जख्मी युवती के कपड़े खुलवाते साक्षी महाराज की जगह जेल है

संपादकीय
6 मई  2016
उत्तरप्रदेश के मैनपुरी से एक भयानक वीडियो सामने आया है जिसमें भाजपा के एक सबसे साम्प्रदायिक और हिंसक सांसद साक्षी महाराज एक युवती की चोटें देखने के लिए उसकी जींस खुलवाते बैठे दिखते हैं, और आसपास बहुत सी महिलाओं के साथ-साथ बहुत से आदमी भी खड़े होकर देख रहे हैं। साक्षी महाराज नाम का यह भगवाधारी उस लड़की के कपड़े खुलने को टकटकी लगाकर देखते हुए बैठा है।
भारत में यह एक भयानक नौबत है कि धर्म का चोगा पहने हुए लोग कुछ भी करने की आजादी पा रहे हैं। हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के नेता तरह-तरह के फतवे जारी कर रहे हैं, और उनमें से बहुत से हमलों का शिकार लड़कियां और महिलाएं हैं। धर्मों के साथ-साथ जाति पंचायतें भी जुट गई हैं, और रही-सही कसर पूरी करने को बहुत से राजनीतिक दलों के नेता भी महिलाओं पर जुबानी हमलों में अपना योगदान लगातार देते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जिस उत्तरप्रदेश में यह ताजा घटना वीडियो की वजह से सबके सामने आई है, वहां पर महिला आयोग क्या कर रहा है, मानवाधिकार आयोग क्या कर रहा है, और इन्हीं दोनों आयोगों के राष्ट्रीय स्तर के संगठन क्या कर रहे हैं? हमारे हिसाब से तो उत्तरप्रदेश के हाईकोर्ट को तुरंत ही इस वीडियो पर साक्षी महाराज समेत बाकी तमाम लोगों को भी नोटिस जारी करना था, और अदालत के कटघरे में खींचना था। अगर इस देश में न्यायपालिका संवेदनशील होती, तो सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह के अनगिनत हमलों पर आए दिन नोटिस जारी करता, ऐसे कुछ नेताओं को जेल भेजता, और बकवास का ऐसा सिलसिला थम पाता। लेकिन आज नौबत यह है कि एक पार्टी के हिंसक-बकवासी नेताओं के मुकाबले जब दूसरी पार्टियों के इन्हीं जैसे मानसिक-डीएनएधारी लोग बकवास करते हैं, तो दोनों पार्टियों के पास एक-दूसरे की सहूलियत भरी मिसालें रहती हैं।
और ऐसे हमलों में औरत और मर्द में भी कोई फर्क नहीं है। हम पहले भी एक घटना को कई बार गिना चुके हैं कि किस तरह बंगाल की मुख्यमंत्री बनते ही ममता बैनर्जी के सामने जब कोलकाता के एक चर्चित बलात्कार का मामला आया, तो पल भर में उन्होंने उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश करार दे दिया था। यह एक और बात है कि कुछ महीनों के भीतर ही उन्हीं की मातहत पुलिस ने उनकी बकवास पर गौर किए बिना बलात्कार को पकड़कर अदालत में पेश कर दिया, और शायद उसे सजा भी हो गई है। कई राजनीतिक दलों की महिलाएं देश की लड़कियों और महिलाओं को बलात्कार से बचने के लिए ऐसी नसीहतें देते दिखती हैं जिनसे महिलाओं के हक कुचलने के अलावा और कुछ नहीं होता।
इस देश में संवैधानिक संस्थाएं उन पर लोगों को मनोनीत करने वाली पार्टियों की सरकारों के लिए असुविधा रोकने की मशीन बनकर रह गई हैं। ऐसे में अदालत को ही लगातार दखल देकर महिलाओं के खिलाफ, कमजोर तबकों के खिलाफ ऐसी जुबानी हिंसा, और ऐसे हिंसक प्रदर्शन पर कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि यह सिलसिला बढ़ते ही जा रहा है। देश की न्यायपालिका के सामने यह जिम्मेदारी है कि जब कार्यपालिका और विधायिका कमजोर तबकों के हक की गारंटी से बचें, तो अदालत को दखल देना ही चाहिए। एक हिंसक और साम्प्रदायिक फसादी सांसद जब भगवा कपड़ों से लदा हुआ एक युवती के कपड़े खुलवा रहा है, और वहां खड़े बाकी मर्दों की टोली के साथ-साथ खुद भी टकटकी लगाकर उस युवती का बन देख रहा है, तो उसकी जगह जेल के अलावा और कुछ नहीं होनी चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें