मां का नाम ही काफी है

संपादकीय
22 मई  2016
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक ताजा फैसले में आदेश दिया कि पासपोर्ट जारी करते वक्त जैविक पिता का नाम बताना जरूरी ना समझा जाए। यह फैसला बहुत से पहलुओं से देश के सामाजिक और प्रशासनिक हालात  सामने रखता है। यह फैसला एक ऐसी महिला की याचिका पर आया जिसे अपनी बेटी के पासपोर्ट का दूसरी बार नवीनीकरण करवाना था। पहली दो मर्तबा  जैविक पिता के नाम का जि़क्र किए बिना उसे पासपोर्ट जारी कर देने वाला पासपोर्ट दफ्तर इस बार उसके जैविक पिता का नाम फार्म में लिखे बिना पासपोर्ट जारी करने से इंकार कर रहा था। इस लड़की की मां का कहना था कि उसके पिता ने जन्मते ही उसे उसकी मां के साथ इसलिए छोड़ दिया कि वह एक लड़की थी, लिहाजा उसके किसी भी दस्तावेज में उसके पालक के रूप में जगह पाने का हकदार उसका पिता  नहीं था, इसलिए मां ने कभी पालक की जगह पिता का नाम लिखा ही नहीं। बेटी जन्मने के कथित जुर्म में तलाक पाने वाली इस महिला ने अदालत से कहा कि पासपोर्ट दफ्तर का उसके पिता के नाम के जिक्र पर ज़ोर देना खुद के नाम, और पहचान के बारे में तय करने के उसकी बेटी के अधिकार का हनन है।
भारत में एक महिला की ऐसी सोच, और कोशिश, देश में महिला अधिकारों के बारे में सोचने और लडऩे वालों का हौसला बढ़ाने वाली है। अमूमन तलाकशुदा जोड़ों के बच्चे बिना किसी उज्र के अपने पिता का नाम तरह-तरह के फार्मों पर लिख दिया करते हंै। शायद इसके पीछे यह सोच हो कि तलाक माता-पिता में हुआ है, औलादें उनके आपसी झगड़े से परे हैं। शायद यह महिला भी ऐसा करके अपनी बेटी का पासपोर्ट ले सकती थी, लेकिन उसने अपनी बेटी के सम्मान के लिए लडऩे की जहमत उठाना बेहतर समझा। अगर वह ऐसा ना करती तो शायद आज अदालत ऐसा फैसला ना देती, और ना ही यह पता चलता कि सरकारी महकमों को संवेदनशील बनाने के लिए अभी कितना कुछ किया जाना बाकी है।
एक लड़की के लिए यह उसके अस्तित्व का मसला है कि उसका दुनिया में आना जिस पिता को इतना नागवार गुजरा के उसने उसने रिश्ते ही खत्म कर दिए, उसे वह अपना पालक कैसे माने। लेकिन सरकारी दफ्तर में यह महज कम्प्यूटर को राजी करने की एक औपचारिकता ही है। अब अदालत के  फैसले के बाद सॉफ्ट्वेयर में सुधार किया जाएगा। इसकी जरूरत भी थी, क्यंूकि अकेले बूते औलादों की परवरिश करने वाला तबका देश में तेजी से बढ़ रहा है। इसमें  तलाकशुदा  औरतें भी हो सकती हैं या ऐसे ही छोड़ दी गई  महिलाएं, विधवाएं, यौनकर्मी, बलात्कार के कारण मां बनी महिलाएं, और अब तो कृत्रिम गर्भाधान के जरिये औलाद का सुख पाने वाले लोगों की भी कमी नहीं। अदालत ने भी अपने फैसले में इस बात का जिक्र किया है। पासपोर्ट दफ्तर ऐसे तबके को नजरअंदाज करके न केवल अपनी असंवेदनशीलता जता रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि उसे अपने ग्राहकों की सुविधा की भी कुछ पड़ी नहीं। अगर पर्यटन मंत्रालय इलाके विशेष के सैलानियों को अपनी ओर खींचने के लिए तरह-तरह का लचीलापन और सुविधाएं दे सकता है, तो दूसरे सरकारी महकमे  ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्या इसलिए कि नागरिकों के पास उनकी बात माने बिना कोई चारा नहीं, इसलिए उन्हें नागरिकों के अधिकारों के बारे में बारीकी से सोचने की जरूरत नहीं!
इस फैसले में तीसरी अहम बात यह है कि पासपोर्ट दफ्तर ने पहले दो मौकों पर इस लड़की को पिता के नाम के जिक्र के बिना पासपोर्ट जारी किया था। तीसरी बार यह कहा गया कि कम्प्यूटर पिता का नाम लिखे बिना फॉर्म स्वीकार नहीं करेगा। औरतों के हक के लिए  देश में अर्से से जारी लड़ाई के कारण हालात बहुत सुधरे हैं, और तकरीबन तमाम दस्तावेजों में अब केवल माता का नाम ही काफी माना जाता है। लेकिन यह मामला बताता है कि ऐसे भी सरकारी महकमे हैं जिन्हें ना तो सरकार की सोच से कोई सरोकार है, ना ही वहां हर समय एक जैसे मामलों में एक जैसे फैसले लेने की कोई व्यवस्था है। जिसे जब जो समझ में आया, वैसा फैसला लिया जाता है। जनता भले परेशान होती उसकी बला से! देश में पौराणिक काल में भी इसकी मिसाल थी, और 21 वीं सदी में भी है कि कैसे बच्चों की परवरिश में पिता के मुकाबले ज्यादा मेहनत करने वाली मां के नाम से बच्चों को जाना गया है। अर्जुन को  पांडु पुत्र ही नहीं, कुंती पुत्र भी कह कर पुकारा गया है, और आज के मशहूर फिल्म निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली अपने नाम के पीछे अपनी मां का नाम  लिखते हंै। जिनका  जनता से रोजमर्रा साबिके का काम है, क्या वह इन बातों से भी कुछ सीख नहीं सकते, जबकि कायदों में उन पर ऐसी कोई रोक लगाई नहीं गई है। अदालत ने कहा कि तक्नालॉजी लोगों का काम आसान बनाने के लिए है, उन्हें उलझाने के लिए नहीं। अच्छा होता कि पासपोर्ट  विभाग ने खुद ही यह बात सोची होती, अदालत से झाड़ खाने की नौबत से बच जाता!

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