हरियाणा पुलिस की नाकाबिलीयत पर रिपोर्ट, बाकी राज्य भी सोचें

संपादकीय
14 मई  2016
हरियाणा में कुछ महीने पहले हुए जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान एकाएक भड़की हिंसा और बेकाबू प्रशासन की जांच रिपोर्ट देश के एक प्रमुख रिटायर्ड पुलिस आला अफसर प्रकाश सिंह ने वहां के मुख्यमंत्री को दे दी है। इस रिपोर्ट के बाद उन्होंने मीडिया को इसके बारे में कुछ बातें बताई हैं जिनमें उन्होंने हरियाणा पुलिस को किसी भी चुनौती का सामना करने में नाकाबिल करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि जाट आंदोलन के दौरान हरियाणा के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी जातिवाद में पूरी तरह जकड़े हुए थे और उन्होंने लोगों को हिंसा से बचाने के बजाय खुद की हिफाजत करना जरूरी समझा। इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इन अफसरों ने बातचीत के दौरान यह मंजूर करने में कोई हिचक नहीं दिखाई कि वे अपनी जान बचाने के लिए हिंसा की जगह छोड़कर भाग खड़े हुए थे। कमेटी ने कहा है कि यदि पुलिस में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में राज्य की पुलिस किसी चुनौती का सामना नहीं कर पाएगी।
हरियाणा की भाजपा सरकार के लिए यह एक फिक्र की रिपोर्ट है क्योंकि यहां की पुलिस आए दिन दिल्ली के काम भी आती है, और दिल्ली के साथ हरियाणा की सरहद इतनी मिली हुई है कि अगर यहां पुलिस नाकाबिल है तो दिल्ली भी खतरे में है। दूसरी बात यह कि दिल्ली की पुलिस में हरियाणा से गए हुए कर्मचारी बड़ी संख्या में हैं, और हो सकता है कि ऐसा ही खतरा दिल्ली पर भी मंडरा रहा हो।
लेकिन बात महज हरियाणा को कोसने की नहीं है। गुजरात के दंगों में देश ने देखा है कि किस तरह पुलिस ने एक घोर साम्प्रदायिक रूख दिखाया था, और बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को खुलकर छूट दी थी कि वह खुलकर मुस्लिमों पर हिंसा कर सके। इसके अलावा भी देश भर में जगह-जगह पुलिस ने अल्पसंख्यकों की बहुत ही कम मौजूदगी को लोग फिक्र की बात मानते हैं कि किसी तनाव की हालत में पुलिस में बहुसंख्यक तबके की बहुतायत एक खतरनाक असंतुलन पैदा करती है। लेकिन यह बात सिर्फ पुलिस में काम करने वाले लोगों के जाति और धर्म की नहीं है। भारत में कई बार यह बात उठी है कि पुलिस जितने राजनीतिक दबाव में काम करती है, वह एक खतरनाक बात है। पुलिस का इंसाफ का नजरिया अपनी खुद की कुर्सी तले दब जाता है, और वे तबादले के डर से, कम कमाई वाली जगह पर जाने के डर से, ईमानदारी से काम नहीं करते।
ऐसे में पुलिस सुधार के लिए देश में समय-समय पर जो बहुत सी रिपोर्ट सरकार को दी गई हैं, उन पर कोई भी कार्रवाई न करने पर भी आज सोचने की जरूरत है। दूसरी बात यह भी है कि हरियाणा सरकार से मांगकर यह रिपोर्ट बाकी राज्य सरकारों को भी देखनी चाहिए क्योंकि ऐसी नौबत दूसरे राज्यों में भी आ सकती है, समय-समय पर आती है। पुलिस को एक पेशेवर सोच देना, और उसकी नजरिए में इंसाफ लेकर आना एक आसान बात नहीं है, और इसमें एक पूरी पीढ़ी का वक्त खर्च हो सकता है। सरकारें पांच-पांच बरस के टुकड़ों में अपने नफे-नुकसान को देखते हैं, और यही नतीजा होता है कि पुलिस की दीर्घकालीन कसावट किसी की भी प्राथमिकता नहीं रहती। अब कल के दिन अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसे किसी मामले में सरकार के कामकाज में दखल देने पर उतारू हो जाएगी, तो गडकरी से लेकर जेटली तक कई लोग जजों को यह सलाह देने लगेंगे कि जजों को अगर सरकार ही चलाने का शौक है तो वे कुर्सी छोड़कर चुनाव लड़ें, और फिर सरकार चलाएं। लेकिन देश की जनता से अगर पूछें तो सरकार के रवैये से थकी हुई जनता जजों की दखल को देश के लिए अकेली उम्मीद मानती है। हरियाणा की पुलिस के बारे में आई इस रिपोर्ट को लेकर देश के बाकी राज्यों में भी विचार होना चाहिए, और कोई बुरी बात नहीं होगी अगर देश की संसद में भी इस पर चर्चा का कोई रास्ता निकाला जा सके।

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