क्षेत्रीय दलों के लगातार कब्जे और राष्ट्रीय दलों पर दबाव

संपादकीय
20 मई  2016
कल पांच राज्यों के जो चुनावी नतीजे सामने आए, उनसे देश भर में भाजपा में कामयाबी की एक खुशी दौड़ गई है, लेकिन देश की व्यापक राजनीतिक तस्वीर को देखने वालों को यह बात भी समझ आई कि असम तो एक राष्ट्रीय पार्टी के हाथ से निकलकर दूसरी राष्ट्रीय पार्टी के हाथ गया, लेकिन दो बड़े राज्य तमिलनाडु और बंगाल दोनों ही किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की पहुंच से खासे दूर बने हुए हैं, और तो और वे किसी राष्ट्रीय पार्टी के गठबंधन वाली स्थानीय पार्टी से भी दूर बने हुए हैं। ममता और जयललिता ने क्षेत्रीय पार्टियों के अकेले लडऩे और कामयाबी पाने का एक अलग रिकॉर्ड बनाया है। और इसके साथ ही यह भी सवाल उठता है कि देश में क्षेत्रीय पार्टियों की राष्ट्रीय राजनीति में क्या भूमिका है, और देश के अगले आम चुनावों में इन पार्टियों के गठबंधन का राष्ट्रीय सरकार पर कैसा असर पड़ेगा।
क्षेत्रीय पार्टियों के लगातार दबदबे वाले कुछ राज्यों को देखें तो बंगाल और तमिलनाडु के अलावा आंध्र और तेलंगाना क्षेत्रीय पार्टियों के कब्जे में बने हुए हैं, कश्मीर और पंजाब, बिहार और यूपी, ओडिशा और उत्तर-पूर्व के कुछ छोटे राज्य भी क्षेत्रीय पार्टियों के कब्जे में हैं। एक मजबूत केन्द्र और उसके नियंत्रण में चलने वाली राज्य सरकारों के हिमायती लोग क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत और बढ़ती कामयाबी के खिलाफ रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में लगातार क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने आपको किसी भी तरह के राष्ट्रीय गठबंधन के लिए जरूरी बना लिया है, और उनकी हस्ती को अनदेखा करके कोई राष्ट्रीय सरकार नहीं बन पाई। दूसरी तरफ मौजूदा केन्द्रीय सरकार के साथ एक अनोखी बात यह भी है कि वह एक गठबंधन की सरकार तो है, लेकिन वह सहयोगी दलों के बिना भी अकेले अपने दम पर सरकार बनाने का दम-खम रखने वाली भाजपा की अगुवाई वाली सरकार भी है। केन्द्र चलाने के लिए आज भाजपा को किसी और पार्टी की जरूरत नहीं है, लेकिन राज्यों में जगह-जगह अपने पैर जमाने के लिए उसे क्षेत्रीय दलों की जरूरत है, और इसीलिए वह अभी तक गठबंधन की सरकार में सहयोगियों को साथ लेकर चल रही है। यह एक और बात है कि हाल ही में यह चर्चा शुरू हुई है कि अगले आम चुनाव के पहले भाजपा आन्ध्र और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में अपने आपको इतना मजबूत बना लेना चाहती है कि वह तेलुगुदेशम या शिवसेना के बिना भी चुनाव में उतर सके।
देश की राजनीति में और संघीय ढांचे में पिछले दो दशकों में ही क्षेत्रीय दलों की भूमिका में इतना बड़ा उतार-चढ़ाव आया, और राष्ट्रीय गठबंधनों में वे इस तरह जुड़ते और घटते रहे, कि आज कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए के किसी और गठबंधन में जुड़कर अगला आम चुनाव लडऩे की एक संभावना खड़ी हो गई है। मोदी सरकार के बचे हुए कार्यकाल में यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि क्षेत्रीय पार्टियां किसके साथ जुड़ती हैं, किससे दूर हटती हैं, और अगले राष्ट्रीय गठबंधन में वे कितने हिस्से का दावा करती हैं। एक यह संभावना राजनीतिक विश्लेषणों में उभरकर सामने आती है कि मोदी विरोधी मोर्चे की अगुवाई करते हुए एक क्षेत्रीय दल जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार एक सबसे सर्वमान्य उम्मीदवार हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो शायद पहली बार राष्ट्रीय गठबंधन में चुनाव के पहले से एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता की अगुवाई की एक अलग तरह की मिसाल बनेगी।
अब जहां तक देश की व्यवस्था का सवाल है, तो बहुत से लोग यह मानते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियां देश के हित में नहीं रहतीं, क्योंकि उनकी सोच राज्य के हितों तक सीमित रहती है, और वे अपने राज्य में लोकप्रियता बनाए रखने के लिए अनुपातहीन तरीके से खर्च करती हैं, और केन्द्रीय गठबंधन में अपने दबदबे का इस्तेमाल करके दिल्ली से राज्य के लिए अनुपातहीन अधिक आबंटन लाती हैं। इसके अलावा एक बात यह कही जाती है कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय हितों की क्षेत्रीय पार्टियों की समझ कमजोर होती है और वे केन्द्र सरकार के लिए कई बार दिक्कत बनती हैं। तमिलनाडु की मिसाल गिनाई जाती है जहां पर सरकारें श्रीलंका के साथ भारत के संबंध को लेकर कई बार विदेश नीति पर दबाव डालती हैं। लेकिन हम इन तमाम दबावों के साथ भी क्षेत्रीय पार्टियों की अधिक कामयाबी और देश को चलाने में उनकी अधिक हिस्सेदारी के हिमायती हैं क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर जब किसी एक पार्टी का शासन पर एकाधिकार होता है तो उसके बहुत से नुकसान होते हैं, और भारतीय लोकतंत्र में देश का ढांचा एक संघीय ढांचा है जिसमें राज्यों के अधिकार और उनकी हिस्सेदारी जितनी है उससे अधिक रहनी चाहिए। ऐसे में ममता, जयललिता, के बाद अगर माया की बारी आती है, तो वह क्षेत्रीय दलों के दबदबे को और मजबूत ही करेगी। 

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