राज्यसभा में पहुंचाए गए जमालघोटे के कुछ बीज

संपादकीय
18 मई  2016
भाजपा में बाहर रहकर लौटे हुए सुब्रमण्यम स्वामी को प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर राज्यसभा में लाया गया है। उनकी पहचान वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ लगातार तीखे और सार्वजनिक हमले करने को लेकर है। अब उन्होंने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के खिलाफ एक बहुत ही हमलावर अभियान छेड़ा है, और उन्हें देश के हितों के खिलाफ बताते हुए हटाने की सार्वजनिक मांग लगातार दुहराना शुरू किया है। सुब्रमण्यम स्वामी के काम का तरीका यह भी है कि वे न सिर्फ सार्वजनिक बयान देते हैं, बल्कि औपचारिक चि_ियां लिखकर भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अपनी सोच के मुताबिक कार्रवाई की मांग करते हैं। वे वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ इतना कुछ लिख चुके हैं, और उनके वित्तमंत्री रहते कालाधन देश में न लौटने की बात कह चुके हैं, कि लोगों को उनके राज्यसभा में लाए जाने पर कुछ हैरानी भी हुई है। विपक्ष के कोई भी नेता जेटली पर जितने तीखे हमले कर सकते हैं, उससे अधिक तीखी बातें सुब्रमण्यम स्वामी और राम जेठमलानी जैसे भाजपा सांसद लगातार कहते रहे हैं और यह भाजपा के भीतर का एक बड़ा विरोधाभास भी है। एक तरफ तो आज ही ऐसी चर्चा है कि भाजपा शिवसेना जैसे अपने कटु आलोचक हो गए सहयोगी दल से किनारा करने की सोच रही है, और उसके बाद स्वामी जैसे स्थायी आलोचक को राज्यसभा की भाजपा बेंच पर लाकर पता नहीं पार्टी को आगे कैसी फजीहत देखनी पड़ेगी।
वैसे तो हम घरेलू आलोचकों की तारीफ भी करते हैं कि वे बड़ी गलतियां करने से बचाते हैं, लेकिन फिर भी किसी भी संगठन, संस्था, या सरकार के लिए यह एक फिक्र की बात होती है अगर उसके लोग एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चलाने में लगे रहें, तो उसके भीतर की दरारें भी उजागर होती हैं, और उसकी कमजोरियां भी इस तरह सार्वजनिक होती हैं कि जनता की नजर में वे कमजोरियां चढऩे लगती हैं। राम जेठमलानी और सुब्रमण्यम स्वामी इसी तरह की संपत्ति हैं, जो कब सम्पत्ति से बोझ साबित होने लगें, वह समझना मुश्किल है। राम जेठमलानी को भी भाजपा ने राज्यसभा में भेजा, और वे भी लगातार अरूण जेटली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के दफ्तरों तक लिखते रहते हैं, और खुलकर सार्वजनिक बयान देते रहते हैं। यह एक तरफ तो पार्टी या सरकार के भीतर एक बड़े दिलचस्प और अनोखे लोकतंत्र का सुबूत है, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी जगजाहिर है कि मोदी सरकार और भाजपा में ऐसा लोकतांत्रिक अधिकार और लोगों के खिलाफ हासिल है नहीं।
स्वामी और जेठमलानी जैसे लोग विपक्ष पर हमला करने के लिए तो बहुत अच्छे हैं क्योंकि इनके खुद के ऐसे कोई पुराने कुकर्म नहीं हैं जिन्हें लेकर ये लोगों से दबें, और इनकी जुबान बंद हो जाए। दूसरी तरफ ये दोनों ही लोग कांग्रेस के मुखिया परिवार के खिलाफ बरसों से बहुत ही तीखे तेवरों के साथ हमले करते आए हैं, और भाजपा के भीतर भी ऐसे दूसरे नेता नहीं हैं जो कि ऐसे तेवर रखते हों, लगातार रखते हों, बिना किसी लिहाज के रखते हों। इसलिए भाजपा के भीतर ऐसे लोगों को लाने, और सांसद बनाने का एक इस्तेमाल तो है, लेकिन कब्ज को दूर करने वाले जमालघोटे के बीज का एक इस्तेमाल तो होता है, लेकिन उसकी ताकत से पेट नहीं भरा जा सकता। इसलिए भाजपा के भीतर ये दो नेता, और अभी-अभी समाजवादी पार्टी से राज्यसभा के लिए घोषित अमर सिंह और बेनीप्रसाद वर्मा का इतिहास भी जमालघोटे जैसा ही रहा है, और ऐसे लोग राज्यसभा को बुजुर्गों की एक मनोनीत सभा से बढ़ाकर एक जिंदा और गर्मागर्म बहस की चौपाल बना देंगे। आने वाले दिनों में लोग राज्यसभा कुछ अधिक दिलचस्पी से देख पाएंगे। अब इनकी पार्टियां इसका कितना बड़ा मनोरंजन शुल्क पटाएंगी, यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे।

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