सवा सौ साल पुरानी पार्टी एक कुनबे के कंधों पर

संपादकीय
13 मई  2016
उत्तरप्रदेश में सामने खड़े चुनावों को लेकर सबसे अधिक खबरें वहां की सबसे कमजोर कांग्रेस पार्टी के भीतर से आ रही हैं। और ये खबरें इस पार्टी के दीवालिया हो जाने के सुबूत लेकर आ रही हैं। प्रशांत किशोर नाम का एक चुनाव विश्लेषक और चुनाव योजनाकार पहले मोदी और फिर नीतीश के लिए कामयाबी जुटाकर एक करिश्मासाज की तरह खबरों में हैं, और यह भी खबर है कि वह इस बार पंजाब और उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की नैय्या पार लगाने में लगा है। इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि भारत का लोकतंत्र अगर इस तरह के चुनावी मैनेजमेंट के असर में जीत या हार तय करने लगा है, तो यह बहुत ही फिक्र की बात है, और शर्मनाक हालत भी है। लेकिन दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश और दिल्ली से कांग्रेस की जो बार-बार खबरें आ रही हैं, वे बताती हैं कि प्रियंका गांधी को उत्तरप्रदेश की भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने की सलाह दी गई है, और इसके साथ-साथ इस प्रदेश से यह मांग भी उठ रही है कि प्रियंका को इस राज्य की कांग्रेस की कमान दी जाए। अब जो महिला आज तक कांग्रेस में औपचारिक रूप से कभी नहीं रही, और जिसका सारा राजनीतिक योगदान अपने परिवार की दो लोकसभा सीटों पर मां और भाई की तरफ से काम करने तक सीमित रहा, आज कांग्रेस पार्टी उसी में अपनी सबसे बड़ी संभावना देख रही है।
यह देश, यहां का लोकतंत्र, और यहां के लोगों की सोच, कुनबापरस्ती की इस कदर मोहताज हो गई है, कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी, और अब प्रियंका गांधी तक इस पार्टी की संभावनाएं सीमित हो गई हैं। सवा सौ साल पुरानी और देश पर सबसे लंबे समय तक राज करने वाली पार्टी आज ऐसे गिने-चुने तीन लोगों पर आश्रित है जिन तीनों को अनमने ढंग से राजनीति करते देखा जा सकता है, और जो तीनों लोग दो संसदीय सीटों को छोड़कर बाकी देश की जनता के साथ सीधे जुड़ भी नहीं पाते हैं। यह पार्टी इस परिवार के करिश्मे पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचने के सपने देखती रहती हैं, और इसके साथ एक सबसे बड़ी दिक्कत, सबसे बड़ा खतरा यह भी है कि इस परिवार से परे यह पार्टी किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती।
जहां तक सरकार चलाने की बात है, तो सोनिया गांधी ने एक वक्त बड़ी समझदारी से काम लेकर उस वक्त की एक सबसे अच्छी पसंद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। लेकिन अब न तो इस पार्टी के पास ऐसी कोई नौबत आते दिखती है, और न ही राजनीतिक लीडरशिप परिवार से परे किसी और को देने की सोच कांग्रेस में संभव है। हकीकत यह है कि बहुत से राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि सोनिया के बाद राहुल गांधी को लीडरशिप देना कांग्रेस के लिए एक ताकत नहीं, एक कमजोरी रहने वाली है। जब इस पार्टी का पूरे देश में लीडरशिप के दीवालियापन का यह हाल है, तो फिर इसी पार्टी की एक दूसरी सदस्य को उत्तरप्रदेश की कमान देकर कांग्रेस महज यह साबित कर सकती है कि यह एक पार्टी नहीं, एक परिवार के कंधों पर बैठे हुए परजीवी लोगों की एक टोली है।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी, जिसका कि देश के अधिकतर राज्यों में कुछ न कुछ जनाधार रहा है, उसकी ऐसी नौबत बहुत ही खतरनाक है। एक मजबूत विपक्ष के बिना कोई एक पार्टी की अंधाधुंध बाहुबल वाली सरकार किस तरह से चलती है, यह राजीव गांधी के समय शाहबानो के मामले में देखने मिला था, और आज मोदी सरकार में भी देखने मिल रहा है। इसलिए देश के लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष उतना ही जरूरी है जितना कि एक काबिल और जिम्मेदार सरकार। कांग्रेस एक संगठन के रूप में अपने आपको खो चुकी है, और सोनिया कुनबे के दो-तीन लोगों के निजी करिश्मे पर टिकी हुई है। आने वाले दिन उत्तरप्रदेश और बाकी देश में कांग्रेस का चाहे जो भविष्य साबित करें, कांग्रेस की यह कमजोरी तो आज भी साबित हो ही चुकी है कि इस पार्टी के पास सोनिया-राहुल-प्रियंका से परे कुछ सोच पाने की सोच रह नहीं गई है, और उसकी संभावना भी नहीं है। इस पार्टी का एक परिवार के नियंत्रण को बचाना, या इस पार्टी को बचाना, ये दो अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं, और कांग्रेस की आज की प्राथमिकता हो सकता है कि उसके हाथ सबसे अच्छा विकल्प हो, लेकिन यह अच्छा विकल्प बिल्कुल नहीं है। एक पार्टी को पार्टी की तरह चलना भी सीखना चाहिए, यह एक और बात है कि भारत में राष्ट्रीय स्तर पर और अनगिनत प्रादेशिक मामलों में भी व्यक्तिवादी और परिवारवादी पार्टियों का राज देखा है, और इस देश की संस्कृति शायद उसके साथ जीना सीख चुकी है।

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