छत्तीसगढ़ में थोक में होतीं सड़क मौतों की कुछ वजहें

संपादकीय
5 मई  2016
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में एक तेज रफ्तार मुसाफिर बस की दुर्घटना में पन्द्रह लोगों की मौत हो चुकी है और बहुत से घायलों को लाने के लिए मुख्यमंत्री ने वायुसेना का हेलीकॉप्टर वहां भेजा है, और साथ ही सीआरपीएफ के जवान भी भेजे हैं। यह तो छत्तीसगढ़ में नक्सल मोर्चे के लिए आए हुए अधिक क्षमता के ये हेलीकॉप्टर मौजूद हैं, और बाहर से आए हजारों जवान अर्धसैनिक भी, इसलिए राज्य को कई मामलों में इनकी मदद मिल रही है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी सड़क-मौतों को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है, और उसमें से सरकार क्या कर रही है?
सरगुजा के भीतरी इलाकों में निजी ट्रैवल कंपनियों की बसें किस रफ्तार से दौड़ती होंगी, इसका अंदाज लगाने के लिए वहां जाने की जरूरत नहीं है, रायपुर शहर से ही जब ये बसें सुबह या रात में रवाना होती हैं, तो उनका अंदाज फायर ब्रिगेड जैसा रहता है कि मानो ये मुसाफिर लेकर न जा रही हों, और आग बुझाने कहीं पहुंचना हो। यह कारोबार एक संगठित मनमानी से चलता है, और इन पर काबू करने वाले परिवहन और पुलिस विभागों की दिलचस्पी भी इस मनमानी को रोकने में नहीं दिखती। आए दिन बसों से होने वाली मौतों की खबरें तो आती हैं, लेकिन बाकी लोग किस तरह इनकी खूनी रफ्तार के सामने से किनारे हटकर अपने आपको बचाते हैं, उनकी कोई खबर नहीं बनती, उनका महज एहसास किया जा सकता है।
लंबे समय से छत्तीसगढ़ में यह सुनाई पड़ता है कि गाडिय़ों की बेलगाम रफ्तार को रोकने की कोशिश होगी, ओवरलोड रोकने की कोशिश होगी, बसों में जो लोग गैरकानूनी तरीके से सीटें या स्लीपर लगवा लेते हैं, उन्हें रोकने की कोशिश होगी या नशे में गाड़ी चलाते ड्राइवरों को रोकने की कोशिश होगी, लेकिन इनमें से होता कुछ नहीं है। आरटीओ का अमला ट्रांसपोर्ट के सभी तरह के कारोबार के साथ भागीदारी के अंदाज में रियायत करते दिखता है, और यही हाल ट्रैफिक या बाकी पुलिस का भी रहता है। ऐसे में हादसे के बाद मुख्यमंत्री या राज्यपाल की तरफ से शोक संदेश और मुआवजे की खबरों से गई हुई जिंदगियां नहीं लौटतीं, लेकिन हादसों के पहले ऐसी कोशिशें जरूर हो सकती हैं जिनसे कि ऐसी मौतों का खतरा घटे, और बेकसूर मुसाफिर न मारे जाएं।
हम भी ऐसे हर बड़े हादसे के बाद इस तरह की नसीहतों को लिखते-लिखते थक गए हैं। एक समय था जब अविभाजित मध्यप्रदेश में जिला स्तर तक यातायात सुधार समितियां रहती थीं, और उनमें अखबारों के लोग भी रहते थे, कारोबार और शहर के दूसरे प्रमुख लोग भी रहते थे। छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से वैसी कमेटियां खत्म हो गई हैं। सरकार को चाहिए कि इनके बारे में भी सोचे कि क्या सरकार से बाहर के कुछ लोगों को सलाहकार समितियों में रखने से सरकार को योजनाएं सुधारने में कोई फायदा मिलेगा? जनता के प्रतिनिधियों की भागीदारी योजनाओं और नीतियों में रहनी चाहिए, और हम सिर्फ विधायकों और सांसदों को जनता के प्रतिनिधि नहीं मानते, जिन लोगों को राजनीति और सत्ता से सीधा कुछ लेना-देना नहीं रहता, उन लोगों को भी सरकार से जोडऩा चाहिए। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय यातायात सुधार समितियों का बहुत फायदा हमने देखा हुआ है, और राज्य सरकार वह भागीदारी फिर शुरू कर सकती है।
फिलहाल सरकारी अमले को कड़ाई से सड़क सुरक्षा के नियम लागू करने चाहिए, और जब सरकारी अनदेखी से सड़कों पर खूनी रफ्तार और ओवरलोड के ऐसे हादसे होते हैं, तो आम जनता को यह नाराजगी भी रहती है कि उसे तो हेलमेट न रहने पर सैकड़ों रूपए का जुर्माना सुनाया जाता है, लेकिन ट्रांसपोर्ट का जो संगठित कारोबार धड़ल्ले से कानून तोड़ता है, उसके साथ सरकारी अमले की गहरी दोस्ती रहती है। प्रदेश में सड़कों पर मौतें तभी घटेंगी जब ऐसी भागीदारी और ऐसी दोस्ती खत्म होगी। 

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