सरकारी अस्पताल बिगडऩे देकर निजी को बढ़ावा...

संपादकीय
30 मई  2016
मध्यप्रदेश के इंदौर में सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन और नाइट्रस ऑक्साईड के अलग-अलग गैस पाईपों में किसी गलतफहमी की आशंका है और दो बच्चों की मौत हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि ऑक्सीजन की जगह यह दूसरी गैस उनको दे दी गई। इस मामले की जांच हो रही है, लेकिन हम मध्यप्रदेश से परे छत्तीसगढ़ को देखते हैं तो सरकारी अस्पतालों की बदहाली के किस्सों से यहां के अखबार रोज ही रंगे रहते हैं। किस तरह कहीं मशीनें खराब रहती हैं, कहीं लाशों को भी छूने के लिए वसूली की जाती है, कहीं दवाइयां घटिया या नकली खरीदी जाती हैं, और किस तरह प्रदेश भर के सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं। अगर अखबारों में छपी खबरों पर ही सरकार रोज के रोज जांच करके चीजों को सुधारने की कोशिश करती, तो भी राज्य बनने के बाद से अब तक तस्वीर बदल चुकी होती। लेकिन इस डेढ़ दशक में सरकारी खर्च तो इलाज के ढांचे पर बढ़ते चले गया है, लेकिन सुधार नहीं आया है। दूसरी तरफ सरकार ने गरीबों के इलाज के लिए उनको एक स्वास्थ्य बीमा कार्ड दिया है जिससे निजी अस्पतालों में भी उनका इलाज हो सकता है, और प्रदेश भर में एम्बुलेंस का एक ढांचा खड़ा किया है जिससे किसी जख्मी या बीमार को, या किसी मां बनने वाली महिला को तेजी से अस्पताल या स्वास्थ्य केन्द्र तक पहुंचाया जा सकता है। इससे मरीज के अस्पतालों तक जाना तो आसान हो गया है, निजी अस्पतालों में इलाज भी संभव हो गया है, लेकिन सरकार अपने ढांचे को सुधार नहीं पाई है। इस प्रदेश में नकली मशीनों से लेकर नकली दवाओं तक का कारोबार सरकारी खरीदी पर पनपते रहता है, और निजी अस्पताल बिना जरूरत गरीबों का इलाज करके, उनका गर्भाशय निकालकर उनके स्मार्ट कार्ड से दसियों हजार रूपए पाते रहते हैं, लेकिन इलाज की बुनियादी सरकारी व्यवस्था को सरकार बिल्कुल भी नहीं सुधार पा रही है।
आज ही छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े, राजधानी के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कैंसर के इलाज की एक करोड़ों की मशीन शुरू होने जा रही है, लेकिन इसके बाद भी सरकारी मदद से, सरकारी खर्च से हर बरस हजारों लोग निजी अस्पतालों में कैंसर के इलाज के लिए जाते हैं। प्रदेश के बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में जिन ऑपरेशनों की सहूलियत है, या होनी चाहिए, उनके लिए सरकार निजी अस्पतालों को हर बरस हजारों करोड़ रूपए दे रही है। इसमें सरकार के अपने अमले का इलाज भी शामिल है। यह नौबत देखकर लगता है कि कुछ लोगों की यह आशंका शायद पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है कि जान-बूझकर भी सरकारी इंतजाम को खराब रखा जाता है ताकि निजी अस्पतालों का कारोबार अधिक चल सके। इसमें सरकार के किस स्तर पर साजिश होती है, और कौन-कौन लोग शामिल होते हैं, यह अंदाज लगाना मुश्किल है, लेकिन जो सरकार राशन के गली-गली तक के इंतजाम को सुधार सकती है, वह सरकार अपने गिने-चुने मेडिकल कॉलेज-अस्पतालों को क्यों नहीं सुधार सकती, यह कोई बड़ा रहस्य नहीं लगता।
धीरे-धीरे करके सरकार पढ़ाई और इलाज जैसी अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को छोड़ती जा रही है, और सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, महंगे निजी स्कूल बढ़ रहे हैं, महंगे निजी कॉलेज बढ़ रहे हैं, और सरकारी इंतजाम की साख घटती जा रही है। इसी तरह पीने के पानी से लेकर सफाई तक के काम निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, और यह समझाने की कोशिश होती है कि सरकारी इंतजाम कभी अच्छा नहीं हो सकता। छत्तीसगढ़ की पहली कांग्रेस सरकार ने सरकारी बसों को बंद कर दिया था। आज निजी बसें रोज सड़कों पर अंधाधुंध रफ्तार से हादसे करती हैं, और लोगों के पास उन रास्तों पर बसें नहीं रहतीं जो कि कम कमाई के हैं। दूसरी तरफ पड़ोस के महाराष्ट्र से रोज छत्तीसगढ़ में सरकारी बसें आती हैं, और महाराष्ट्र जाएं तो वे कामयाबी से चलती हुई दिखती हैं। सरकार को अपने इंतजाम को ठीक करने पर मेहनत करनी चाहिए, न कि उसकी साख को बिगडऩे देकर निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए। छत्तीसगढ़ में देश के बाकी हिस्सों की तरह निजी अस्पताल जिस तरह के कारोबार में लगे हैं, उनसे बचने का एक जरिया सरकारी अस्पताल हो सकते थे, लेकिन उनको धीरे-धीरे कमजोर होने दिया जा रहा है। 

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