झीरम हमले के तीन बरस बाद कांगे्रस के घरेलू सवाल खड़े हुए

विशेष संपादकीय 
25 मई  2016 
-सुनील कुमार
देश के नक्सल हिंसा के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले, झीरम घाटी, को आज 3 बरस पूरे हो रहे हैं, और छत्तीसगढ़ के सामने इससे जुड़े हुए कई सवालों के जवाब नहीं आ पाए हैं। इस हमले में छत्तीसगढ़ कांगे्रस के बहुत से बड़े नेताओं को नक्सलियों ने पहचान-पहचानकर, छांट-छांटकर मारा था, या छोड़ा था। इसकी पुलिस जांच के बाद इसकी जांच एनआईए ने की, और अब राज्य सरकार ने यह जांच कांगे्रस की मांग पर सीबीआई को दे दी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने यूपीए सरकार के वक्त ही यह जांच शुरू की थी, लेकिन कांगे्रस लगातार इसके लिए सीबीआई जांच मांगती रही। केंद्र में अब मोदी सरकार के रहते हुए कांगे्रस की इस मांग को तो पूरा कर दिया गया है, लेकिन एक सवाल यह उठ रहा है कि आतंक की जैसी वारदातों की जांच के लिए एनआईए को बनाया गया है, वैसी इस वारदात की जांच सीबीआई क्या ज्यादा अच्छे तरीके से कर सकेगी?
इससे परे एक सवाल लोगों के मन में यह भी है कि झीरम के नक्सल-हमले की साजिश के पीछे कांगे्रस के कुछ लोगों का हाथ होने का जो शक कांगे्रस के ही बाकी लोगों को है, उस शक का 3 बरस पूरे होने पर भी कुछ नहीं हो पाया है। और जैसे-जैसे यह जांच एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को जा रही है, वैसे-वैसे सच के पुराने होने और धुंधले होने का खतरा भी बढ़ते चल रहा है। आज झीरम की बरसी पर कांगे्रस के इस हमले में मारे गए बड़े-बड़े नेताओं को याद करते हुए पार्टी के कई लोग यह भी कह रहे हैं कि कांगे्रस के ही जो लोग इस साजिश के पीछे थे, वे शायद कभी सजा तक न पहुंच पाएं।
इन तीन बरसों में इस नक्सल हमले से जुड़े जितने भी तथ्य सामने आए हैं, इनमें पुलिस के इंतजाम की लापरवाही की बात हो सकती है, लेकिन अगर किसी साजिश के तहत कांगे्रस के नेताओं को चुन-चुनकर मारा गया, और नक्सलियों ने भाड़े के हत्यारों की तरह काम किया था, तो ऐसी साजिश कांगे्रस के भीतर की साजिश होने के आसार अधिक दिखते हैं, और इससे राज्य की सरकार का लेना-देना नहीं दिखता है। कांगे्रस के भीतर अगर ऐसी साजिश हुई थी, तो वह ऐसी पहली साजिश नहीं थी, और छत्तीसगढ़ कांगे्रस लगातार इस तरह की भीतरघाती साजिशें झेल ही रही है।
आज जब कांगे्रस के पास देश भर में करने को बहुत ही कम बचा हुआ है, तो यह सही मौका है जब वह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अपनी पार्टी को साजिशों और भीतरघात से आजाद कराए। अगले विधानसभा चुनावों में जिन राज्यों में कांगे्रस के पास एक जीत हासिल करने की संभावना है, उनमें छत्तीसगढ़ को भी गिना जा सकता है। यहां पर कांगे्रस पिछले 3 चुनावों में भाजपा से पीछे तो रही है, लेकिन उसकी हालत देश के दूसरे राज्यों से बेहतर भी रही है। ऐसे में कांगे्रस को अपना घर सुधारना चाहिए और अपनी पार्टी को इस राज्य में जीतने का एक मौका देना चाहिए। झीरम से परे भी छत्तीसगढ़ में यह बात आम कही जाती है कि कांगे्रस भाजपा से तो जीत ले, लेकिन अपने खुद के भीतरघात से जीत ले, उसके बाद ही वह जीत हो सकती है।
झीरम हमले को लेकर कांगे्रस की सीबीआई जांच की मांग पूरी होने के बाद, राज्य सरकार द्वारा केंद्र को यह सिफारिश भेज देने के बाद अब राज्य सरकार के पास इस मामले में करने को और कुछ नहीं बचा है। लेकिन कांगे्रस पार्टी ने जांच को एनआईए से सीबीआई को दिलवा दिया, लेकिन भारत के राजनीतिक दल लगातार सीबीआई को केंद्र सरकार का हथियार, औजार, तोता, या प्रधानमंत्री का थाना कहते आए हैं। जबकि एनआईए आंतरिक सुरक्षा के कई राज्यों में बिखरे हुए मामलों की जांच के लिए काम करने वाली एक एजेंसी है, जो कि अदालत में इस मामले को पेश कर भी चुकी थी, और उसे यह जिम्मा यूपीए सरकार के समय से मिला हुआ था।
अब मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली एक एजेंसी से यह जांच दूसरी एजेंसी को चली गई है, और इसके साथ ही छत्तीसगढ़ कांगे्रस एक मुद्दा भी खो बैठी है। अब अगर छत्तीसगढ़ कांगे्रस संगठन के पास कोई विकल्प हैं, तो वे अपनी पार्टी के भीतर ही हैं, किसी जांच एजेंसी के पास नहीं। झीरम हमले के तीन बरस होने के बाद भी कांगे्रस अपने भीतर इन्हीं सवालों के जवाब नहीं ढूंढ पाई है, और छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में कांगे्रस की जीत इस पर्चे को हल किए बिना मुमकिन नहीं है। 

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