स्कूलों में दूध के बाद मौतों से डरने की नहीं, जांच की जरूरत

संपादकीय
31 मई  2016
बस्तर के स्कूलों में दूध पीने के बाद दो बच्चों की मौत डराने वाली है। हम इस पर लिखते हुए यह सावधानी बरत रहे हैं कि इसे दूध पीने की वजह से हुई मौत नहीं बता रहे, क्योंकि यह बात तो सिर्फ पोस्टमार्टम या प्रयोगशाला की जांच से सामने आ सकती है। लेकिन एक अच्छा काम जो कि शुरू हुआ है, उसके खतरे सामने आ रहे हैं। और चूंकि प्रदेश में दसियों लाख बच्चे रोज दोपहर का भोजन स्कूलों में पाते हैं, इसलिए इस बारे में बहुत बड़ी सावधानी की जरूरत भी है।
लंबे समय से देश का संगठित कारोबार यह कोशिश कर रहा था कि स्कूलों का दोपहर का भोजन पकाकर न खिलाया जाए, और उसकी जगह बिस्किट खिला दिए जाएं। जब अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री थे तब उनकी बेटी ने मंत्रालय के एक बड़े अफसर से मिलकर बिस्किट निर्माता संघ की वकालत की थी, और वह बात फाईलों पर आ भी गई थी। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक एक बड़ा अभियान चलाया था, और देश के दसियों करोड़ बच्चों को बिस्किटों से बचाया था। तब से लेकर अब तक गांव-गांव तक स्कूलों में बच्चों को गर्म खाना मिलता है, और बहुत सी जगहों पर इससे जाति व्यवस्था भी टूट रही है क्योंकि खाना पकाने वाली महिला किसी जाति की होती है, और खाने वाले बच्चे सभी जातियों के होते हैं। इसके बाद दोपहर के भोजन को लेकर एक नई बहस शुरू हो रही है जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को कहा जा रहा है कि वे बच्चों की पौष्टिक जरूरतों के लिए हफ्ते में कुछ दिन उन्हें अंडा भी खिलाएं। लेकिन दूसरी तरफ कुछ शुद्धतावादी ताकतें इसके खिलाफ हैं, और मध्यप्रदेश में इसे लेकर एक राजनीतिक बहस भी चल रही है जहां भाजपा सरकार घोषित रूप से इसके खिलाफ है। छत्तीसगढ़ में अभी यह बात मुद्दा नहीं बनी है।
इस राज्य में अभी कुछ हफ्ते पहले ही स्कूली बच्चों को दूध देने के लिए राज्य के दुग्ध महासंघ के साथ शासन  ने यह कार्यक्रम शुरू किया था, और इसमें यह हादसा हो गया। यह बात सही है कि पैकेटबंद दूध में बहुत दूर के गांवों तक इतनी गर्मी में पहुंचते हुए खराब हो सकता है, लेकिन इस एक हादसे से इस योजना को खत्म नहीं करना चाहिए बल्कि इसकी जांच करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि बच्चों को दूध मिल सके, और दूध खराब होने से पहले मिल सके। हमको याद है कि आज से पचास बरस पहले इस राज्य की स्कूलों में यूनिसेफ की तरफ से आए दूध पावडर को उबालकर उससे दूध बनाकर बच्चों को पिलाया जाता था, और विटामिन की गोली भी दी जाती थी। अब शासन और दुग्ध महासंघ को यह देखना है कि क्या दूर के इलाकों में दूध की जगह दूध पावडर भेजना सेहत के फायदे का होगा और अधिक व्यावहारिक भी होगा? जो भी हो एक तरीका ऐसा निकालना चाहिए कि बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना-पीना मिल सके जिससे छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढिय़ां कुपोषण से निकलें।

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