बददिमाग सत्ता करती है सड़कों पर हत्या-बलात्कार

संपादकीय
8 मई  2016
बिहार में एक विधायक के बेटे ने कार ओवरटेक करना एक दूसरी कार वाले नौजवान को भारी पड़ गया। विधायक-पुत्र ने उसे गोली मारी, और फरार हो गया। नाराज जनता सड़कों पर है, विपक्ष ने मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगा है, और सरकार कार्रवाई का भरोसा दिला रही है। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है बिहार की सत्ता में भागीदार दूसरी पार्टी के फरार विधायक को एक बलात्कार-केस में गिरफ्तार किया गया है। वैसे बिहार इतना बड़ा राज्य है और वहां पर पहले जुर्म का इतना बोलबाला रहता था कि ऐसी गिनी-चुनी घटनाओं को प्रदेश के राजकाज का हाल मानना ठीक नहीं है, लेकिन हत्या से नीचे भी सत्ता की बददिमागी के कई अलग-अलग दर्जे होते हैं, और वैसे तमाम मामले खबरों में नहीं आ पाते क्योंकि जुर्म में नहीं गिनाते।
हम अपने आसपास छत्तीसगढ़ में भी यह देखते हैं कि न सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी, बल्कि विपक्षी दल भी, और उनसे जुड़े हुए कारोबारी-ठेकेदार भी जिस अंदाज में गाडिय़ों में सायरन लगाकर चलते हैं, नंबर प्लेट की जगह सच्चा या झूठा ओहदा लिखाकर चलते हैं, और जिस बददिमागी से सड़कों पर बर्ताव करते हैं, उससे लगता है कि लोकतंत्र में सभ्यता और परिपक्वता आने के बजाय बददिमागी अधिक आती जा रही है। और यह बात न तो नई है, और न ही किसी एक पार्टी तक सीमित है। कदम-कदम पर लोगों को ताकत के प्रदर्शन का शिकार होना पड़ता है, और लोग सत्ता में आते ही विनम्रता खोकर अपने ही इलाके में लोगों को कुचलते हुए चलने लगते हैं। दरअसल यह सिलसिला खत्म इसलिए नहीं हो सकता कि भारत में ऊंची अदालतों के जज भी पुलिस की पायलट गाड़ी के साथ चलते हुए सायरन और बत्तियों से सड़कों को कुचलते हुए, आम जनता को किनारे फेंकते हुए, जनता के पैसों को बर्बाद करते हुए दिखते हैं, और यह सिलसिला कार्यपालिका में बैठे मंत्री-अफसरों से लेकर विधायिका के सांसदों और विधायकों तक जारी रहता है। और तो और अब सामाजिक और धार्मिक संगठनों के लोग भी इसी अंदाज में अपनी बददिमागी की तख्तियां लगाए और सायरन बजाते दिखते हैं।
लोकतंत्र में जनता के आम अधिकार सबसे ऊपर होने चाहिए, लेकिन भारत में लोगों के बुनियादी नागरिक अधिकार उसी वक्त सांस लेने की इजाजत पाते हैं जब ताकतवर तबकों के लोगों की जरूरतें पूरी हो जाती हैं। हमारा यह मानना है कि नागरिक अधिकारों के हिमायती कुछ लोगों को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाकर यह पूछना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को गाडिय़ों पर बत्तियों की जरूरत क्या है, या अपने गाडिय़ों के साथ सायरन बजाती पुलिस की गाडिय़ों की जरूरत क्या है? क्या वे लोग आग बुझाने के अंदाज में कहीं जाकर फैसला सुनाने वाले हैं? या उनका वक्त किसी खोमचे वाले के वक्त से अधिक कीमती कैसे है? और सड़कों की बददिमागी तो सत्ता की ताकत से परे अब पैसों की ताकत पर इस तरह आ गई है कि आए दिन किसी न किसी प्रदेश से खबर आती है कि ताकतवर लोगों ने कैसे दूसरे लोगों को कुचलकर मार डाला, रईसों के नाबालिग बच्चों ने कितनों को कुचला, और किस तरह मारपीट कर या गोली मारकर हत्या की गई। इसकी एक वजह यह भी है कि जो मामले जुर्म के दर्जे में आते हैं, उनमें भी सजा की गुंजाइश न के बराबर रहती है, और कभी सजा हो भी गई तो वह इतनी दूर होती है कि सलमान खान जमानत पर रहते हुए भी ओलंपिक का ब्रांड एम्बेसडर बन सकता है, या इस तरह की दूसरी इज्जत पा सकता है, या प्रधानमंत्री से उनके घर-दफ्तर जाकर मिलकर सरकार से अपनी फोटो जारी करवा सकता है। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए और एक सभ्य लोकतंत्र की तरह जनता के आम अधिकार सबसे ऊपर माने जाने चाहिए। किसी देश का विकास सड़कों और पुलों से नहीं होता, उस देश में कमजोर तबके और आम लोगों के अधिकारों के सम्मान से होता है। 

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