दुनिया के सामानों में किफायत बरते बिना धरती नहीं बचेगी..

संपादकीय
27 मई  2016
एक ऐसा नया मोबाइल फोन बन रहा है जिसमें लोग अपनी मर्जी के हिस्से जोड़-जोड़कर अपने काम का फोन बना लेंगे, और उसमें बिना जरूरत का कोई हिस्सा नहीं रहेगा। कुछ लोगों को कैमरे की जरूरत नहीं रहती है, कुछ लोगों को संगीत की जरूरत नहीं रहती, और कुछ लोगों को एफएम बैंड के रेडियो की जरूरत नहीं रहती। लेकिन आज सारे फोन न सिर्फ एक पैकेज की तरह आते हैं, बल्कि उनके साथ चार्जर या ईयरफोन या जोडऩे वाला तार, ये सब अनिवार्य रूप से आते हैं, और कई लोगों के पास ये हिस्से पहले से रहने से प्लास्टिक का कबाड़ बढ़ते चलता है। जिस तरह सजी हुई थाली के बजाय अपने हाथ से उठाकर लेने और खाने की बर्बादी कुछ कम हो सकती है, उसी तरह कम्प्यूटर और मोबाइल फोन रहने चाहिए, और मुमकिन हो तो जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले कई और उपकरण भी ऐसे ही होने चाहिए जिसमें लोग जरूरत और पसंद के मुताबिक हिस्से कम या अधिक कर सकें।
विज्ञान और टेक्नालॉजी को कुछ और मोर्चों पर भी काम करने की जरूरत है, जिसमें से एक तो अलग-अलग उपकरणों में लगने वाली बैटरियों का मामला है। कैमरों से लेकर मोबाइल फोन तक, और संगीत के उपकरणों तक सैकड़ों तरह की बैटरियां लगती हैं। इनको सीमित करने की कोशिश होनी चाहिए, ताकि बैटरियों का कबाड़ धरती पर बढ़ता न चला जाए। इसी तरह उपकरणों के चार्जर की बात है, कम्प्यूटरों से उनके जुडऩे की बात है, और इन सामानों की पैकिंग की बात भी है। आज तरह-तरह के भारी-भरकम और सजावटी बक्सों में सामान आते हैं, और ये बक्से सामान निकलते ही बेकार हो जाते हैं। धरती पर कबाड़ और कचरे का बोझ इस रफ्तार से बढ़ रहा है कि वह कुदरत को दफन करते जा रहा है। शहरों में ठोस कचरे का निपटारा पूरी दुनिया की एक बड़ी दिक्कत बन गई है, और ऐसे में पैकिंग को घटाकर, उपकरणों के साथ आने वाले सामानों को घटाकर धरती की बर्बादी धीमी की जा सकती है। आज विकसित दुनिया के देश कम्प्यूटरों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों का कचरा गरीब देशों पर थोप रहे हैं, और इनके नुकसानदेह हिस्से अलग करने वाले मजदूर और इलाके लगातार खतरा झेल रहे हैं।
लेकिन टेक्नालॉजी और बाजार से परे की एक और बात है। धरती के लोगों के अपनी जरूरतों को बढ़ाने, और हसरतों को रात-दिन पंजों पर तैयार रखने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि उन्हें सचमुच किन नए सामानों की जरूरत है, और क्या उनके मौजूदा सामान सचमुच दम तोड़ चुके हैं, या कि वे सामान उनकी ताजा जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं? बाजार की रणनीति तो होती ही यही है कि वह सामानों में आए दिन कुछ नई बातों को जोड़कर लोगों के मन में उनके मौजूदा सामानों के लिए एक हिकारत पैदा करे, और हीन भावना भर दे। लोगों को किसी सामान का नया मॉडल आते ही अपना मौजूदा मॉडल कमजोर और बेकार लगने लगता है। बहुत से लोग ऐसी स्थायी बेचैनी के साथ जीते हैं और रात-दिन वे इन खबरों पर नजर रखते हैं कि कब कौन सा नया फोन आ रहा है, नया कम्प्यूटर, नया कैमरा, नई मोटरसाइकिल या नई कार कब आ रही है। ऐसी बेचैनी के चलते जो लोग नए सामान का खर्च उठाने की ताकत रखते हैं, वे तमाम लोग खुद भी नए मॉडल खरीदते हैं, और अपने आसपास एक संक्रामक रोग की तरह हसरत और बेचैनी को फैलाते हैं। इंसानों को खुद भी अपनी इस सोच से बचना होगा, वरना धरती का बचना मुश्किल होगा।
टेक्नालॉजी बाजार की मांग को बढ़ाती भी है, लेकिन कई किस्म की टेक्नालॉजी लोगों के काम को आसान करती है, और जरूरतों को सीमित भी करती है। पर्यावरण का फायदा करने वाली ऐसी टेक्नालॉजी को हर कदम पर बढ़ावा देने की जरूरत है, ऐसा इसलिए नहीं हो पाता है कि यह बाजार के हितों के खिलाफ रहता है। लेकिन फिर भी जब आसान और कम खर्च तकनीक आ ही जाती है, तो फिर बाजार की उसे रोकने की ताकत आखिर तक नहीं टिक पाती। इसलिए दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को लोगों की जिंदगी को आसान करने वाले सामान बनाने की कोशिश करनी चाहिए। और मोबाइल फोन में अपनी जरूरत के हिस्सों को जोड़कर अगर कोई अपने लायक फोन बना सके, तो यह सचमुच बड़ी अच्छी बात होगी, और इससेलोगों की, धरती की बड़ी बचत भी होगी।

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