संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का ऐसा बर्ताव शर्मनाक

संपादकीय
3 मई  2016
पिछले लोकसभा आम चुनाव में मुंबई में फिल्म अभिनेता गोविंदा से हार चुके भाजपा के एक पुराने और बड़े नेता राम नाईक ने अपनी ताजा किताब में दावा किया है कि गोविंदा ने उन्हें हराने के लिए दाउद की मदद ली थी। राम नाईक अभी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हैं, और इस किताब के पहले भी अपने बहुत से सार्वजनिक बयानों में वे घोर सांप्रदायिक और कट्टर बातें कहते आए हैं। अब सवाल यह है कि राज्यपाल की कुर्सी पर बैठे हुए एक व्यक्ति को किस तरह के और कितने विवादों में उलझना चाहिए? यह बात सही है कि लोग अपनी आत्मकथा में कई तरह की बातें लिखते हैं, और उनमें से कई बातें विवाद की भी रहती हैं, लेकिन ऐसी बातों के लिए लोगों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के साथ थोड़ा सा धैर्य रखना चाहिए। अब राज्यपाल और राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज अगर ऐसे विवाद वाली बातें लिखने और कहने लगें, और उनके खिलाफ आहत लोग मानहानि के मुकदमे लेकर अदालतों में जाने लगें, तो क्या होगा?
सार्वजनिक जीवन में जहां सब कुछ कहने का हक हर किसी को रहता है, वहीं पर लोगों को यह समझने की जिम्मेदारी भी रहती है कि वे अपने पद की गरिमा, और उसकी जरूरतों के खिलाफ जाकर हरकतें न करें। भारत में हमेशा से अलग-अलग राजनीतिक दलों के मनोनीत किए गए ऐसे कई राज्यपाल रहे हैं, जो बहुत ही ओछी बयानबाजी करते रहे हैं। इनकी वजह से लोकतंत्र में गलत परंपराएं शुरू भी होती हैं, और लोगों के मन में राज्यपाल के पद के लिए सम्मान खत्म हो जाता है। इस देश ने ऐसे भी राज्यपाल देखे हैं, जो राजभवनों में तरह-तरह के सेक्सकांड में उलझे रहते थे, और जिनकी वीडियो क्लिप इंटरनेट पर तैरती रहती थीं, और लोगों को उन राज्यपालों की चर्चा में भी शर्म आती थी। कुछ बरस पहले ही एक ऐसा राज्यपाल भी लोगों ने भ्रष्टाचार के शिकार झारखंड में देखा जिसके बेटे राजभवन में रिश्वतखोरी की दुकान खोलकर बैठ गए थे। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि किसी राज्यपाल का कुनबा काले धंधे करते हुए राजभवन पर काबिज रहे, और राज्यपाल को पता न लगे।
हम फिर उसी बात पर लौटते हैं, जिससे आज का यह मुद्दा शुरू हुआ है। किसी भी उम्मीदवार ने चुनाव जीतने के लिए दाउद इब्राहिम की मदद ली, यह बड़ा ही भारी भरकम आरोप है, और अगर इसके कोई सुबूत हैं, तो ऐसे उम्मीदवार को जेल जाना चाहिए, और अगर ऐसे सुबूत नहीं हैं, तो ऐसे आरोप लगाने वाले को मानहानि के आपराधिक मुकदमे में जेल जाना चाहिए। यह एक अलग बात है कि राज्यपाल के पद को जिस तरह की संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है, उसके चलते उनका जेल जाना मुमकिन नहीं होता, जैसे कि मध्यप्रदेश के मौजूदा राज्यपाल व्यापम घोटाले में अपनी व्यापक भूमिका के आरोपों के बाद भी अदालती कटघरे के बाहर बचे हुए हैं। लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का ऐसा बर्ताव शर्मनाक है, और धिक्कार के लायक है।

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