गन्ने का रस निकालने वाली मशीन में बच्चों को पेरने के खतरे

संपादकीय
2 मई  2016
राजस्थान की कोटा शहर की खबर है कि वहां प्रतियोगी दाखिला इम्तिहानों की तैयारी में रखे गए स्कूली बच्चों की आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं। अभी वहां के कलेक्टर ने इन बच्चों के मां-बाप को चि_ी लिखी है कि वे बच्चों पर अपनी इच्छाएं न थोपें, उन्हें मर्जी की पढ़ाई करने दें। वैसे तो प्रशासन का इस बात से लेना-देना नहीं रहता कि कौन से बच्चे किस पढ़ाई की तैयारी करें, लेकिन पिछले बरस कोटा में ऐसे तीस बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं और उनकी लिखी चि_ियों को पढ़-पढ़कर कलेक्टर थक गए हैं। उन्होंने मां-बाप को लिखा है कि बच्चे की किसी से तुलना न करें और न ही नतीजों के बारे में उन्हें डराएं।
राजस्थान के कोटा शहर इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे कॉलेजों में दाखिले के लिए दाखिला-इम्तिहान की तैयारी किसी जिम में मसल्स तैयार करने के अंदाज में करवाता है। वहां पर प्रवेश परीक्षा तैयारी के ऐसे कारखाने खुले हुए हैं, जो कि स्कूली पढ़ाई के आखिरी कुछ बरसों को प्रवेश परीक्षा के लिए झोंक देते हैं और स्कूली पढ़ाई के नाम पर फर्जी हाजिरी की धोखाधड़ी भी करते हैं। एक-एक बच्चे पर लाखों की फीस वसूली जाती है और उन पर देश के सबसे बड़े कॉलेजों में पहुंचने की उम्मीद की जाती है। बच्चों से अपनी अतिमहत्वाकांक्षा रखने वाले मां-बाप उन्हें ऐसे कोचिंग कारखानों के हवाले कर देते हैं, और वहां उन्हें तराश कर एक निर्धारित आकार में ढालने का काम किसी कारखाने में पिघले लोहे की ढलाई की तरह शुरू हो जाता है।
ऐसे में जिन बच्चों की पसंद सोच, हसरत, और क्षमता मां-बाप की उम्मीदों से अलग होती हैं, वे ये बरस तनाव में गुजारते हैं, हीनभावना और कुंठा के शिकार हो जाते हैं मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) में डूब जाते हैं, और आत्महत्या तक पहुंच जाते हैं। जब वे आत्महत्या कर लेते हैं तो खबर बनते हैं, इम्तिहान में अव्वल आने पर इश्तहार बनते हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व कुचल जाना न खबर बनता, न इश्तहार। दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में कहीं भी स्कूली बच्चों को गन्ने से रस निकालने की मशीन में इस तरह नहीं पेरा जाता।
हिंदुस्तान में निजीकरण और खुली बाजार व्यवस्था की हिमायती सरकारों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज में दाखिले के लिए भी ऐसा पूंजीवादी इंतजाम किया है, जिसके तहत दाखिला-इम्तिहान की सबसे अधिक तैयारी कर पाने वालों के लिए ही मौके हैं। कौन बच्चे कितने होनहार हैं, किनके कौन से रूझान हैं इन बातों का कोई मूल्यांकन नहीं है और न ही अब बच्चों के बीच बराबरी के मौकों का कोई मुद्दा रह गया है। जिस तरह जंगल में सबसे ताकतवर जानवर का राज चलता है, उसी तरह भारत में मां-बाप की ताकत की बदौलत बच्चे किसी स्कूल-कॉलेज में पहुंचते हैं। देश के सबसे बड़े सरकारी कॉलेजों के लिए भी दाखिले की तैयारी लाखों के खर्च से ही मुमकिन है।
लेकिन उदारीकरण का दानव लौटने के लिए नहीं आया है। इसलिए मां-बाप के अपनी हसरतों से परे अपने बच्चों के रूझान देखने चाहिए और बच्चों को आत्महत्या की तरफ धकेलना बंद करना चाहिए। हर बच्चे हर इम्तिहान के लायक नहीं रहते, लेकिन पढ़ाई या जिंदगी के किसी दूसरे दायरे में वे बहुत कामयाब हो सकते हैं। इस देश की शिक्षा नीति में बच्चों के लिए एक समान मौकों की गुंजाइश खत्म कर दी गई है और ऐसे में कुछ लाख बच्चों को महंगी तैयारी के बाद जो फायदा मिल सकता है उसे बच्चों पर थोपकर भी मां-बाप को खुश नहीं होना चाहिए। अमीर और गरीब, दोनों तरह के मां-बाप को याद रखना चाहिए कि उनके बच्चे जिंदगी में सबसे अधिक आगे अपनी मर्जी के दायरे में ही पहुंच सकते हैं, धकेलकर बढ़ाए गए बच्चे बीच में ही दम तोड़ सकते हैं। हिंदुस्तान के बेवकूफ मां-बाप में बच्चों को ऐसी दौड़ में झोंकने का सिलसिला खत्म होना चाहिए। दो-चार किस्म के कोर्स और कॉलेज जिंदगी का अंत नहीं हैं। गणित में फेल होने पर एक बच्चा खुदकुशी कर लेता तो दुनिया को आइंस्टीन न मिला होता। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें