इंसान की बेइंसाफ जुबान, जानवर से इंसान तक जारी

30 मई 2016

अभी कुछ दिन पहले बिहार की एक बच्ची की तस्वीर आई जिसमें एक जेनेटिक गड़बड़ी की वजह से उसकी आंखें बाहर निकली हुई दिखती थीं। नतीजा यह था कि उसे स्कूल के दूसरे बच्चे मेढकी कहकर इस कदर चिढ़ाते थे कि उसने स्कूल जाना बंद कर दिया। अब उसकी हसरत तो है एक डॉक्टर बनकर इस बीमारी का इलाज ढूंढने की ताकि ऐसे दूसरे बच्चे तकलीफ न पाएं, दूसरे बच्चों की यातना का शिकार न हों, लेकिन जब स्कूल में ही बच्चे उसका जाना मुश्किल कर चुके हैं, तो मेडिकल कॉलेज भला पहुंचे भी तो कैसे।
लेकिन दुनिया के देशों के सभ्य होने का यह एक सबसे बड़ा पैमाना है कि वहां पर कमजोर लोगों के साथ कैसा बर्ताव होता है। रूपए-पैसे से कमजोर, रूप-रंग से कमजोर (माने जाने वाले), देह की ताकत से कमजोर, इम्तिहान में नंबरों से कमजोर, ऐसे कई किस्म के लोगों के साथ बाकी लोगों का बर्ताव बताता है कि वह समाज कितना सभ्य है। आमतौर पर किसी देश को उसके शहरी ढांचे से, उसकी अर्थव्यवस्था से, आसमान को छूती इमारतों से विकसित मान लिया जाता है, लेकिन विकास का यह एक बहुत ही सतही और कम अहमियत वाला पैमाना है। विकास का असल पैमाना है कि वहां के लोगों में अपनी जिम्मेदारी और दूसरों के हक को लेकर कितनी जागरूकता है। भारत जैसे देश में अगर देखें तो लगभग तमाम लोगों की लगभग तमाम जागरूकता दूसरों की जिम्मेदारी और अपने हक को लेकर होती है।
भारत की जुबान जो कि हजारों बरस से चली आ रही है, ऐसी गजब की बेइंसाफी से भरी हुई है कि उसके बारे में लिखते हुए हम कभी थकते नहीं हैं। यहां की आज की खड़ी बोली कही जाने वाली हिन्दी से परे भी जो लोकभाषाएं हैं, क्षेत्रीय बोलियां हैं, यहां का जो पुराना साहित्य है, लोकोक्तियां और कहावत-मुहावरे हैं, वे सबके सब कमजोर लोगों पर हमला करने वाले हैं। सबसे पहले तो देखें कि इंसानी बिरादरी अपनी आधी आबादी, औरतों को लेकर जिस जुबान का इस्तेमाल करती है, उससे वहां पर महिलाओं की बदहाली का अंदाज लगता है।
कहने के लिए तो भारत देवियों की पूजा करने वाला देश है, लेकिन यह देवियां जब तक मिट्टी या पत्थर की प्रतिमाओं में कैद रहती हैं, तभी तक उनकी पूजा होती है, और इस कैद से बाहर निकलते ही महिलाओं को मारना शुरू हो जाता है। अब महिलाओं के बारे में अपमानजनक जुबान पहले शुरू हुई, या उनका अपमान पहले शुरू हुआ यह तो पहले मुर्गी या पहले अंडे जैसी बात है। लेकिन औरत को बदचलन कहना, उसके पति खोने को उसका जुर्म मान लेना, उसे सती होने के लायक करार देना, उसे लात-घूंसों के लायक समझना जैसी बातें भारत की जुबानों में बड़ी आम हैं। हो सकता है कि एक वक्त सामाजिक बेइंसाफी को देखते हुए यह जुबान बनी हो, लेकिन आज इस बेइंसाफी के खिलाफ कानूनी इंतजाम के बावजूद यह जुबान गई नहीं है। आज भी कदम-कदम पर महिलाओं को जींस से लेकर मोबाइल फोन तक से रोका जाता है, और अंधेरे के बाद घर के बाहर निकली महिला को अनिवार्य रूप से बदचलन, और बलात्कार का न्यौता बांटते घूमने वाली मान लिया जाता है।
लेकिन लोगों की सोच में बेइंसाफी कतरे-कतरे में नहीं आती, एकमुश्त आती है, या एकमुश्त जाती है। भारत की जुबानों की ही हमको अधिक समझ है इसलिए यहीं की बात करना ठीक है। यहां हिन्दी से परे भी कई क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में कमजोर लोगों के लिए जितनी हिकारत है, उसका सदियों का इस्तेमाल लोगों को उस हिकारत को न्यायसंगत और तर्कसंगत मनवाने लगता है। अब इंसानों के लिए ही इस्तेमाल होने वाले कुछ शब्दों को देखें, तो जिसके पैरों में दिक्कत है उसे लंगड़ू कहना, जिसके हाथ कटे हैं या नहीं हैं, उसे ठुठवा कहना, जिसके कान कमजोर हैं, उसे भैरा (बहरा) कहना, जिसकी चमड़ी पर काले-सफेद दाग हैं उसे कबरा (चितकबरा)कहना, जो अधिक गोरा है उसे भुरवा कहना, जिसकी रीढ़ की हड्डी में दिक्कत है उसे कुबड़ा कहना, जिसे देखने में दिक्कत हो उसे अंधड़ा कहना, कद कम हो तो बठवा, दुबला हो तो सुकड़ू कहना भारत में आम चलन में है, और जब तक अपने खुद के घरवाले इनमें से किसी किस्म की दिक्कत न झेल रहे हों, तब तक तकरीबन तमाम लोग धड़ल्ले से इन बातों का इस्तेमाल करते हैं।
किसी के रंग को लेकर, जिस पर कि उसका कोई बस नहीं हो सकता, उसे काली-कलूटी कहना, दांत आड़े-तिरछे हों, तो उसे खेबड़ा कहना बड़ी आम बात है। और इसके साथ-साथ लोगों की आर्थिक स्थिति को देखकर उसे फटीचर कहना, दो कौड़ी का कहना, सड़कछाप कहना भी हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा है।
लेकिन इसके साथ-साथ जिस तरह की हिकारत हमारे मन में जानवरों को लेकर है, उसके खत्म हुए बिना इंसानों के लिए हिकारत अलग से खत्म नहीं हो सकते। हिन्दी और इससे जुड़ी हुई बोलियों में हजारों ऐसी कहावतें हैं जिनमें इंसान के सबसे वफादार जानवर-साथी, कुत्ते के लिए गालियां हैं। यहां तक कि शाकाहारी इंसान भी गाली देते हुए कुत्ते का खून पीने की बात कहते हैं, दूसरों को कुत्ते की मौत मरने की दुआ देते हैं, किसी की हरकतों को बहुत ही कुत्ती कहकर गाली देते हैं, और यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। इंसान से अधिक अहसानफरामोश कोई नस्ल नहीं है क्योंकि यह सबसे अधिक मेहनत करने वाले प्राणी को गधा या बैल कहकर गाली देती है। अब मान लो गधा इंसान का लादा बोझ लेकर भाग निकलता, और किसी ट्रक ड्राइवर की तरह बाजार में बेचकर चल निकलता तो शायद इंसान गधे को मूर्ख कहना बंद करता। लेकिन जब तक गधा इंसान को धोखा नहीं दे रहा है, वह गालियों का ही हकदार है। ऐसी नाजायज सोच वाले इंसान अपनी इस सोच के चलते ही बाकी इंसानों के लिए भी नाजायज समझ विकसित कर लेते हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे आगे बढ़ाते चलते हैं।
हैरानी इस बात की है कि इंसानों या बाकी प्राणियों में भी जो वफादार हैं, और जो मेहनतकश हैं, उनको गालियों का हकदार मान लिया जाता है। इस सोच के बारे में सोचने की जरूरत है, जुबान को बेइंसाफी से परे लाने की जरूरत है, अहिंसक बनाने की जरूरत है।

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