एक हत्या पर बिहार में जंगलराज तो तीन हत्या पर गुजरात में क्या?

संपादकीय
15 मई  2016
बिहार में एक सड़क-हत्या में सत्तारूढ़ पार्टी की एक विधायक के बेटे के शामिल होने की वजह से वह मुद्दा खासा गंभीर हो गया है। और फिर दो-चार दिनों के भीतर ही बिहार में एक पत्रकार की हत्या हुई, हालांकि पड़ोस में भाजपा के शासन वाले झारखंड में भी एक पत्रकार को मारा गया। बिहार की इन दो घटनाओं को लेकर भाजपा ने राज्य की नीतीश-लालू सरकार पर हमला बोला है कि इस राज्य में जंगलराज आ गया है। हालांकि कल एनडीटीवी के एक रिपोर्टर ने बिहार के भाजपा नेता सुशील मोदी के बात करते हुए उनको ये आंकड़े भी गिनाए कि पिछले तीन बरसों में बिहार में हत्या के आंकड़े लगातार गिरे हैं। लेकिन पटना से लेकर दिल्ली तक बिहार को जंगलराज के लिए इतनी जोरों से कोसा गया, कि कल जब भाजपा सरकार वाले गुजरात में तीन लोगों की सड़क पर हत्या हो गई, तो अब उसे जंगलराज कहा जाए, या उसे देखते हुए भी बिहार को ही जंगलराज कहा जाए, यह दुविधा भाजपा के भीतर जरूर खड़ी होगी। और गुजरात में तो जिनकी हत्या हुई है उनमें से एक तो विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा के चचेरे भाई भी हैं, जो कि स्थानीय म्युनिसिपल में विपक्ष और कांग्रेस के नेता भी हैं। सूरत शहर में इसके अलावा उनके साथ के दो और लोगों का जो कत्ल हुआ है, वह भी गुजरात के इस कारोबारी शहर को हिला गया है।
दरअसल देश में चलते हुए चुनावी माहौल को देखते हुए सभी पार्टियों के लोग छोटी घटनाओं को भी अनुपात से अधिक बढ़ाकर इतने तेज हमले करने लगे हैं, कि उससे वापिस लौटना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। एक हत्या पर जंगलराज, तो तीन हत्याओं पर कौन सा राज कहा जाएगा? लोगों को यह याद रखना चाहिए कि कई तरह के जुर्म और हादसे किसी भी राजनीतिक दल की चलाई जाती सरकार के तहत हो सकते हैं। उनको अगर एक सीमा से अधिक उठाकर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, तो हो सकता है कि उससे बड़ा अपराध अपनी ही पार्टी की सरकार में सामने आने पर बोलती बंद हो जाए। हमारा ख्याल है कि पटना में भाजपा का चलाया जा रहा जंगल-राज नारे वाला आंदोलन गुजरात की कल की हत्याओं के बाद ठंडा हो जाएगा।
इसी बीच एक दूसरा मामला सामने आया। केरल में चुनाव प्रचार के लिए गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केरल की तुलना अफ्रीका के भुखमरी के शिकार देश सोमालिया से कर दी। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने आनन-फानन भारत के प्रदेशों के मानव विकास के आंकड़े सामने रख दिए, जिनमें से दर्जन भर से अधिक पैमानों पर केरल गुजरात के मुकाबले मीलों आगे दिखता है। बैठे-ठाले गुजरात की कमियां जनचर्चा का सामान बन गईं। इसके बाद कल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मोदी के सोमालिया वाले बयान को सही साबित करने के लिए एक पत्रिका का कवर पेज मीडिया के सामने पेश किया जिसमें केरल के कुपोषण पर एक रिपोर्ट थी, और एक मरणासन्न बच्चा मां की गोद में बड़ी कमजोर हालत में दिख रहा था। अब पत्रिका का यह पुराना अंक भाजपा के तर्क में काम आ पाता, इसके पहले ही लोगों को यह याद पडऩे लगा कि यह तस्वीर तो पहले कहीं देखी हुई है। और दरअसल इस बच्चे की यह तस्वीर कुछ बरस पहले गुजरात के चुनाव-अभियान में कांग्रेस ने भाजपा सरकार के खिलाफ छापी थी कि गुजरात में कितना कुपोषण है। उसके तुरंत बाद हमारे अखबार सहित बहुत से अखबारों ने कांग्रेस के विज्ञापन का झूठ उजागर किया था कि यह तस्वीर तो श्रीलंका के एक बच्चे की है, और उसे गुजरात का कुपोषण बताने के लिए छापा गया। बात वहीं तक नहीं रूकी, देश की एक प्रमुख पत्रिका, आउटलुक ने अपने कवर पेज पर इस तस्वीर को केरल के कुपोषण के साथ छाप दिया। और उस कवर पेज को कल अमित शाह ने केरल की कांग्रेस सरकार के खिलाफ, वहां के कुपोषण के खिलाफ एक सुबूत की तरह पेश कर दिया, और यह बात उनके ध्यान से उतर गई कि यह तस्वीर तो उनके अपने गुजरात में, उनकी अपनी भाजपा सरकार के खिलाफ इस्तेमाल हो चुकी है, और उसे लेकर कांग्रेस को खासी शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी थी।
राजनीति में जब सार्वजनिक जीवन की घटनाओं को लेकर कड़वाहट बहुत अधिक फैलने लगती है, तो उसे समेटना मुश्किल पड़ता है। हर पार्टी के राज में कुछ न कुछ गलतियां होते चलती हैं, यह विपक्ष की जिम्मेदारी भी रहती है कि इन घटनाओं को उठाए, और जनता को जागरूक रखे। लेकिन जब सच को भूलकर, या झूठी तस्वीरों का सहारा लेकर, या अनुपातहीन तरीके से आक्रामकता के साथ राजनीति की जाती है, तो वह घूम-फिरकर हमलावर पर चोट करने के लिए आती ही है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें