मोदी के दो बरस पूरे होने पर सीखने की एक बात यह भी...

संपादकीय
28 मई  2016
मोदी सरकार के दो बरस पूरे होने पर कई तरह के विश्लेषण जारी हैं। सरकार के कामकाज, उनकी पार्टी के कामकाज, उनकी पार्टी या उनके राष्ट्रीय गठबंधन की पार्टियों की राज्य सरकारों के कामकाज, ऐसे कई पैमानों पर मोदी को आंका जा रहा है। भारत के बाहर भी ऐसे लोग मोदी के बारे में लिख रहे हैं जिनकी भारत में भी कोई दिलचस्पी है। अब तक तीन दर्जन से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके नरेन्द्र मोदी को लेकर दुनिया के अधिकतर देशों के पास कहने को कुछ न कुछ तो है ही। लेकिन आज सुबह टीवी शुरू करते ही उत्तर-पूर्व में मेघालय के एक गांव में वहां के स्थानीय लोक नर्तकों के साथ वहां का वाद्य बजाते हुए मोदी को देखकर यह भी लगा कि मेहनत का भी कोई विकल्प नहीं है। कल ही अरूण जेटली ने भी यह कहा था कि अपने मंत्रियों के लिए प्रधानमंत्री मोदी का एक ही फार्मूला है कि न सोऊंगा, न सोने दूंगा।
हम मोदी की बहुत सी दूसरी बातों को अलग रख रहे हैं क्योंकि उनके बारे में हम दो बरस से लिखते ही आ रहे हैं। लेकिन राजनीति से परे जो एक बात देश के तमाम लोगों को सोचने की हो सकती है, वह यह है कि लोग अपनी कड़ी मेहनत से कितना कुछ हासिल कर सकते हैं। हम यहां मोदी की कामयाबी और नाकामयाबी, और जलते-सुलगते राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी की बात नहीं छेड़ रहे, क्योंकि उस पर जाने से आज की इस बात का आज का पहलू धरा रह जाएगा। आज देश में तरह-तरह के इम्तिहानों के नतीजे निकल रहे हैं, और कई लोग नाकामयाब होकर, या उम्मीद जितनी कामयाबी न मिलने से खुदकुशी भी कर रहे हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि इनमें शायद ही ऐसे लोग होंगे जिन्होंने मोदी जितनी मेहनत की हों। और यह मेहनत एक खास दायरे में तब कुछ अधिक मायने रखती है, जब मोदी बिना किसी तजुर्बे के अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर इतनी अधिक मेहनत कर रहे हैं और वहां तारीफ भी पा रहे हैं। मतलब यह एक कड़ी मेहनत बेकार नहीं जाती। इस उम्र में वे अगर रोज 18 घंटे काम करते दिखते हैं, तो वे काम तो पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जितना ही कर रहे हैं, लेकिन बहुत से मोर्चों पर वे मनमोहन सिंह से अलग एक अलग किस्म की सक्रियता के साथ, मौलिकता के साथ काम कर रहे हैं और रफ्तार से सीख भी रहे हैं।
देश के बहुत से लोगों को इससे यह सीख लेनी चाहिए कि बिना किसी तजुर्बे के भी किसी नए काम को कैसे बखूबी किया जा सकता है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी अपने प्रदेश के दंगों की वजह से पूरी दुनिया में अछूत की तरह माने गए थे, और एक के बाद एक अनगिनत देशों ने उनका अघोषित और घोषित बहिष्कार कर रखा था। अमरीका और योरप के कई देशों में उन्हें वीजा देने से भी इंकार कर दिया था, और आज भी उन्हें कई देशों में प्रधानमंत्री के पद की वजह से वीजा मिला है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक भी दिन के तजुर्बे के बिना, केन्द्रीय राजनीति या केन्द्र सरकार में एक दिन भी काम किए बिना अगर नरेन्द्र मोदी इस रफ्तार से केन्द्र सरकार, केन्द्रीय राजनीति, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सीख रहे हैं, और बखूबी कर रहे हैं, तो यह देश के अनगिनत लोगों के लिए अधिक उम्र में भी नई बातों को सीखने की एक राह है।
बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि 60 बरस की उम्र के बाद लोगों को अपना ध्यान भजन-पूजन में लगाना चाहिए, लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी इस उम्र के बाद ही पाई है। इनमें मोदी भी एक हैं, और दुनिया के एक सबसे कामयाब कारोबारी वारेन बफे भी हैं, जिन्होंने अपनी लगभग सारी दौलत 60 बरस की उम्र के बाद ही कमाई। वारेन बफे की मिसाल हमने दो-चार दिन पहले ही इसी जगह पर और दी थी, और दुनिया की सकारात्मक मिसालों से सीखने की जरूरत बहुतों को रहती है। मोदी के दो बरस पूरे होने पर उनके बाकी अच्छे और बुरे कामों पर बात तो होती रहेगी, लेकिन उनके व्यक्तित्व के इस पहलू पर भी सोचने की जरूरत है, और उससे कुछ सीखने की जरूरत भी उन लोगों को है जो कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें