गैरजरूरी और नाजायज बयानों से राज्य को बचने की जरूरत

संपादकीय
12 मई  2016
छत्तीसगढ़ के स्कूल-शिक्षा मंत्री केदार कश्यप ने एक बयान दे दिया कि छात्राओं को मेकअप की तरफ ध्यान देने के बजाय पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना चाहिए। इसको लेकर कई लोगों में नाराजगी हुई है, और प्रदेश की महिला-बाल विकास मंत्री रमशीला साहू ने इससे असहमति भी जाहिर की है, और रायपुर में कुछ लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन भी किया है। आज बारहवीं तक की पढ़ाई के लिए लड़के-लड़कियां 18 बरस के भी हो जाते हैं, और ऐसे में जाहिर है कि उनमें से कुछ लोग कुछ फैशन भी करते होंगे, और कुछ लोग मेकअप भी करते होंगे। लेकिन वक्त की जरूरत और चलन के मुताबिक अगर बच्चों को इतनी भी रियायत नहीं होगी, तो उससे उनके व्यक्तित्व विकास और आत्मविश्वास दोनों पर फर्क पड़ सकता है। अब जमाना गुरुकुल का नहीं रह गया है जहां पर सिर मुंडाए हुए लड़कों को शिक्षा दी जाती थी, और लड़कियों के लिए शायद उस वक्त शिक्षा थी भी नहीं।
लेकिन हम इस एक बयान को लेकर बात को शुरू और खत्म करना नहीं चाहते। अभी कुछ ही दिन हुए हैं कि पंचायत और स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने अपनी नियमित छवि के मुताबिक अधिकारियों के साथ कुछ आपत्तिजनक बातें सार्वजनिक रूप से कहीं, और फिर मीडिया में उनके आने पर उन्होंने मीडिया को यह नसीहत दी कि सरकार के विकास कार्यों और लोक सुराज के मुद्दों पर मीडिया ध्यान दे, और अपनी कही बातों के लिए बचाव का कोई तर्क उनके पास नहीं था। उन्होंने मीडिया को काम सिखाने के लिए प्रदेश में बनाए गए पत्रकारिता विश्वविद्यालय की याद भी दिलाई, लेकिन वे खुद गैरजरूरी आपत्तिजनक बातें करने और कहने से कैसे बच सकते थे, इसके बारे में कोई अफसोस उनके बयानों में नहीं था।
छत्तीसगढ़ में ऐसे बयानों से बाकी देश और मध्यप्रदेश जैसी नौबत आ रही है, जहां पर कि मोदी सरकार के मंत्रियों, शिवराज सरकार के मंत्रियों की कही हुई आपत्तिजनक बातों से मीडिया में मौजूद जगह भर जाती हैं, और अगर उन सरकारों की कोई कामयाबी है, तो उसके लिए जगह घटती चली जाती है। हमारा यह मानना है कि मीडिया को नसीहत देने का हक नेताओं को उसी तरह का है जिस तरह की मीडिया रोजाना नेताओं को नसीहत देता है। लेकिन फिर भी सरकार में बैठे हुए लोगों को यह समझने की जरूरत है कि वे मीडिया को या जनता को इतना मौका तो दें कि वे सरकार की कामयाबी के बारे में पढ़ सकें, देख सकें, सोच सकें। अगर निहायत गैरजरूरी और नाजायज बातों और बर्ताव से सार्वजनिक जीवन को भर दिया जाएगा, तो यह जाहिर है कि सरकार के अच्छे कामों को लोगों के बीच जिस महत्व का हक है, वह महत्व सबसे पहले इसका शिकार होगा।
छत्तीसगढ़ में यही हाल बस्तर को लेकर चल रहा था और सरकार के विकास कार्यों की तरफ देश का ध्यान भी नहीं जा रहा था क्योंकि वहां पर पुलिस जिस अंदाज में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मामले गढ़कर उन्हें प्रताडि़त करने में लगी हुई थी, पूरे देश और दुनिया का ध्यान महज वहीं फंसकर रह जा रहा था। बार-बार जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सरकार के इस नुकसान के बारे में देश भर से कहा गया, तो जाकर बस्तर की बेकाबू पुलिस को लोकतंत्र के दायरे में रहने के लिए कहा गया, और पिछले कुछ हफ्तों से पुलिस ज्यादती और मानवाधिकार हनन की खबरें घटी हैं, और अब हो सकता है कि सरकार के विकास की कोशिशों की खबरों को जगह मिल पाए। लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन में मुफ्त में हासिल जगह का इस्तेमाल या बेजा इस्तेमाल, नेता और अफसर अपनी मर्जी और पसंद से कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को इस बारे में ध्यान देना चाहिए कि गैरजरूरी विवादों से बचकर वह किस तरह जनता तक जनकल्याण की बातों को पहुंचा सकती है, और लोकतंत्र को अधिक कामयाब बना सकती है। आज पूरे देश में गैरजरूरी बयानों की वजह से ऐसा माहौल बना हुआ है कि इनके अलावा देश में और कोई खबर नहीं है, और कोई काम नहीं हो रहा है। यह नौबत छत्तीसगढ़ में और आगे न बढ़े इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ऐसी हर कड़वी बात के साथ मीडिया और जनता को ऐसे लोगों से जुड़ी हुई पुरानी बहुत सी बातें भी याद पडऩे लगती हैं, और जितना नुकसान ऐसे बयान देने वालों का होता है, उससे कई गुना अधिक नुकसान सरकार की छवि का होता है, और जनकल्याण के मुद्दों का होता है। 

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