धर्म और सेक्स-शोषण

संपादकीय
26 मई  2016
अंधविश्वास में पड़ी महिलाओं का सेक्स-शोषण करने के आरोप में एक और चर्चित परमानंद नाम का बाबा गिरफ्तार हुआ है। आसाराम को एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में बिना जमानत जेल में पड़े बरसों हो रहे हैं, और दक्षिण भारत का नित्यानंद नाम का एक स्वामी अपने सेक्स-वीडियो के बावजूद उज्जैन के सिंहस्थ में सिंहासन पर विराजमान देखने में आया। और अभी बिना कपड़ों वाले एक ऐसे नागा साधू की पैर फैलाए बैठे तस्वीर सामने आई है जिसके पैर दबाते एक भक्त महिला बैठी है। और हिन्दू धर्म से परे अगर देखें, तो ईसाई पादरियों के बच्चों से बलात्कार की खबरें हम पूरी जिंदगी से देखते आ रहे हैं, और बहुत किस्म की जांच में यह साबित हो चुका है कि कई कोप आए-गए, और उन्होंने ऐसे मुजरिम पादरियों को बचाना जारी रखा। भारत की कई धार्मिक परंपराओं को देखें, तो मंदिरों में देवदासी प्रथा के तहत महिलाओं के देह शोषण की लंबी परंपरा रही है।
अब इससे दो बातें निकलकर आती हैं, एक तो यह कि धर्म को किसी तरह के जुर्म से कोई परहेज नहीं होता। और धर्म का जो केन्द्र है, उस ईश्वर का कोई भी बस ऐसे जुर्मों पर नहीं चलता। अलग-अलग घरों में और खेत-खलिहानों में होने वाले बलात्कारों को ईश्वर हो सकता है कि देख न पाता हो, हालांकि उसे कण-कण में व्याप्त बताया जाता है, सर्वत्र उपस्थित बताया जाता है, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ बताया जाता है, लेकिन हो सकता है कि हर जगह तक उसकी नजरों के द्रोन न पहुंच पाते हों। फिर भी यह कैसे माना जा सकता है कि मंदिर और चर्च में, पुजारियों या साधुओं के हाथों, या कि पादरियों के हाथों महिलाओं और बच्चों के होने वाले सेक्स-शोषण पर भी उसकी नजर न पड़ती हो? इन जगहों पर तो वह प्रतिमाओं से लेकर तस्वीरों तक मौजूद रहता है, और इन जगहों की दुकानदारी उसके नाम पर ही चलती है, यहां पर तो हर सांस में उसका नाम लिया जाता है, फिर भी यहां का बलात्कार उससे अनदेखा रह जाता है। अब ऐसे ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहकर यह कहना कहां तक ठीक है कि दुनिया में उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। तो क्या बलात्कार की शिकार इन महिलाओं और इन बच्चों के कपड़े उसकी मर्जी के बिना हिल जाते हैं और उतर जाते हैं? क्या इन पर हिंसा ईश्वर की मर्जी के बिना हो जाती है?
अब इससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह खड़ा होता है कि महिलाओं को अलग-अलग धर्मों में मंदिरों से लेकर दरगाहों तक घुसने नहीं मिलता। जिस महिला को धरती के तमाम लोगों की जननी कहा गया है, जिसके अनगिनत रूप अलग-अलग कई धर्मों में पूजे जाते हैं, वहां पर महिलाओं को ईश्वर से दूर रखना, या भारत के कुछ हिन्दू सम्प्रदायों में तो उन्हें सम्प्रदाय-प्रमुख की नजरों से भी परे रखना आम बात है। तो एक तरफ तो ईश्वर को महिलाओं से, या महिलाओं को ईश्वर से दूर रखा जाता है, और दूसरी तरफ ईश्वर का नाम लेकर अपनी दुकान चलाने वाले आसाराम से लेकर इस नए ताजे बाबा, परमानंद तक, बलात्कार के आरोपों से घिरे रहते हैं। तो फिर धर्म की नजर में महिला ईश्वर के सामने तक पहुंचने के लायक भी नहीं हैं, लेकिन बलात्कार और सेक्स के लायक है? यह सब देखते हुए जो कुछ बातें हमें समझ नहीं आती है, उनमें से एक तो यह है कि महिलाएं क्यों ऐसे बाबाओं के चक्कर में अपनी देह लुटाती हैं जो कि उन्हें जन्नत की सैर का सपना दिखाते हैं? और दूसरी बात यह कि उन धर्मस्थलों में घुसने को महिलाएं क्यों बेताब रहती हैं जिन धर्मस्थलों में बसे हुए ईश्वर के हाथ में न तो उन महिलाओं को वहां तक दाखिला देने की ताकत है, और न ही उन्हें धर्मगुरुओं के बलात्कार से बचाने की ताकत है। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि ईश्वर और धर्म के नाम पर हिंसक पाखंड का जो जुर्म बहुत से धर्मों में फैला हुआ है, उससे एकमुश्त लडऩे की जरूरत है, सिर्फ महिला अधिकारों के लिए वहां दाखिले के हक के लिए लडऩा काफी नहीं है।
आज लोगों को आस्था से परे धर्म को उसकी जगह दिखाना चाहिए, और आस्था को अपने भीतर, अपने घर के भीतर सीमित रखना चाहिए।

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