एक खालिस अमरीकी की तरह ओबामा ने नोबल पाया पहले उसके लायक काम बाद में किए

संपादकीय
29 मई  2016
बराक ओबामा के अमरीकी राष्ट्रपति बनने पर जब जल्द ही उन्हें नोबल शांति पुरस्कार दिया गया तो बाकी दुनिया के साथ-साथ वे खुद भी हैरान रह गए थे क्योंकि न तो राष्ट्रपति बनने के पहले, और न ही राष्ट्रपति बनने के बाद उनका कोई ऐसा काम था जिसके लिए ही उन्हें विश्व का यह सबसे बड़ा सम्मान दिया जाता। खुद अमरीकी विश्लेषकों ने हैरानी जाहिर की थी और नोबल कमेटी के फैसले की आलोचना भी की थी। लेकिन यह पहला मौका नहीं था कि नोबल शांति पुरस्कार को लेकर विवाद न हुए हों। इस पसंद को लेकर जब आवाजें उठीं तो कमेटी ने कहा कि यह पुरस्कार ओबामा को इसलिए नहीं दिया गया है कि वे भविष्य में क्या करेंगे, बल्कि इसलिए दिया जा रहा है कि उन्होंने पिछले बरस में क्या किया है। और हम यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि जो वे कर रहे हैं उस दिशा में और भी करेंगे।
ओबामा अपने पिछले अमरीकी राष्ट्रपति, अपनी विपक्षी पार्टी के जॉर्ज डब्ल्यू बुश के मुकाबले उस वक्त भी अधिक उदारवादी थे, और इन आठ बरसों के कार्यकाल के आखिर में पहुंचते हुए भी वे उदार दिख रहे हैं। लेकिन फिर भी आज उनके बारे में लिखने की जरूरत इसलिए पड़ रही है कि बराक ओबामा ने पहले नोबल शांति पुरस्कार पा लिया, और अब उसे चुकता कर रहे हैं। पिछले छह महीनों की ही बात करें, तो उन्होंने तीन ऐसे काम किए हैं जो उन्हें नोबल शांति पुरस्कार का हकदार बनाते हैं, और इनमें से पहला फैसला था, कई दशकों से चले आ रहा क्यूबा का बहिष्कार, और उस पर लादी गई अमरीकी बंदिशों का खात्मा। इसके बाद दूसरा फैसला था वियतनाम पर लादी गई बंदिशें खत्म करना। और अब तीसरा काम उन्होंने किया है जापान के उस हिरोशिमा में जाकर श्रद्धांजलि देने का जिस पर परमाणु बम गिराकर अमरीका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में तबाही का एक नया इतिहास रचा था। हालांकि ओबामा ने हिरोशिमा जाकर श्रद्धांजलि तो दी, लेकिन बम गिराने के उस वक्त के अमरीकी फैसले पर माफी नहीं मांगी। खैर, हम इसे भी कम नहीं समझते कि पहली बार एक अमरीकी राष्ट्रपति ने हिरोशिमा जाकर श्रद्धांजलि देने का मुश्किल काम किया।
अमरीकी संस्कृति का एक हिस्सा है कि पहले खाओ, फिर कमाओ। वहां की जिंदगी क्रेडिट कार्ड पर चलती है। लोग उधारी में जीते हैं। पहले खा लेते हैं, और फिर कमाकर चुकाते हैं। नोबल शांति पुरस्कार चयन समिति के फैसले में चाहे जितनी बुनियादी खामी रही हो, ओबामा ने अपने कुछ फैसलों से यह उधारी चुका दी है। उन्हें मानो नोबल शांति पुरस्कार क्रेडिट पर मिला था, और उन्होंने इन तीन फैसलों के अलावा इंसानियत के कुछ और फैसले भी किए, मुस्लिमों के खिलाफ गोरी दुनिया में फैलती नफरत को घटाने का काम किया, लोगों का बर्दाश्त बढ़ाया, और अमरीकी फौज के कुख्यात प्रताडऩा केन्द्रों को बंद किया। ओबामा ने अमरीकी राष्ट्रपति भवन में एक इंसानियत की वापिसी की जो कि उनके पहले के आठ बरसों में उखाड़कर बाहर फेंक दी गई थी।
दुनिया में इतिहास आमतौर पर काम करके रचा जाता है, और ओहदों से जाने के बाद इतिहास में दर्ज होता है। बराक ओबामा का नाम अमरीका के इतिहास में इसलिए दर्ज नहीं हो सकता था कि उन्होंने कुछ और देशों पर फौजी हमले किए, कुछ और देशों में अपनी फौजों की मौजूदगी बढ़ाई, कुछ और देशों की सरकारें पलटीं, और अपने देश की अर्थव्यवस्था बेहतर की। ओबामा ने अमरीकी अहंकार को घटाने की कोशिश की, और दूसरे देशों से अपनी फौज को हटाने की कोशिश भी की। उन्होंने दुनिया में फैलते हुए इस्लाम से खौफ, इस्लाम से नापसंदगी को भी घटाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने अमरीका में चारों तरफ, घर-घर, कमरे-कमरे तक फैली हुई बंदूकों के खिलाफ एक जनचेतना खड़ी करने की कोशिश की, और अमरीका के भीतर नस्ल या रंग के आधार पर, धर्म या राष्ट्रीयता के आधार पर जो अल्पसंख्यक हैं, उन सबको हिफाजत देने की कोशिश भी की।
इस बात को लिखने की जरूरत आज इसलिए है कि अमरीका और दुनिया के इतिहास में ओबामा के ठीक पहले के रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का नाम एक जंगखोर, युद्धोन्मादी राष्ट्रपति के रूप में दर्ज हुआ है, और ओबामा ने अपने उदार फैसलों से उस कुर्सी की तस्वीर को बदलने की भरसक कोशिश की है। बाकी दुनिया को भी ओबामा के तौर-तरीकों से सीखने की जरूरत है। दुनिया में तंगदिली और नफरत को बढ़ाकर कोई आगे नहीं बढ़ सकते। और यह भी नहीं हो सकता कि लोग अपने आपको तो दरियादिल बताते चलें, और उनके साथ के लोग इस दरिया की मछलियों को रंग और नस्ल के आधार पर अलग-अलग मछली घरों में बांटते चलें। अमरीका के ताजा इतिहास में ओबामा का नाम अलग से दर्ज रहेगा। और अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यकाल तो चार बरस का होता है, और अधिकतम दो बार का हो सकता है। लेकिन भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री के सामने एक अलग मौका रहता है, और आज है भी। नेहरू, इंदिरा जैसे लोग मरने तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे, और आज भी किसी प्रधानमंत्री पर ऐसी कोई रोक नहीं है कि वे दस-बीस बरस इस ओहदे पर न रह सकें। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह सोचना चाहिए कि वर्तमान के फैसलों से अपने खुद के इतिहास को भी पीछे छोड़ा जा सकता है, और एक नया भविष्य बनाया जा सकता है, आने वाले इतिहास में न महज अपना नाम, बल्कि अपने देश का नाम भी दर्ज किया या करवाया जा सकता है।
ओबामा ने अपने कार्यकाल के आखिरी दौर की दावतों को देना शुरू कर दिया है। आठ बरस तक राष्ट्रपति रहने के बाद अमरीकी नेताओं के पास सरकार में कोई काम नहीं बचता, लेकिन वे दुनिया भर में अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि के रूप में, देशों के बीच मध्यस्थ के रूप में, या संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में बहुत से काम कर सकते हैं। लेकिन ऐसी किसी भी भूमिका के लिए राष्ट्रपति की हैसियत से किए गए उनके काम मायने रखते हैं। जॉर्ज बुश ने जितने देशों पर बमबारी करके जितने लाख बेकसूर मारे हैं, उस इतिहास के साथ न उनका कोई वर्तमान रहा, और न ही कोई भविष्य रह सकता। दुनिया में जब जंगखोरों का कोई जमावड़ा होगा, तो शायद उसमें बुश को बुलाया जाए, लेकिन पिछले कोई सात बरसों में हमको ऐसा कोई मौका याद नहीं पड़ता। इसलिए आज की दुनिया के राष्ट्रप्रमुखों, या शासनप्रमुखों यह याद रखना चाहिए कि उनका इतिहास चाहे जो रहा हो, उनके भविष्य को उनका वर्तमान ही तय करता है। 

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