देश भर में सारे चुनाव एक साथ होने से गैरजरूरी टकराव घटेगा

संपादकीय
7 मई  2016
कुछ समय पहले केन्द्र सरकार के स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से यह राय सामने आई कि देश में एक बार फिर सारे चुनाव एक साथ करवाना शुरू होना चाहिए, ताकि लोकसभा, विधानसभाओं, और स्थानीय संस्थाओं के कोई न कोई चुनाव पूरे वक्त चलते ही न रहें। नतीजा यह होता है कि सरकारों में बैठे हुए केन्द्र और राज्य के नेता न सिर्फ चुनावी नफे-नुकसान वाली बयानबाजी करते हैं, बल्कि उनके सरकारी फैसले भी किसी न किसी चुनाव को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं, और नुकसान देश-प्रदेश की जनता का होता है। कई बार गैरजरूरी मुद्दे ठीक चुनाव को ध्यान में रखकर उठाए जाते हैं, और महीनों तक कोई पार्टियां, या कोई नेता, या केन्द्र या राज्य दंगल के अंदाज में एक-दूसरे से उलझे दिखते हैं।
अब सूखे और भूखे बुंदेलखंड में केन्द्र सरकार की भेजी हुई टैंकरों वाली रेलगाड़ी क्या पहुंच गई, उसे लेकर भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार, और समाजवादी पार्टी की उत्तरप्रदेश सरकार के बीच बयानों की तलवारें खिंच गईं। भारत का संघीय ढांचा इस तरह का नहीं है कि केन्द्र और राज्य स्थाई रूप से टकराव में बने रहें, और काम चलता रहे। ऐसे टकराव का नतीजा आमतौर पर राज्य के नुकसान का होता है, क्योंकि राज्य से केन्द्र को जाने वाले टैक्स तो रूकते नहीं, केन्द्र से राज्य को आने वाले आबंटन, अनुदान, और सहायता, इन सबमें फर्क पड़ सकता है। यही वह मोर्चा होता है जिसमें केन्द्र सरकार कई बार राज्यों के साथ भेदभाव बरतती है, या बरत सकती है। इसलिए राजनीति से परे रहते हुए राज्यों को केन्द्र के साथ उलझना नहीं चाहिए। इसकी एक मिसाल हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं जहां भाजपा की रमन सरकार ने केन्द्र में यूपीए की दो पारियों के दस बरसों में उससे एक भी टकराव मोल नहीं लिया, और नतीजा यह निकला कि राज्य के कोई भी काम केन्द्र में नहीं रूके, और ऐसी कोई तिमाही या छमाही नहीं गुजरी कि छत्तीसगढ़ को केन्द्र सरकार का कोई पुरस्कार न मिला हो। और तो और देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा जिस नक्सल हिंसा को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बताया था, उस मोर्चे पर भी छत्तीसगढ़ और केन्द्र के बीच कोई भी टकराव नहीं हुआ, कोई मतभेद नहीं हुआ, और जब इस राज्य में केन्द्र के अर्धसैनिक बड़ी संख्या में मारे गए, तब भी एक-दूसरे पर कोई तोहमतें नहीं लगाई गईं, और कई गृहमंत्री आए-गए, तालमेल ठीक बने रहा।
हमारा यह मानना है कि देश में अगर चुनाव एक साथ हो सकते हैं, तो उससे बहुत किस्म की सार्वजनिक-राजनीतिक कड़वाहट खत्म हो सकती है। कुछ महीनों के भीतर सारे चुनाव निपट जाएं, नेता और पार्टियां अपने दिल-दिमाग की सारी गंदगी को इन महीनों में देश-प्रदेश में खर्च कर लें, और उसके बाद सब नहा-धोकर देश को चलाने में लग जाएं। आज केन्द्र में कोई भी पार्टी रहे, राज्यों के आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए कई किस्म के मामले उठते हैं, कई किस्म की घोषणाएं की जाती हैं। और तो और मीडिया के चुनिंदा हिस्सों में किस तरह की खबरें गढ़ी जाएं, कब कौन से इंटरव्यू लिए जाएं, और दिखाए या छापे जाएं, ऐसे कई राजनीतिक फैसले देश पर हावी रहते हैं। इससे परे एक बड़ा मुद्दा चुनावी खर्च का भी है, और सरकारी मशीनरी से लेकर सत्ता पर काबिज नेताओं की उत्पादकता और उनके समय का भी है। सरकारों के बहुत से फैसले अफसरों और नेताओं की चुनावी व्यस्तता के चलते लेट होते हैं, और इन सबको साथ-साथ चुनाव होने से सुधारा जा सकता है। देश में लुभावनी चुनावी घोषणाओं के लिए चुनाव का दबाव रहता है और कई तरह की अनुत्पादक योजनाएं सामने रखी जाती हैं। इन सबसे बचने का एक अच्छा तरीका पांच बरस में एक बार सारे चुनाव एक साथ करवाने का हो सकता है। और इसका साल और महीना तय करने के लिए संसद, चुनाव आयोग, और राजनीतिक दल मिलकर एक लॉटरी से भी वक्त तय कर सकते हैं क्योंकि चुनाव का कोई भी वक्त कुछ न कुछ सरकारों का कार्यकाल काटकर छोटा करेगा ही। लेकिन एक साथ चुनाव देश के हित में हैं, और उस पर आम सहमति बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

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