इतिहास भविष्य नहीं होता, आने वाले कल कुछ भी हो सकता है

संपादकीय
23 मई  2016
जिन लोगों को इतिहास के साथ जीना अच्छा लगता है, और जो इतिहास को भविष्य के लिए एक पैमाना बनाकर चलते हैं, जो इतिहास से मिलने वाली नसीहतों से परे जाना नहीं चाहते हैं, उनके लिए दक्षिण भारत के अगल-बगल के दो राज्यों, और उत्तर-पूर्व के एक राज्य से कुछ अच्छी मिसालें सामने आई हैं। जयललिता की पार्टी ने तमिलनाडु में करीब तीस बरस बाद सत्ता पर लगातार दूसरी बार वापिस लौटने का रिकॉर्ड बनाया है। इसके पहले वहां पर द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता तवे के पराठे की तरह बारी-बारी से पलटती रहती थी, लेकिन जेल जाकर भी, मुकदमे झेलकर भी जयललिता ने यह रिकॉर्ड बनाया है, अकेले अपने दम पर, बिना किसी गठबंधन के। दूसरी तरफ केरल है जहां पर 92 बरस के माक्र्सवादी नेता वी.एस. अच्युतानंदन ने धुंआधार चुनाव प्रचार करके अपनी पार्टी को सत्ता पर पहुंचाया, और उस कांगे्रस को परास्त किया जो कि पश्चिम बंगाल में माक्र्सवादियों के साथ तालमेल से चुनाव लड़ रही थी। यह एक अलग बात है कि इतना करने के बाद भी इस बुजुर्ग नेता के बजाय वापमंथी किसी और को मुख्यमंत्री बना रहे हैं, लेकिन इस उम्र में कोई नेता चिलचिलाती धूप में साठ से अधिक आमसभाओं में भाषण देकर अपनी पार्टी को जिता सकता है, इससे देश के बाकी उन लोगों को एक सबक लेना चाहिए जो अपनी उम्र निकल जाने के मलाल में कई तरह की मंजिलों को अपनी पहुंच से परे का मानते हैं। फिर उत्तर-पूर्व है जहां पर देश की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला दूसरा राज्य है असम। इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने कांगे्रस की तीन बार की सरकार को परास्त करके अकेले अपने दम पर सरकार बनाई है, और एक नया इतिहास रचा है। इससे भी लोगों को यह सबक लेने की जरूरत है कि एक बंजर जमीन पर भी किस तरह अपनी फसल को लहलहाया जा सकता है।
अगर कोई महज इतिहास से चिपके रहते, तो तमिलनाडु, केरल, और असम में ऐसे चुनावी नतीजे नहीं आते। इससे एक तो यह बात निकलकर आती है कि इतिहास से सबक लेकर लोगों को आगे बढऩा आना चाहिए। जिस तरह कोई कार या दुपहिया चलाते हुए उसके पीछे देखने के शीशे में लगातार देखते हुए आगे बढऩा मुमकिन नहीं होता है, उसी तरह असल जिंदगी में भी पीछे तभी देखना चाहिए जब कोई जरूरत हो, वरना आगे बढऩे के लिए आगे देखना जरूरी होता है।
जो बात आज तक नहीं हुई है, वह आगे भी कभी नहीं होगी, इस सोच के साथ कोई कामयाब नहीं हो सकते। क्या दुनिया में ईमेल बनने के पहले कभी किसी ने सोचा था कि चिट्ठयां इस कदर बेदखल हो जाएंगी? इंटरनेट के पहले किसी ने यह सोचा था कि दुनिया के अरबों लोग सुबह उठकर घरवालों का चेहरा देखने से पहले इंटरनेट देखेंगे? क्या किसी ने कभी गूगल के बारे में कल्पना की थी? फेसबुक या ट्विटर जैसी चीज सोची थी? लेकिन ये तमाम बातें उन लोगों ने कर दिखाईं जिनके परिवार कभी कारोबार में नहीं थे। और यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया के एक सबसे संपन्न कारोबारी वारेट बफे ने अपनी तकरीबन पूरी ही दौलत बुढ़ापा शुरू होने के बाद कमाई। दूसरी तरफ उम्र में जब उनसे आधे से भी कम वर्षों का रहा होगा, तब मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक से खरबों की दौलत खड़ी कर ली। इसलिए इतिहास की मिसालों को उन लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए जिनके पास किसी जीत या हार, कामयाबी या नाकामयाबी का विश्लेषण करने के लिए समय ही समय है।

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