली के लिए जागरूकता के एक बड़े अभियान को तुरंत शुरू करने की मांग करते हैं। इसके तहत हर शहर और कस्बे में लोगों के लिए साफ हवा में घूमने-फिरने, कसरत करने, बीमारियों से बचाव की जानकारी पाने, योग और प्राणायाम के विवादहीन तरीकों को बढ़ावा देने का इंतजाम करना चाहिए। एक योजना के तहत सरकार ही जिला स्तर से शुरू करके बाद में और नीचे के स्तर तक ऐसे प्राकृतिक केंद्र विकसित कर सकती है जिनमें पेड़ों के बीच साफ और खुली हवा में ऐसे तमाम काम चल सकते हों। यह बात हम पहले भी सरकार को सुझा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जहां पर कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं, और मंत्रिमंडल में बहुत से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हैं, वहां पर फिर ऐसी जरूरत के लिए जागरूकता आसानी से आनी चाहिए। समाज अपने-आपमें इतने बड़े प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र खुद तो नहीं बना सकता, लेकिन वह सरकार को इसके लिए  तैयार जरूर कर सकता है।
एक और अलग दिन हमने लिखा था कि आज जब बगीचे और मैदान या तो घटते जा रहे हैं या फिर पैदल घूमने लायक सड़कें गंदगी से भरी हुई हैं, उनमें गाडिय़ों का धुआं छाए रहता है, गड्ढे, गोबर और धूल के चलते जहां चलना मुश्किल होता है, वहां पर सुबह-शाम लोग सैर कर सकें, योग या दूसरे किस्म की कसरत कर सकें, खेलकूद सकें ऐसा इंतजाम होना चाहिए। शहरी योजनाओं में कागजों पर तो ऐसा हो जाता है लेकिन जब हर इलाके के बीच ऐसी साफ-सुथरी और खुली हवा वाली जगह की बात करें तो ये घटती चल रही हैं। सरकार या समाज को एक बड़े पैमाने पर योग और साधारण कसरत की मुफ्त ट्रेनिंग देने का इंतजाम भी करना चाहिए ताकि लोग इस पर अमल करें और सेहतमंद रहें।
भारत में योग को एक स्वस्थ जीवन शैली के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत है। योग को धर्म से अलग करके, विवाद और विवादास्पद लोगों से अलग करके हर स्कूल और कॉलेज तक पहुंचाने की जरूरत है। हमने तो बरसों पहले छत्तीसगढ़ सरकार से हर जिले में ऐसे केन्द्र विकसित करने की मांग की थी, और उससे हो सकने वाले फायदों को गिनाया भी था।
राज्य सरकार की नीति में स्कूल शिक्षकों को योग सिखाने की बात तो बरसों से की जा रही है, लेकिन उस पर कोई अमल हो नहीं रहा। और हम स्कूल-कॉलेज से परे भी सभी उम्र के लोगों के लिए मुफ्त योग शिक्षा इसलिए सुझा रहे हैं क्योंकि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे सेहत के खतरे बढ़ते जाते हैं। स्कूल और कॉलेज की उम्र में तो सेहत ऐसी रहती है कि किसी को योग नहीं सूझता। और जब उसकी जरूरत रहती है तो सीखने की उम्र ढलने लगती है। छत्तीसगढ़ को एक सेहतमंद राज्य बनने के लिए बड़े पैमाने पर यह पहल करनी चाहिए, और इसके लिए न तो बिजली लगनी है, न कोई उपकरण लगने हैं, और न ही अधिक खर्च होना है। ऐसा होने पर सरकार का इलाज पर से खर्च घटते भी चले जाएगा।
आज दुनिया में शारीरिक और मानसिक बीमारियां जितनी बढ़ रही हैं, उनकी रोकथाम के लिए योग एक असरदार तरीका हो सकता है, और इससे रोज की जिंदगी की उत्पादकता भी बढ़ सकती है। बिना किसी नारे के, बिना किसी धार्मिक उन्माद के, बिना किसी हमले के योग अधिक शांति के साथ अधिक लोगों के अधिक फायदे का हो सकता है, और वही किया जाना चाहिए।

अपनी सोच वाले कबीले के कैदी

16 मई 2016

इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से, या मोबाइल फोन और उस पर संदेश भेजने के दर्जन भर तरीकों से लोगों को लगता है कि वे पूरी दुनिया से इस कदर जुड़े हुए हैं कि जैसे वे जिंदगी में कभी लोगों से नहीं जुड़े थे। लोगों को लगता है कि सोच का दायरा बढ़ रहा है, विचारों की विविधता से सामना हो रहा है, और पूरी दुनिया एक गांव बनकर रह गई है।
लेकिन मेरी तरह के बहुत से लोग जो सोशल मीडिया का खासा इस्तेमाल करते हैं, और जो फोन पर वॉट्सऐप जैसी चीजों से लोगों को संदेश भेजते हैं और पाते हैं, उन लोगों का तजुर्बा इससे थोड़ा सा हटकर भी रहता है। सोचने-समझने वाले लोग धीरे-धीरे तर्कहीन असहमति से परे होने लगते हैं। पहले फेसबुक या ट्विटर पर ऐसे लोगों को फॉलो करना बंद होता है, फिर उनकी की गई पोस्ट को देखना बंद हो जाता है, फोन पर उनको संदेश भेजने बंद हो जाते हैं, उनके आए हुए संदेश खुलना बंद हो जाते हैं, और एक वक्त ऐसा आता है कि असहमत लोगों की कट्टरता या हिंसा को देखते हुए उन लोगों को ब्लॉक करना शुरू हो जाता है।
नतीजा यह होता है कि जिन लोगों की प्रतिक्रिया हम पाते हैं या देखते हैं, वे धीरे-धीरे हमसे सहमति रखने वाले लोग होने लगते हैं, और सोशल मीडिया नाम का बहुत बड़ा वैचारिक-प्रवाह कहीं-कहीं एक कीर्तन में तब्दील होने लगता है, और कहीं-कहीं वह एक कुआं भी बन जाता है। और सोशल मीडिया के आने के पहले तक तो हम बहुत से दूसरे तरीकों से दुनिया को अखबार या रेडियो की नजरों से देख लेते थे और वहां पर समाचार या विचार की पसंद पर हमारा काबू नहीं था।
नतीजा यह था कि हम अपनी असहमति के बावजूद बहुत सी बातों को देख पाते थे। अब जब से सोशल मीडिया और फोन पर लोगों को ब्लॉक करने की सहूलियत होने लगी है, असहमति को नजरों के सामने भी आने से रोक पाना मुमकिन हो गया है। यह कुछ उसी तरह का है कि जिस तरह ब्रिटेन के इतिहास में एक वक्त इतवार को सड़कों पर यहूदियों के निकलने पर शायद रोक थी, क्योंकि चर्च जाते हुए ईसाई उस जाति के लोगों को देखना नहीं चाहते थे जो कि सूदखोरी की वजह से बुरे माने जाते थे। या ऐसी बातों को देखने के लिए ब्रिटेन क्यों जाएं, खुद हिन्दुस्तान के गांवों में आज तक कई जगहों पर दलितों का कई सवर्ण बस्तियों से गुजरना मना सा है, या वे वहां से जूते पहनकर नहीं जा सकते, या बारात में दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़कर नहीं जा सकता।
मतलब यह कि जो पसंद न हो, उसे नजरों से हटाना पहले कुछ मुश्किल था, लेकिन अब सोशल मीडिया और संचार के हर साधन पर लोगों को ब्लॉक करना बड़ा आसान हो गया है, और हममें से बहुत से लोग रोजाना उसका इस्तेमाल भी करते हैं। इससे आखिरकार होता यह है कि समविचारक या हमख्याल लोग आसपास बच जाते हैं, और दूसरी विचारधारा, या दूसरी सोच रखने वाले लोग मानो बचे ही नहीं हैं। जो इंटरनेट और सोशल मीडिया लोगों को बाकी दुनिया के लिए एक खिड़की की तरह लगता है, वह दरअसल एक कुएं जैसा बन जाने का खतरा भी रहता है, जिसमें हम अपने पसंदीदा मेंढकों के साथ टर्राते हुए यह मान लेते हैं कि दुनिया यही है।
जब अपनी पसंद से चीजों को उठा-उठाकर खाने की बफे पार्टी जैसी सहूलियत हो, तो फिर किसी जानकार विशेषज्ञ के सुझाए खाने, या मां के सोच-समझकर बनाए हुए खाने जैसी समझ की गुंजाइश खत्म हो जाती है। लोगों को जो पसंद रहता है, उससे प्लेट भर जाती है, और फिर पेट भर जाता है। लेकिन बदन की जरूरत के मुताबिक खाने की विविधता धरी रह जाती है। इसी तरह सोशल मीडिया पर समाज और दिल-दिमाग की विविधता की जरूरत धरी रह जाती है, और लोग धीरे-धीरे अपनी पसंद से इतने सिमटते चले जाते हैं कि वे सोच की अपनी रंग के लोगों वाले कबीले में बस जाते हैं।
इसलिए आज अगर दुनिया में लोगों को यह लगता है कि वे इंटरनेट और सोशल मीडिया की बदौलत पूरी दुनिया को एक गांव बनाकर चल रहे हैं, तो इसके साथ-साथ वे अपने आपको एक बहुत छोटे कबीले तक कैद कर लेने का काम कब कर बैठते हैं, यह उनको एहसास भी नहीं होता। मैं इस नौबत की कल्पना करता हूं तो मुझे एक ऐसा इंसान दिखता है जो कि अपने इर्द-गिर्द दीवारें खड़ी करते हुए उसी के भीतर एक कुएं के कैदी सरीखा होकर रह जाता है। ऐसा इसलिए भी होता है कि कम सोचने वाले बहुत से लोग दूसरी सोच रखने वाले लोगों से किसी बहस में उलझना अपने वक्त और अपनी ताकत की बर्बादी समझते हैं। दूसरी तरफ जो अधिक सोचने वाले लोग रहते हैं, उनको लगता है कि अपना वक्त ऐसे लोगों पर क्यों बर्बाद किया जाए, जो कि पहले से किसी बुरे पूर्वाग्रह के शिकंजे में हैं।
और ऐसी बात भी नहीं है कि खुली सोच वाले लोग, खुले दिल-दिमाग से औरों के साथ बहस में नहीं उतरते। लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं, और ऐसे ही लोग आगे बढ़ पाते हैं। जो लोग सोशल मीडिया को भी एक कीर्तन की तरह बना लेते हैं, उनका आगे बढऩा खत्म हो जाता है।
पुराने वक्त से समझदार लोग संगत के बारे में कहते आए हैं कि बुरी संगत लोगों को तबाह कर देती है, दुनिया की किसी संस्कृति में यह भी कहा जाता है कि एक इंसान की चर्चा में उसकी संगति से होती है, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों की संगति महज अच्छी होना काफी नहीं है, वहां पर लोगों को एक विविधता, और एक खुले दिल-दिमाग की विविधता की जरूरत भी पड़ती है। असल जिंदगी में तो लोगों की संगति उनकी हकीकत जानती है, और उनके सामने कोई मुखौटा कामयाब नहीं हो सकता, लेकिन सोशल मीडिया की जिंदगी में बहुत से लोग कई किस्म के मुखौटे लगाए बनावटी बातों को बरसों तक जारी रख सकते हैं, और लोगों की सोच से परे उनके व्यक्तित्व के विकास में यह मुखौटा भी एक बड़ा खतरा बना रहता है।
कुल मिलाकर बात यह है कि जो लोग इंटरनेट और सोशल मीडिया को दुनिया को गांव बना देने वाला तिलस्म मानकर चलते हैं, उनको याद रखना होगा कि यह टोटका लोगों को अपनी सोच जैसी सोच वाले कबीले का कैदी भी बनाकर रख सकता है। लोग धीरे-धीरे अपनी पसंद के एक ऐसे दायरे में कैद हो सकते हैं कि उन्हें उस पसंद से परे की दुनिया का अस्तित्व धीरे-धीरे अनदेखा ही होने लगे। यह सिलसिला जेल की किसी कोठरी में बंद एक ऐसे कैदी जैसा है जिसे कि कुछ किताबें मिली हैं, और वह उन्हीं किताबों को दुनिया के छपे हुए शब्द मानकर उन्हीं के बीच कैद है।
एक तरफ इंटरनेट पर जानकारी, समाचार और विचार का ऐसा विस्तार है कि इंसान उस पर चाहें तो एक ऐसी चींटी की तरह बन सकते हैं जो कि पत्ते-पत्ते पर जाते हुए कभी सफर पूरा न कर सके क्योंकि नए पत्तों के आने की रफ्तार उसके सफर से कहीं अधिक  तेज होती है। लेकिन वह चींटी अगर चाहे तो पेड़ों पर कुछ पत्तों को जोड़कर उसका एक घोंसला सा बनाकर उसके भीतर पूरी जिंदगी गुजार सकती है। आज सोशल मीडिया पर इंसान की हालत कुछ ऐसी ही है कि वे या तो आजाद पंछी की तरह अंतहीन आसमान में उड़ते रहें, या फिर एक कुएं की गहराई में एक मेंढक की तरह रहकर उसे ही पूरी दुनिया मान लें। 

जमीन तले के पानी सरीखे हिंसा दूर तक जाती है...

संपादकीय
16 मई  2016
बांग्लादेश के एक बौद्ध मठ में सत्तर बरस के एक बौद्ध भिक्षु की गला काटकर हत्या कर दी गई। ऐसा माना जा रहा है कि वहां के कट्टरपंथी मुस्लिमों ने यह हत्या की है। बांग्लादेश में पिछले कुछ वक्त से धर्मनिरपेक्ष या उदारवादी ब्लॉगरों की भी हत्याएं हो रही हैं और वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों की भी। लेकिन इस ताजा बौद्ध-हत्या के पीछे ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि पड़ोस के म्यांमार में बौद्ध लोगों द्वारा मारे जा रहे रोहिंग्या-मुस्लिमों की मौत का बदला लेना चाह रहे हों। ऐसी प्रतिक्रियाएं एक देश से दूसरे देश भी सफर करती हैं, और देश के भीतर भी एक इलाके की हिंसा दूसरे इलाके में हिंसा बनकर एक ट्रक में गाय-बैल ले जाते कश्मीरी ड्राइवर-कंडक्टर को मारा गया, तो मानो उसके जवाब में कुछ हफ्ते-महीने बाद बकरीद पर कश्मीर में गायों की  कुर्बानी दी गई जो कि एक नई बात थी।
आज खाड़ी के और अफ्रीका के कुछ देशों में इस्लाम के नाम पर बड़े पैमाने पर हिंसा की प्रतिक्रिया योरप और अमरीका जैसे देशों में मुस्लिम आबादी और मुस्लिम शरणार्थियों के प्रति नफरत की शक्ल में सामने आ रही है। योरप के शांत देशों में भी नवनाजीवादी नस्लभेदी सड़कों पर हैं और फिर हिटलर के नामलेवा खबरों में हैं। इस तरह इस्लामी आतंकवाद ऐसे हिंसाग्रस्त देशों में तो मुस्लिमों को ही मार रहा है, वह बाकी देशों में भी मुस्लिमों को शक से लाद रहा है। साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा ही ध्रुवीकरण चाहती भी हैं, लेकिन सभ्य और समझदार लोकतंत्र वाले देश अपनी पूरी ताकत से ऐसी नौबत से जूझ रहे हैं और इसीलिए लंदन में एक मुस्लिम मेयर चुना जा रहा है, तमाम साम्प्रदायिक प्रोपेगंडा के बावजूद।
भारत में जो लोग मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को हवा देते हैं, वे न देखे हुए लोग हैं। वे यह समझ नहीं सकते कि इसकी कैसी प्रतिक्रिया मुस्लिम या इस्लामी देशों में काम करने वाले हिंदुस्तानियों को झेलनी पड़ती है। खुद हिंदुस्तान के भीतर धर्मों के बीच का तनाव, क्षेत्रीयता के बीच का तनाव लोगों का बड़ा नुकसान करता है। कई बार उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिंदीभाषी लोगों को चुन-चुनकर थोक में मारा जाता है। कभी यह बाकी हिंदुस्तान में उत्तर-पूर्वी लोगों के साथ हिंसा के जवाब में होता है, तो कभी उत्तर-पूर्व की हिंसा के जवाब में बाकी हिंदुस्तान में हिंसा होती है।
आमतौर पर ऐसी हिंसा वे लोग करते हैं, जो अपने इलाकों में हिफाजत से जीते रहते हैं। जिनके घरों के लोग दूसरे देश-प्रदेश में दूसरी जाति, धर्म, रंग के लोगों के साथ जी रहे हैं, वे अपने इलाकों में भी हिंसा से बचते हैं, दूर रहते हैं। नेहरू के वक्त से राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक-उद्योगों और राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों ने देश को एकजुट रखने का बहुत बड़ा काम किया था। बांग्लादेश-पाकिस्तान, या म्यांमार जिस तरीके से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के शिकार हैं, उसका नुकसान दूर तक और देर तक होगा। भारत के सबसे बड़े बौद्ध धर्म स्थल बोधगया में कुछ बरस पहले आतंकी धमाके हुए तो उन्हें म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड में मुस्लिमों द्वारा बौद्ध लोगों की हत्याओं का जवाब बताया गया और कई मुस्लिम गिरफ्तार भी हुए। श्रीलंका ने तो यह शक भी जाहिर किया था कि इसके पीछे श्रीलंकाई तमिलों का आतंकी संगठन लिट्टे भी हो सकता है जिसे कि श्रीलंका में बौद्ध-बहुल सरकार के हाथों हिंसा झेलनी पड़ती है।
सभी लोगों को हिंसा से बचना चाहिए क्योंकि हिंसा जमीन के भीतर के पानी सरीखी होती है, जो बहकर कितने दूर तक जाता है या ऊपर से पता नहीं चलता। 

एक हत्या पर बिहार में जंगलराज तो तीन हत्या पर गुजरात में क्या?

संपादकीय
15 मई  2016
बिहार में एक सड़क-हत्या में सत्तारूढ़ पार्टी की एक विधायक के बेटे के शामिल होने की वजह से वह मुद्दा खासा गंभीर हो गया है। और फिर दो-चार दिनों के भीतर ही बिहार में एक पत्रकार की हत्या हुई, हालांकि पड़ोस में भाजपा के शासन वाले झारखंड में भी एक पत्रकार को मारा गया। बिहार की इन दो घटनाओं को लेकर भाजपा ने राज्य की नीतीश-लालू सरकार पर हमला बोला है कि इस राज्य में जंगलराज आ गया है। हालांकि कल एनडीटीवी के एक रिपोर्टर ने बिहार के भाजपा नेता सुशील मोदी के बात करते हुए उनको ये आंकड़े भी गिनाए कि पिछले तीन बरसों में बिहार में हत्या के आंकड़े लगातार गिरे हैं। लेकिन पटना से लेकर दिल्ली तक बिहार को जंगलराज के लिए इतनी जोरों से कोसा गया, कि कल जब भाजपा सरकार वाले गुजरात में तीन लोगों की सड़क पर हत्या हो गई, तो अब उसे जंगलराज कहा जाए, या उसे देखते हुए भी बिहार को ही जंगलराज कहा जाए, यह दुविधा भाजपा के भीतर जरूर खड़ी होगी। और गुजरात में तो जिनकी हत्या हुई है उनमें से एक तो विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा के चचेरे भाई भी हैं, जो कि स्थानीय म्युनिसिपल में विपक्ष और कांग्रेस के नेता भी हैं। सूरत शहर में इसके अलावा उनके साथ के दो और लोगों का जो कत्ल हुआ है, वह भी गुजरात के इस कारोबारी शहर को हिला गया है।
दरअसल देश में चलते हुए चुनावी माहौल को देखते हुए सभी पार्टियों के लोग छोटी घटनाओं को भी अनुपात से अधिक बढ़ाकर इतने तेज हमले करने लगे हैं, कि उससे वापिस लौटना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। एक हत्या पर जंगलराज, तो तीन हत्याओं पर कौन सा राज कहा जाएगा? लोगों को यह याद रखना चाहिए कि कई तरह के जुर्म और हादसे किसी भी राजनीतिक दल की चलाई जाती सरकार के तहत हो सकते हैं। उनको अगर एक सीमा से अधिक उठाकर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, तो हो सकता है कि उससे बड़ा अपराध अपनी ही पार्टी की सरकार में सामने आने पर बोलती बंद हो जाए। हमारा ख्याल है कि पटना में भाजपा का चलाया जा रहा जंगल-राज नारे वाला आंदोलन गुजरात की कल की हत्याओं के बाद ठंडा हो जाएगा।
इसी बीच एक दूसरा मामला सामने आया। केरल में चुनाव प्रचार के लिए गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केरल की तुलना अफ्रीका के भुखमरी के शिकार देश सोमालिया से कर दी। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने आनन-फानन भारत के प्रदेशों के मानव विकास के आंकड़े सामने रख दिए, जिनमें से दर्जन भर से अधिक पैमानों पर केरल गुजरात के मुकाबले मीलों आगे दिखता है। बैठे-ठाले गुजरात की कमियां जनचर्चा का सामान बन गईं। इसके बाद कल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मोदी के सोमालिया वाले बयान को सही साबित करने के लिए एक पत्रिका का कवर पेज मीडिया के सामने पेश किया जिसमें केरल के कुपोषण पर एक रिपोर्ट थी, और एक मरणासन्न बच्चा मां की गोद में बड़ी कमजोर हालत में दिख रहा था। अब पत्रिका का यह पुराना अंक भाजपा के तर्क में काम आ पाता, इसके पहले ही लोगों को यह याद पडऩे लगा कि यह तस्वीर तो पहले कहीं देखी हुई है। और दरअसल इस बच्चे की यह तस्वीर कुछ बरस पहले गुजरात के चुनाव-अभियान में कांग्रेस ने भाजपा सरकार के खिलाफ छापी थी कि गुजरात में कितना कुपोषण है। उसके तुरंत बाद हमारे अखबार सहित बहुत से अखबारों ने कांग्रेस के विज्ञापन का झूठ उजागर किया था कि यह तस्वीर तो श्रीलंका के एक बच्चे की है, और उसे गुजरात का कुपोषण बताने के लिए छापा गया। बात वहीं तक नहीं रूकी, देश की एक प्रमुख पत्रिका, आउटलुक ने अपने कवर पेज पर इस तस्वीर को केरल के कुपोषण के साथ छाप दिया। और उस कवर पेज को कल अमित शाह ने केरल की कांग्रेस सरकार के खिलाफ, वहां के कुपोषण के खिलाफ एक सुबूत की तरह पेश कर दिया, और यह बात उनके ध्यान से उतर गई कि यह तस्वीर तो उनके अपने गुजरात में, उनकी अपनी भाजपा सरकार के खिलाफ इस्तेमाल हो चुकी है, और उसे लेकर कांग्रेस को खासी शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी थी।
राजनीति में जब सार्वजनिक जीवन की घटनाओं को लेकर कड़वाहट बहुत अधिक फैलने लगती है, तो उसे समेटना मुश्किल पड़ता है। हर पार्टी के राज में कुछ न कुछ गलतियां होते चलती हैं, यह विपक्ष की जिम्मेदारी भी रहती है कि इन घटनाओं को उठाए, और जनता को जागरूक रखे। लेकिन जब सच को भूलकर, या झूठी तस्वीरों का सहारा लेकर, या अनुपातहीन तरीके से आक्रामकता के साथ राजनीति की जाती है, तो वह घूम-फिरकर हमलावर पर चोट करने के लिए आती ही है।

हरियाणा पुलिस की नाकाबिलीयत पर रिपोर्ट, बाकी राज्य भी सोचें

संपादकीय
14 मई  2016
हरियाणा में कुछ महीने पहले हुए जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान एकाएक भड़की हिंसा और बेकाबू प्रशासन की जांच रिपोर्ट देश के एक प्रमुख रिटायर्ड पुलिस आला अफसर प्रकाश सिंह ने वहां के मुख्यमंत्री को दे दी है। इस रिपोर्ट के बाद उन्होंने मीडिया को इसके बारे में कुछ बातें बताई हैं जिनमें उन्होंने हरियाणा पुलिस को किसी भी चुनौती का सामना करने में नाकाबिल करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि जाट आंदोलन के दौरान हरियाणा के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी जातिवाद में पूरी तरह जकड़े हुए थे और उन्होंने लोगों को हिंसा से बचाने के बजाय खुद की हिफाजत करना जरूरी समझा। इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इन अफसरों ने बातचीत के दौरान यह मंजूर करने में कोई हिचक नहीं दिखाई कि वे अपनी जान बचाने के लिए हिंसा की जगह छोड़कर भाग खड़े हुए थे। कमेटी ने कहा है कि यदि पुलिस में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में राज्य की पुलिस किसी चुनौती का सामना नहीं कर पाएगी।
हरियाणा की भाजपा सरकार के लिए यह एक फिक्र की रिपोर्ट है क्योंकि यहां की पुलिस आए दिन दिल्ली के काम भी आती है, और दिल्ली के साथ हरियाणा की सरहद इतनी मिली हुई है कि अगर यहां पुलिस नाकाबिल है तो दिल्ली भी खतरे में है। दूसरी बात यह कि दिल्ली की पुलिस में हरियाणा से गए हुए कर्मचारी बड़ी संख्या में हैं, और हो सकता है कि ऐसा ही खतरा दिल्ली पर भी मंडरा रहा हो।
लेकिन बात महज हरियाणा को कोसने की नहीं है। गुजरात के दंगों में देश ने देखा है कि किस तरह पुलिस ने एक घोर साम्प्रदायिक रूख दिखाया था, और बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को खुलकर छूट दी थी कि वह खुलकर मुस्लिमों पर हिंसा कर सके। इसके अलावा भी देश भर में जगह-जगह पुलिस ने अल्पसंख्यकों की बहुत ही कम मौजूदगी को लोग फिक्र की बात मानते हैं कि किसी तनाव की हालत में पुलिस में बहुसंख्यक तबके की बहुतायत एक खतरनाक असंतुलन पैदा करती है। लेकिन यह बात सिर्फ पुलिस में काम करने वाले लोगों के जाति और धर्म की नहीं है। भारत में कई बार यह बात उठी है कि पुलिस जितने राजनीतिक दबाव में काम करती है, वह एक खतरनाक बात है। पुलिस का इंसाफ का नजरिया अपनी खुद की कुर्सी तले दब जाता है, और वे तबादले के डर से, कम कमाई वाली जगह पर जाने के डर से, ईमानदारी से काम नहीं करते।
ऐसे में पुलिस सुधार के लिए देश में समय-समय पर जो बहुत सी रिपोर्ट सरकार को दी गई हैं, उन पर कोई भी कार्रवाई न करने पर भी आज सोचने की जरूरत है। दूसरी बात यह भी है कि हरियाणा सरकार से मांगकर यह रिपोर्ट बाकी राज्य सरकारों को भी देखनी चाहिए क्योंकि ऐसी नौबत दूसरे राज्यों में भी आ सकती है, समय-समय पर आती है। पुलिस को एक पेशेवर सोच देना, और उसकी नजरिए में इंसाफ लेकर आना एक आसान बात नहीं है, और इसमें एक पूरी पीढ़ी का वक्त खर्च हो सकता है। सरकारें पांच-पांच बरस के टुकड़ों में अपने नफे-नुकसान को देखते हैं, और यही नतीजा होता है कि पुलिस की दीर्घकालीन कसावट किसी की भी प्राथमिकता नहीं रहती। अब कल के दिन अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसे किसी मामले में सरकार के कामकाज में दखल देने पर उतारू हो जाएगी, तो गडकरी से लेकर जेटली तक कई लोग जजों को यह सलाह देने लगेंगे कि जजों को अगर सरकार ही चलाने का शौक है तो वे कुर्सी छोड़कर चुनाव लड़ें, और फिर सरकार चलाएं। लेकिन देश की जनता से अगर पूछें तो सरकार के रवैये से थकी हुई जनता जजों की दखल को देश के लिए अकेली उम्मीद मानती है। हरियाणा की पुलिस के बारे में आई इस रिपोर्ट को लेकर देश के बाकी राज्यों में भी विचार होना चाहिए, और कोई बुरी बात नहीं होगी अगर देश की संसद में भी इस पर चर्चा का कोई रास्ता निकाला जा सके।

सवा सौ साल पुरानी पार्टी एक कुनबे के कंधों पर

संपादकीय
13 मई  2016
उत्तरप्रदेश में सामने खड़े चुनावों को लेकर सबसे अधिक खबरें वहां की सबसे कमजोर कांग्रेस पार्टी के भीतर से आ रही हैं। और ये खबरें इस पार्टी के दीवालिया हो जाने के सुबूत लेकर आ रही हैं। प्रशांत किशोर नाम का एक चुनाव विश्लेषक और चुनाव योजनाकार पहले मोदी और फिर नीतीश के लिए कामयाबी जुटाकर एक करिश्मासाज की तरह खबरों में हैं, और यह भी खबर है कि वह इस बार पंजाब और उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की नैय्या पार लगाने में लगा है। इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि भारत का लोकतंत्र अगर इस तरह के चुनावी मैनेजमेंट के असर में जीत या हार तय करने लगा है, तो यह बहुत ही फिक्र की बात है, और शर्मनाक हालत भी है। लेकिन दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश और दिल्ली से कांग्रेस की जो बार-बार खबरें आ रही हैं, वे बताती हैं कि प्रियंका गांधी को उत्तरप्रदेश की भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने की सलाह दी गई है, और इसके साथ-साथ इस प्रदेश से यह मांग भी उठ रही है कि प्रियंका को इस राज्य की कांग्रेस की कमान दी जाए। अब जो महिला आज तक कांग्रेस में औपचारिक रूप से कभी नहीं रही, और जिसका सारा राजनीतिक योगदान अपने परिवार की दो लोकसभा सीटों पर मां और भाई की तरफ से काम करने तक सीमित रहा, आज कांग्रेस पार्टी उसी में अपनी सबसे बड़ी संभावना देख रही है।
यह देश, यहां का लोकतंत्र, और यहां के लोगों की सोच, कुनबापरस्ती की इस कदर मोहताज हो गई है, कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी, और अब प्रियंका गांधी तक इस पार्टी की संभावनाएं सीमित हो गई हैं। सवा सौ साल पुरानी और देश पर सबसे लंबे समय तक राज करने वाली पार्टी आज ऐसे गिने-चुने तीन लोगों पर आश्रित है जिन तीनों को अनमने ढंग से राजनीति करते देखा जा सकता है, और जो तीनों लोग दो संसदीय सीटों को छोड़कर बाकी देश की जनता के साथ सीधे जुड़ भी नहीं पाते हैं। यह पार्टी इस परिवार के करिश्मे पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचने के सपने देखती रहती हैं, और इसके साथ एक सबसे बड़ी दिक्कत, सबसे बड़ा खतरा यह भी है कि इस परिवार से परे यह पार्टी किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती।
जहां तक सरकार चलाने की बात है, तो सोनिया गांधी ने एक वक्त बड़ी समझदारी से काम लेकर उस वक्त की एक सबसे अच्छी पसंद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। लेकिन अब न तो इस पार्टी के पास ऐसी कोई नौबत आते दिखती है, और न ही राजनीतिक लीडरशिप परिवार से परे किसी और को देने की सोच कांग्रेस में संभव है। हकीकत यह है कि बहुत से राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि सोनिया के बाद राहुल गांधी को लीडरशिप देना कांग्रेस के लिए एक ताकत नहीं, एक कमजोरी रहने वाली है। जब इस पार्टी का पूरे देश में लीडरशिप के दीवालियापन का यह हाल है, तो फिर इसी पार्टी की एक दूसरी सदस्य को उत्तरप्रदेश की कमान देकर कांग्रेस महज यह साबित कर सकती है कि यह एक पार्टी नहीं, एक परिवार के कंधों पर बैठे हुए परजीवी लोगों की एक टोली है।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी, जिसका कि देश के अधिकतर राज्यों में कुछ न कुछ जनाधार रहा है, उसकी ऐसी नौबत बहुत ही खतरनाक है। एक मजबूत विपक्ष के बिना कोई एक पार्टी की अंधाधुंध बाहुबल वाली सरकार किस तरह से चलती है, यह राजीव गांधी के समय शाहबानो के मामले में देखने मिला था, और आज मोदी सरकार में भी देखने मिल रहा है। इसलिए देश के लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष उतना ही जरूरी है जितना कि एक काबिल और जिम्मेदार सरकार। कांग्रेस एक संगठन के रूप में अपने आपको खो चुकी है, और सोनिया कुनबे के दो-तीन लोगों के निजी करिश्मे पर टिकी हुई है। आने वाले दिन उत्तरप्रदेश और बाकी देश में कांग्रेस का चाहे जो भविष्य साबित करें, कांग्रेस की यह कमजोरी तो आज भी साबित हो ही चुकी है कि इस पार्टी के पास सोनिया-राहुल-प्रियंका से परे कुछ सोच पाने की सोच रह नहीं गई है, और उसकी संभावना भी नहीं है। इस पार्टी का एक परिवार के नियंत्रण को बचाना, या इस पार्टी को बचाना, ये दो अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं, और कांग्रेस की आज की प्राथमिकता हो सकता है कि उसके हाथ सबसे अच्छा विकल्प हो, लेकिन यह अच्छा विकल्प बिल्कुल नहीं है। एक पार्टी को पार्टी की तरह चलना भी सीखना चाहिए, यह एक और बात है कि भारत में राष्ट्रीय स्तर पर और अनगिनत प्रादेशिक मामलों में भी व्यक्तिवादी और परिवारवादी पार्टियों का राज देखा है, और इस देश की संस्कृति शायद उसके साथ जीना सीख चुकी है।

गैरजरूरी और नाजायज बयानों से राज्य को बचने की जरूरत

संपादकीय
12 मई  2016
छत्तीसगढ़ के स्कूल-शिक्षा मंत्री केदार कश्यप ने एक बयान दे दिया कि छात्राओं को मेकअप की तरफ ध्यान देने के बजाय पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना चाहिए। इसको लेकर कई लोगों में नाराजगी हुई है, और प्रदेश की महिला-बाल विकास मंत्री रमशीला साहू ने इससे असहमति भी जाहिर की है, और रायपुर में कुछ लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन भी किया है। आज बारहवीं तक की पढ़ाई के लिए लड़के-लड़कियां 18 बरस के भी हो जाते हैं, और ऐसे में जाहिर है कि उनमें से कुछ लोग कुछ फैशन भी करते होंगे, और कुछ लोग मेकअप भी करते होंगे। लेकिन वक्त की जरूरत और चलन के मुताबिक अगर बच्चों को इतनी भी रियायत नहीं होगी, तो उससे उनके व्यक्तित्व विकास और आत्मविश्वास दोनों पर फर्क पड़ सकता है। अब जमाना गुरुकुल का नहीं रह गया है जहां पर सिर मुंडाए हुए लड़कों को शिक्षा दी जाती थी, और लड़कियों के लिए शायद उस वक्त शिक्षा थी भी नहीं।
लेकिन हम इस एक बयान को लेकर बात को शुरू और खत्म करना नहीं चाहते। अभी कुछ ही दिन हुए हैं कि पंचायत और स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने अपनी नियमित छवि के मुताबिक अधिकारियों के साथ कुछ आपत्तिजनक बातें सार्वजनिक रूप से कहीं, और फिर मीडिया में उनके आने पर उन्होंने मीडिया को यह नसीहत दी कि सरकार के विकास कार्यों और लोक सुराज के मुद्दों पर मीडिया ध्यान दे, और अपनी कही बातों के लिए बचाव का कोई तर्क उनके पास नहीं था। उन्होंने मीडिया को काम सिखाने के लिए प्रदेश में बनाए गए पत्रकारिता विश्वविद्यालय की याद भी दिलाई, लेकिन वे खुद गैरजरूरी आपत्तिजनक बातें करने और कहने से कैसे बच सकते थे, इसके बारे में कोई अफसोस उनके बयानों में नहीं था।
छत्तीसगढ़ में ऐसे बयानों से बाकी देश और मध्यप्रदेश जैसी नौबत आ रही है, जहां पर कि मोदी सरकार के मंत्रियों, शिवराज सरकार के मंत्रियों की कही हुई आपत्तिजनक बातों से मीडिया में मौजूद जगह भर जाती हैं, और अगर उन सरकारों की कोई कामयाबी है, तो उसके लिए जगह घटती चली जाती है। हमारा यह मानना है कि मीडिया को नसीहत देने का हक नेताओं को उसी तरह का है जिस तरह की मीडिया रोजाना नेताओं को नसीहत देता है। लेकिन फिर भी सरकार में बैठे हुए लोगों को यह समझने की जरूरत है कि वे मीडिया को या जनता को इतना मौका तो दें कि वे सरकार की कामयाबी के बारे में पढ़ सकें, देख सकें, सोच सकें। अगर निहायत गैरजरूरी और नाजायज बातों और बर्ताव से सार्वजनिक जीवन को भर दिया जाएगा, तो यह जाहिर है कि सरकार के अच्छे कामों को लोगों के बीच जिस महत्व का हक है, वह महत्व सबसे पहले इसका शिकार होगा।
छत्तीसगढ़ में यही हाल बस्तर को लेकर चल रहा था और सरकार के विकास कार्यों की तरफ देश का ध्यान भी नहीं जा रहा था क्योंकि वहां पर पुलिस जिस अंदाज में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मामले गढ़कर उन्हें प्रताडि़त करने में लगी हुई थी, पूरे देश और दुनिया का ध्यान महज वहीं फंसकर रह जा रहा था। बार-बार जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सरकार के इस नुकसान के बारे में देश भर से कहा गया, तो जाकर बस्तर की बेकाबू पुलिस को लोकतंत्र के दायरे में रहने के लिए कहा गया, और पिछले कुछ हफ्तों से पुलिस ज्यादती और मानवाधिकार हनन की खबरें घटी हैं, और अब हो सकता है कि सरकार के विकास की कोशिशों की खबरों को जगह मिल पाए। लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन में मुफ्त में हासिल जगह का इस्तेमाल या बेजा इस्तेमाल, नेता और अफसर अपनी मर्जी और पसंद से कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को इस बारे में ध्यान देना चाहिए कि गैरजरूरी विवादों से बचकर वह किस तरह जनता तक जनकल्याण की बातों को पहुंचा सकती है, और लोकतंत्र को अधिक कामयाब बना सकती है। आज पूरे देश में गैरजरूरी बयानों की वजह से ऐसा माहौल बना हुआ है कि इनके अलावा देश में और कोई खबर नहीं है, और कोई काम नहीं हो रहा है। यह नौबत छत्तीसगढ़ में और आगे न बढ़े इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ऐसी हर कड़वी बात के साथ मीडिया और जनता को ऐसे लोगों से जुड़ी हुई पुरानी बहुत सी बातें भी याद पडऩे लगती हैं, और जितना नुकसान ऐसे बयान देने वालों का होता है, उससे कई गुना अधिक नुकसान सरकार की छवि का होता है, और जनकल्याण के मुद्दों का होता है। 

उत्तराखंड से केन्द्र सरकार को सबक की जरूरत, कांग्रेस को भी

संपादकीय
11 मई  2016
उत्तराखंड में जिस तरह कांग्रेस विधायकों की बगावत के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया, उसे उत्तराखंड हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई तरह की शिकस्त झेलनी पड़ी, और सुप्रीम कोर्ट ने जितनी कड़ी बातें केन्द्र सरकार के खिलाफ कही हैं, वे भी केन्द्र-राज्य संबंधों के इतिहास में दर्ज हो गई हैं। दूसरी तरफ विधानसभा के शक्ति परीक्षण में जिस तरह कांग्रेस लौटकर सत्ता में आई है, उससे भी केन्द्र की एनडीए सरकार की एक शर्मनाक राजनीतिक पराजय हुई है। और भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब किसी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की नीयत से, या उसे बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया है, उसे जनता ने खूब समझा है। और राज्यपाल जिस तरह से केन्द्र सरकार के अंग्रेज-एजेंट की तरह काम करते हैं, वह भी दर्जनों बार दर्ज हो चुका है। लेकिन किसी राज्य में सत्ता को पलटने को केन्द्र सरकार आमतौर पर एक राजनीतिक-कामयाबी मानती है, और उसी के तहत उत्तराखंड में यह सब हुआ।
उत्तराखंड सन् 2000 में बनाए गए तीन नए राज्यों में से एक है, और झारखंड के साथ-साथ इस पहाड़ी राज्य में भी भाजपा मुख्यमंत्री और कांग्रेस मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत होते आई है। लोगों को याद होगा कि इस राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री भी कार्यकाल के बीच ही बदले गए, और इन पन्द्रह बरसों में यह राज्य दस मुख्यमंत्री देख चुका है। कुछ मुख्यमंत्री तो साल-दो साल या छह महीने के लिए ही आए और गए, एक मुख्यमंत्री को कुल चार महीने मिले, और यह सिलसिला कांग्रेस की मौजूदा सरकार में भी जारी रखने की कोशिश हुई थी। लेकिन उत्तराखंड में हरीश रावत की कांग्रेस सरकार पर से टले हुए इस मौजूदा खतरे को लेकर कांग्रेस और रावत को खुश होने की जरूरत कम है, सम्हलने की जरूरत अधिक। इस छोटे से राज्य में विधायकों की संख्या कुल 70 है, और ऐसे में जरा सी बगावत भी मुख्यमंत्री को देहरादून की पहाड़ी से नीचे धकेल सकती है। कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि किसी एक कुनबे को जरूरत से अधिक मजबूत करने का क्या नतीजा होता है। एक रीता बहुगुणा को उत्तरप्रदेश कांग्रेस का कर्ताधर्ता बना दिया गया था, और उन्हीं के भाई विजय बहुगुणा को उत्तराखंड में कांग्रेस ने लंबे समय से बहुत बढ़ावा दिया था। नतीजा यह निकला कि जिसे कांग्रेस ने अभी दो बरस पहले मुख्यमंत्री रखा था, उसी ने विधायकों में बगावत करवाई, और सरकार गिरवाई। कांग्रेस को बाकी देश में भी कुनबापरस्ती से बचना चाहिए। कांग्रेस को यह नसीहत देना आसान है, लेकिन जो पार्टी कुनबापरस्ती की बुनियाद पर ही चल रही है, वह किस मुंह से राज्यों में कुछ परिवारों की सामंती को रोक सकती है, यह कहना कुछ मुश्किल है। लेकिन फिर भी हकीकत यही है कि अगर कांग्रेस, या किसी भी दूसरी पार्टी को अपनी बुनियाद मजबूत करनी है, तो उसे कुछ कुनबों को इस तरह बढ़ावा देना बंद करना होगा। भाई-बहन ने मिलकर दो राज्यों में कांग्रेस को चौपट कर दिया।
लेकिन आज का एक दूसरा मुद्दा यह है कि केन्द्र में जो भी सरकार रहे, उसे राज्यों को अस्थिर करने की अपनी संवैधानिक ताकत से बचना चाहिए। इससे न केवल आनन-फानन शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है, बल्कि जनता भी चुनाव के वक्त ऐसी अलोकतांत्रिक बातों को याद रखती है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार से काफी कुछ कह चुका है, लेकिन मोदी सरकार जितने विशाल बहुमत से आई है, और जिस तरह केन्द्र का गठबंधन चलाने के लिए उसे किसी दूसरी पार्टी की जरूरत नहीं है, उसके चलते हुए ऐसी गलतियां होना आसान है। आजकल में ही हमने शिवसेना के उठाए हुए मुद्दों पर लिखा था, और मोदी सरकार को बहुमत के बाहुबल से होने वाली गलतियों से अपने आपको बचाना चाहिए। बाहुबल से किया गया एक गलत काम बिहार की सड़कों पर दो-चार दिन पहले ही दिखा है, और उसका नतीजा भी दिखा है।

अदालती कार्रवाई से परे सोनिया पर हमले आत्मघाती साबित होंगे

संपादकीय
10 मई  2016
इटैलियन हेलीकॉप्टर खरीदी में घोटाले को लेकर भारत की राजनीति में चल रही आंधी के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केरल की चुनावी सभा में सोनिया गांधी पर जब बहुत ही तेज और निजी हमले किए, तो भाजपा की देश की सबसे पुरानी सहयोग पार्टी, शिवसेना भी चुप नहीं रह सकी। पार्टी के नेता उद्धव ठाकरे ने आगाह किया कि अगर सरकार के पास सोनिया गांधी के खिलाफ सबूत हैं, तो नरमी न बरते, लेकिन अगर सबूत नहीं है, तो इस तरह से राजनीतिक हमले करने से सोनिया गांधी को उसी तरह का फायदा हो सकता है, जैसा फायदा जनता पार्टी की सरकार आने के बाद इंदिरा गांधी के पीछे लगने पर इंदिरा को हुआ था, और वे सत्ता पर लौट आई थीं। शिवसेना ने कहा है कि देश की जनता ने इस सरकार को काम करने के लिए मौका दिया है, न कि इस तरह के राजनीतिक अभियान चलाने के लिए।
भाजपा और एनडीए के लिए यह एक अच्छी बात है कि उसके घर के भीतर ही शिवसेना जैसा एक घरेलू ऑडिटर बैठा हुआ है। एनडीए सरकार बनने के बाद से अब तक हम लगातार यह देखते आ रहे हैं कि केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार, इन दोनों में भाजपा की भागीदार रहने के बावजूद शिवसेना दोनों सरकारों की हर गलती पर सार्वजनिक रूप से बोलते आ रही है, और यह इन दोनों सरकारों को बड़ी गलतियों को दुहराने से बचने का एक मौका भी है। देश के लोगों को याद होगा कि किस तरह यूपीए-1 में वामपंथी समर्थन सरकार के बाहर से था, लेकिन उस समर्थन के दबाव में यूपीए उन तमाम घोटालों से बची हुई थी, जो कि यूपीए-2 के कार्यकाल में हुए। दरअसल वामपंथी दबाव के चलते यूपीए का चालचलन भी ठीकठाक रहा, और उसकी नीतियां भी जनविरोधी नहीं रही। लेकिन बेकाबू होते ही यूपीए-2 ने वे सारे काम किए जिससे कि वे सरकार के बाहर हो गई।
हम तो किसी भी नेता या पार्टी के भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की वकालत करते आए हैं, लेकिन हमारा यह भी मानना है कि सार्वजनिक जीवन में एक-दूसरे के खिलाफ बिना सबूतों के ओछे हमले नहीं करने चाहिए। वह चाहे सोनिया गांधी के इटैलियन मूल को बार-बार याद दिलाकर उन्हें कुछ कम हिन्दुस्तानी साबित करना हो, या कि मोदी की डिग्री पर बिना सबूतों के सवाल उठाकर उन्हें फर्जी साबित करना हो, हम ऐसी दोनों ही हरकतों के खिलाफ हैं। लेकिन शिवसेना ने जो बात कही है, वह इस देश की अधिकतर जनता के मिजाज की बात है। हम बाकी नीतियों के मामले में शिवसेना से कोसों दूर हैं, लेकिन बहुत से मुद्दों पर शिवसेना भाजपा के लिए निंदक नियरे राखिये के अंदाज में आगाह करने का काम करती है।
लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि सोनिया गांधी के इटैलियन मूल का सवाल कई चुनाव पहले जनता से जवाब पा चुका है, और सुषमा स्वराज के सिर मुंडाने की नौबत भी ला चुका है। इसलिए अब अदालती कार्रवाई से परे सोनिया गांधी पर ओछे हमले आत्मघाती ही होंगे।