उत्तराखंड से केन्द्र सरकार को सबक की जरूरत, कांग्रेस को भी

संपादकीय
11 मई  2016
उत्तराखंड में जिस तरह कांग्रेस विधायकों की बगावत के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया, उसे उत्तराखंड हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई तरह की शिकस्त झेलनी पड़ी, और सुप्रीम कोर्ट ने जितनी कड़ी बातें केन्द्र सरकार के खिलाफ कही हैं, वे भी केन्द्र-राज्य संबंधों के इतिहास में दर्ज हो गई हैं। दूसरी तरफ विधानसभा के शक्ति परीक्षण में जिस तरह कांग्रेस लौटकर सत्ता में आई है, उससे भी केन्द्र की एनडीए सरकार की एक शर्मनाक राजनीतिक पराजय हुई है। और भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब किसी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की नीयत से, या उसे बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया है, उसे जनता ने खूब समझा है। और राज्यपाल जिस तरह से केन्द्र सरकार के अंग्रेज-एजेंट की तरह काम करते हैं, वह भी दर्जनों बार दर्ज हो चुका है। लेकिन किसी राज्य में सत्ता को पलटने को केन्द्र सरकार आमतौर पर एक राजनीतिक-कामयाबी मानती है, और उसी के तहत उत्तराखंड में यह सब हुआ।
उत्तराखंड सन् 2000 में बनाए गए तीन नए राज्यों में से एक है, और झारखंड के साथ-साथ इस पहाड़ी राज्य में भी भाजपा मुख्यमंत्री और कांग्रेस मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत होते आई है। लोगों को याद होगा कि इस राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री भी कार्यकाल के बीच ही बदले गए, और इन पन्द्रह बरसों में यह राज्य दस मुख्यमंत्री देख चुका है। कुछ मुख्यमंत्री तो साल-दो साल या छह महीने के लिए ही आए और गए, एक मुख्यमंत्री को कुल चार महीने मिले, और यह सिलसिला कांग्रेस की मौजूदा सरकार में भी जारी रखने की कोशिश हुई थी। लेकिन उत्तराखंड में हरीश रावत की कांग्रेस सरकार पर से टले हुए इस मौजूदा खतरे को लेकर कांग्रेस और रावत को खुश होने की जरूरत कम है, सम्हलने की जरूरत अधिक। इस छोटे से राज्य में विधायकों की संख्या कुल 70 है, और ऐसे में जरा सी बगावत भी मुख्यमंत्री को देहरादून की पहाड़ी से नीचे धकेल सकती है। कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि किसी एक कुनबे को जरूरत से अधिक मजबूत करने का क्या नतीजा होता है। एक रीता बहुगुणा को उत्तरप्रदेश कांग्रेस का कर्ताधर्ता बना दिया गया था, और उन्हीं के भाई विजय बहुगुणा को उत्तराखंड में कांग्रेस ने लंबे समय से बहुत बढ़ावा दिया था। नतीजा यह निकला कि जिसे कांग्रेस ने अभी दो बरस पहले मुख्यमंत्री रखा था, उसी ने विधायकों में बगावत करवाई, और सरकार गिरवाई। कांग्रेस को बाकी देश में भी कुनबापरस्ती से बचना चाहिए। कांग्रेस को यह नसीहत देना आसान है, लेकिन जो पार्टी कुनबापरस्ती की बुनियाद पर ही चल रही है, वह किस मुंह से राज्यों में कुछ परिवारों की सामंती को रोक सकती है, यह कहना कुछ मुश्किल है। लेकिन फिर भी हकीकत यही है कि अगर कांग्रेस, या किसी भी दूसरी पार्टी को अपनी बुनियाद मजबूत करनी है, तो उसे कुछ कुनबों को इस तरह बढ़ावा देना बंद करना होगा। भाई-बहन ने मिलकर दो राज्यों में कांग्रेस को चौपट कर दिया।
लेकिन आज का एक दूसरा मुद्दा यह है कि केन्द्र में जो भी सरकार रहे, उसे राज्यों को अस्थिर करने की अपनी संवैधानिक ताकत से बचना चाहिए। इससे न केवल आनन-फानन शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है, बल्कि जनता भी चुनाव के वक्त ऐसी अलोकतांत्रिक बातों को याद रखती है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार से काफी कुछ कह चुका है, लेकिन मोदी सरकार जितने विशाल बहुमत से आई है, और जिस तरह केन्द्र का गठबंधन चलाने के लिए उसे किसी दूसरी पार्टी की जरूरत नहीं है, उसके चलते हुए ऐसी गलतियां होना आसान है। आजकल में ही हमने शिवसेना के उठाए हुए मुद्दों पर लिखा था, और मोदी सरकार को बहुमत के बाहुबल से होने वाली गलतियों से अपने आपको बचाना चाहिए। बाहुबल से किया गया एक गलत काम बिहार की सड़कों पर दो-चार दिन पहले ही दिखा है, और उसका नतीजा भी दिखा है।

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