फोन से शादी, वहां समारोह के साथ हुई, यहां बिना जश्न

संपादकीय
30 जून  2016
अमरीका से एक बड़ी बढिय़ा खबर आई है कि एक आदमी ने अपने स्मार्टफोन से समारोहपूर्वक औपचारिक शादी कर ली। उसने शादी के कपड़े पहने, समारोह हुआ, और चर्च में पादरी ने रस्में पूरी कीं। पादरी ने इस आदमी से शादी की रस्म के तहत पूछा कि एरोन क्या तुम इस स्मार्टफोन को कानूनी तरीके से पत्नी मानते हो और क्या तुम उसे प्यार करने, उसका सम्मान करने, उसे आराम से रखने के साथ उसके प्रति निष्ठावान रहोगे? उसने कहा, हां, मैं ऐसा करूंगा। इस पर इस दूल्हे के बारे में कहा गया कि कलाकार और निर्देशक चेर्वेनाक ने अपने स्मार्टफोन से प्रतीकात्मक ढंग से शादी का भाव प्रदर्शित कर समाज को एक संदेश दिया है कि लोग अपने फोन से इतना अधिक जुड़े हुए हैं कि वे हमेशा उसके साथ रहते हैं और यह शादी जैसा लगता है।
यह अमरीका की बात नहीं है, भारत और चीन जैसे देशों में भी लोग अपने फोन से इस तरह जुड़े रहते हैं कि मानो वह जन्म से उनके बदन का कोई हिस्सा ही हो। अगर सैर-सपाटे के लिए कहीं जाने पर भी फोन काम न करे, उस पर घंटी न बजे, उस पर संदेश न आए-जाएं, तो लोग डिप्रेशन में आ जाते हैं। उनकी काम करने की क्षमता घट जाती है, उनकी बेचैनी बढ़ जाती है, और उनका बर्ताव अस्वाभाविक हो जाता है। पिछली चौथाई सदी में दुनिया ने मोबाइल फोन का इंसानी-मानसिकता पर जो असर देखा है, वैसा किसी और टेक्नालॉजी का पिछली दस सदियों में भी नहीं हुआ होगा। और अब फोन जैसे-जैसे अधिक स्मार्ट होते जा रहे हैं, अधिक बड़े या अधिक तेज होते जा रहे हैं, वे इंसानों की और अधिक गुलाम बनाते चल रहे हैं। बेडिय़ां और हथकडिय़ां बढ़ती जा रही हैं, और चारों तरफ जंगले भी खड़े होते जा रहे हैं।
आज हालत यह है कि हिन्दुस्तान में भी यह लतीफा चलता है कि अगर घर में सारे लोगों को एक जगह इक_ा करना हो तो घर का वाईफाई बंद कर दिया जाए, सारे लोग अपने फोन या लैपटॉप लिए हुए एक जगह आ जाएंगे। फोन में बिना वाईफाई भी सहूलियत है, इसलिए सफर और सैर के दौरान भी परिवार के लोग एक साथ मजा लेने के बजाय अपने-अपने फोन पर जुटे रहते हैं, और कुछ लोगों का यह मानना है कि अगर फोन बंद हो जाएं, तो शायद घर के लोगों को भी अब यह समझ नहीं पड़ेगा कि एक-दूसरे से क्या बातें करें, क्योंकि बातचीत कम होती गई है, और परिवार के लोग भी आपस में एक-दूसरे को फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर पसंद और नापसंद करने लगे हैं, देखने लगे हैं।
कई बरस पहले से जापान के बारे में यह बात आती थी कि लोग टेक्नालॉजी के ऐसे गुलाम हो गए हैं, और टेक्नालॉजी पर ऐसे टिक भी गए हैं कि उन्हें दूसरे इंसानों की जरूरत अब नहीं पड़ती, और वहां विवाह नाम की संस्था दम तोड़ती जा रही है, और लोग घरों से निकले बिना महीनों तक ऑनलाईन जिंदगी जीते रहते हैं, मशीनी चिडिय़ा पाल लेते हैं, मशीनी कुत्ता पाल लेते हैं, और उनके लिए समाज की शक्ल में सिर्फ सोशल मीडिया पर उनके दोस्त बच जाते हैं, जिनमें से अधिकतर से वे कभी मिले भी नहीं रहते।
अभी अमरीका में जिस नौजवान ने अपनी फोन से ऐसी शादी की है, उसने दुनिया भर के फोन-गुलामों के खतरों की तरफ ध्यान खींचा है कि किस तरह लोग अपनी असल जिंदगी से कटकर अपने उपकरणों से ही शादी के बंधन में बंध बैठे हैं। लोग पहले कहते थे कि फलां लड़का या लड़की, आदमी या औरत, अपनी नौकरी से शादी कर बैठे हैं, और उससे परे उनकी जिंदगी बहुत कम रह गई है। अब तो नौकरी भी सौतिया डाह से दम तोड़ सकती है, क्योंकि लोग आमतौर पर अपने फोन से शादी कर बैठे हैं। अमरीका में इसका खुला समारोह हुआ है, लेकिन भारत जैसे बहुत से देशों में लोग बिना समारोह भी ऐसी जिंदगी में दाखिल हो चुके हैं। आज हाल यह है कि बहुत से लोग बीवी के बिना तो जीने तैयार हो जाएंगे, फोन के बिना वे नहीं जी सकते।
समाजविज्ञान और इंसानी-मानसिकता के विशेषज्ञों को लोगों की इस बदली हुई सोच पर सोचने का मौका भी नहीं मिल रहा है, क्योंकि किसी तरह की रिसर्च में वक्त लगता है, और तब तक इंसान इस कुएं में और गहरे कैदी हो चुके रहते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का मकसद यह है कि फोन के नए मॉडल तो हर कुछ महीने में मिलते रहेंगे, परिवार के लोग एक बार छूट गए, तो फिर जुड़ नहीं पाएंगे। इसलिए लोगों को टेक्नॉलॉजी से परे, फोन जैसे उपकरणों से परे, अपनी असल जिंदगी के इंसानी-दायरे के बारे में भी सोचना चाहिए। 

बारिश में डूबने से पहले

संपादकीय
29 जून  2016
बारिश होते ही जगह-जगह से पानी भरने की खबरें आने लगी हैं, और यह तब है जब मानसून पूरी तरह प्रदेश में सक्रिय नहीं हुआ है। राजधानी रायपुर समेत अन्य नगरों में कमोबेश यही हाल हर साल देखने-सुनने को मिलता रहा है। शहरों में पानी भरने की न तो एक वजह है, और न ही उसका कोई आसान रास्ता है।  इस मुद्दे पर थोड़ी सी ठोस बात अगर करें, तो एक तो शहरीकरण से खड़ी हुई कुदरती दिक्कतें, और फिर शहरी जीवनशैली से खड़ी हुई दिक्कतें, ये दोनों मिलकर नीम पर चढ़े हुए करेले की तरह नौबत ला रही हैं।  भारत के अधिकतर शहरों में बिना योजना के इमारतें और आबादी बढ़ती चली गई हैं, और इनके बोझ को ढोने की क्षमता विकसित नहीं हुई है।
जहां-जहां शहरीकरण हो रहा है, वहां-वहां पानी को सोखने लायक खुली जमीन तेजी से खत्म हो रही है, और कांक्रीट के ढांचे बारिश के पानी को सिर्फ इक_ा कर पाते हैं, निकाल नहीं पाते। फिर जैसा कि मुंबई के मामले में सामने आया था, वहां पर सारी भूमिगत नालियां प्लास्टिक के कचरे से पूरी तरह बंद थीं, और पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। देश भर में जगह-जगह शहरीकरण से जो कचरा इक_ा हो रहा है, उसकी रफ्तार बढ़ती चल रही है, दूसरी तरफ पानी के निकलने के जो पुराने नाले-नालियां हैं, वे कचरे से बंद होते चल रहे हैं। शहरीकरण में जो नए इलाके विकसित हो रहे हैं, ताकतवर और संपन्न तबका वहीं बस रहा है, और वहां पर तो पानी आने-जाने के रास्ते ठीक है, लेकिन पुराने इलाके हर शहरों में डूब रहे हैं, बारिश के पानी भी डूब रहे हैं, और ताजा कचरे में भी डूब रहे हैं।
अब यहां पर यह भी सोचने की जरूरत है कि लोग कितना कचरा इक_ा करते हैं, उसे कैसे फेंकते हैं, और उसके निपटारे का स्थानीय म्युनिसिपल के पास क्या तरीका है? यहां पर तस्वीर बड़ी निराशाजनक है, क्योंकि बढ़ती आबादी, बढ़ती संपन्नता, और बढ़ते कचरे की रफ्तार से निपटारे की पुरानी रफ्तार का कोई मेल नहीं बैठता। दूसरी बात यह कि मौसम अब अधिक दगाबाज हो गया है। बारिश के ही नहीं, गर्मी और सर्दी के मौसम भी अपनी तेज मार के नए रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं। मौसम का जो सर्वाधिक रिकॉर्ड रहते आया था, वह अब बदल भी रहा है, और अब जरा सी देर में बहुत तेज बारिश होकर किसी भी शहर को डुबा देती है। इस मौसम में कोई बदलाव लाना पूरी दुनिया के सामूहिक सहयोग से हो सकता है, लेकिन वह किसी शहर के बस की बात नहीं है। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि शहरीकरण की योजनाएं मौसम की अभूतपूर्व बुरी मार का अंदाज लगाकर ही बनाई जाएं, न कि पुराने रिकॉर्ड देखकर। मौसम ने इंसानों से कोई रिश्वत नहीं खाई हुई है कि वह उस पर हमेशा मेहरबान रहे, और खासकर जब इंसान कुदरत पर कूद-कूदकर लात मारते हों, तो कुदरत की क्या बेबसी है कि वह इंसान पर मेहरबान रहे?
शहरीकरण की तेज रफ्तार और उसका विकराल आकार स्थानीय म्युनिसिपल की सोच और उसकी कूबत दोनों से परे की बात हो चुके हैं। अब शहरी कचरे के तेज रफ्तार निपटारे के साथ-साथ, शहरों से पानी की तेज रफ्तार निकासी का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, देश के शहर कभी भी डूब जाएंगे, और अगली बारिश आने तक भी लोगों के निजी नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। देश की सरकार, राज्यों की सरकारें, और शहरों की म्युनिसिपालिटी टुकड़े-टुकड़े में सोच रही हैं, और टुकड़े-टुकड़े में योजनाएं बना रही हैं। कुदरत की मार से निपटने के लिए इस तरह के काम से काम नहीं चलेगा। लोगों को यह भी याद रखना पड़ेगा कि अब महज हर बरस की बाढ़ वाले इलाकों में ही बाढ़ नहीं आती, अब तो नए-नए किसी भी इलाके में कितनी भी बाढ़ आ जाती है, और हर किसी को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना पड़ेगा, और इसकी बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है।

शब्दों के बीच का अनबोला, अनकहा, और अनपूछा...

संपादकीय
28 जून  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल एक अंगे्रजी समाचार चैनल टाईम्स नाऊ के मुखिया अर्नब गोस्वामी को एक इंटरव्यू दिया, तो उसमें उन्होंने जितनी बातें कहीं, उन पर तो कल रात से ही चर्चा शुरू हो गई, लेकिन दो और बातों पर जमकर चर्चा चल रही है कि कल कही बातों के पहले इतने वक्त से मोदी बहुत से जलते-सुलगते मुद्दों पर क्यों नहीं बोल रहे थे, और चुप क्यों थे? और दूसरी चर्चा यह शुरू हुई कि इंटरव्यू ले रहे बड़बोले और हमलावर तेवर वाले अर्नब गोस्वामी ने बहुत से सहज सूझते सवाल क्यों नहीं किए? कुछ बड़े अखबारनवीसों ने ऐसे संभावित सवालों की पूरी लिस्ट लिख डाली है जो कि कोई मामूली समझ वाला पत्रकार भी पूछ लेता, और जो कि इस नामी-गिरामी आत्ममुग्ध टीवी पत्रकार ने नहीं पूछे।
जो सवाल इस इंटरव्यू के खत्म होने के बाद उठ रहे हैं, वे उठना जायज हैं क्योंकि जब इतने बड़े ओहदे पर बैठा हुआ कोई नेता दर्जनों मुद्दों पर बोलता है, तो देश और दुनिया सुनते हैं। फिर जब कोई आमतौर पर हमलावर रहने वाला और आत्मप्रशंसक पत्रकार इस मुनादी के साथ इंटरव्यू शुरू करता है कि यह भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का किसी भी भारतीय चैनल को दिया हुआ पहला इंटरव्यू है, तो फिर लोगों की उम्मीदें इस महत्व के मुताबिक जागती हैं, और देखने-सुनने वाले लोग यह भांप लेते हैं कि कौन-कौन से बहुत ही स्वाभाविक रूप से उठने वाले सवाल नहीं पूछे गए।
दरअसल सवाल हों, या कि जवाब, इंटरव्यू हो, या कि कोई भाषण, चौकन्नी दुनिया में ये सब दर्ज होते जाता है कि बोलने की किस-किस मौके पर चुप रहा गया, और किस-किस मौके पर चुप रहकर दूसरे को बोलने का मौका देने के बजाय, खुद इंटरव्यू लेने वाला बोलते रह गया। अर्नब गोस्वामी इस बात के लिए भारी बदनाम हैं कि वे अपने कार्यक्रम में आमंत्रित लोगों को कुछ भी नहीं बोलने देते, और पूरे वक्त खुद ही बोलते चलते हैं। उनके इस मिजाज को लेकर अनगिनत लतीफे चलते हैं, और लोग लगातार उनके खिलाफ टीवी पर भी बोलते हैं। लेकिन जैसा कि किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में होता है, बदनाम होने से नाम तो होता ही है, ऐसा ही टीवी के लोगों को लेकर विवाद छिडऩे से भी होता है। अब मोदी का यह इंटरव्यू अगर ऐसे विवाद के बिना रहता, तो वह कल शाम ही आया-गया हो जाता। यह विवाद छिडऩे से ही अब वह कई दिनों तक खबरों में बने रहेगा। नेताओं या दूसरे महत्वपूर्ण लोगों की तो यह जिम्मेदारी नहीं होती कि वे खुद अपने लिए असुविधा की बातें करें, लेकिन उनसे इंटरव्यू लेने वालों की यह जिम्मेदारी जरूर होती है कि वे असुविधा की बातों से परहेज न करें, और उन लोगों को सस्ते में न छोड़ें जिनको बहुत से मुद्दों पर अपनी बात बोलने का मौका दिया जा रहा है। शब्दों के बीच का अनबोला, अनकहा, और अनपूछा भी बड़ी बारीकी से दर्ज होता है, और मीडिया के लोगों को यह याद रखना चाहिए। 

बुरा वक्त भला बना देता है

27 जून 2016

वक्त बहुत से लोगों को बदल देता है। इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि हालात से खयालात बदलते हैं। अब सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को ही लें, तो अभी उन्होंने भाजपा के नए-ताजे राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी के एक बयान को लेकर एकदम बागी तेवरों के साथ समाजवादी बात की है।
खबरों के मुताबिक-रॉबर्ट वाड्रा ने भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पर पलटवार करते हुए उन्हें ध्यान खींचने वाला और वर्गवादी करार दिया है। वाड्रा ने यह टिप्पणी स्वामी के उस बयान के बाद की है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री को सलाह देते हुए भारतीय मंत्रियों के विदेश प्रवास पर पोशाक-शैली तय करने को कहा था। उन्होंने कहा था, जो मंत्री कोट और टाई पहनते हैं वे वेटर जैसे दिखते हैं। विदेश यात्रा के दौरान मंत्रियों को पारंपरिक और आधुनिक भारतीय परिधान पहनने चाहिए।
फेसबुक पोस्ट पर वाड्रा ने लिखा, तो क्या वेटरों की कोई इज्जत नहीं होती। उन्होंने लिखा, ध्यान आकर्षित करने के लिए किया गया स्वामी का यह बयान वेटरों का अपमान करता है, जो जीने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। वेटरों के लिए यह बयान अपमानजनक और दुखद हैं।
अब अधिक अरसा नहीं हुआ है जब सोनिया गांधी की पार्टी का देश पर राज था, और बड़े संदिग्ध किस्म के जमीनी कारोबार को लेकर रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मीडिया में बहुत सी बातें सामने आई थीं, और उन पर बौखलाकर वाड्रा ने फेसबुक पर भारतीय लोकतंत्र के आम लोगों के लिए मैंगो पीपुल ऑफ बनाना रिपब्लिक कहा था। जिस देश में लोकतंत्र नाम और ढकोसले का ही लोकतंत्र होता है, और हकीकत में वह नहीं होता, वैसे लोकतंत्र को बनाना-रिपब्लिक कहा जाता है, और भारतीय लोकतंत्र में सबसे अधिक महत्व की रियायतें पाने वाले अकेले नागरिक रॉबर्ट वाड्रा ने इसी लोकतंत्र पर थूकते हुए यहां के आम लोगों को मैंगो-पीपुल कहकर उनका मजाक उड़ाया था। ऑलीशान जिंदगी की नुमाइश करते हुए जीने वाले रॉबर्ट वाड्रा की सोच अब स्वामी को जवाब देते हुए एकदम क्रांतिकारी हो गई दिखती है। उन्हें एकाएक इन्हीं हिन्दुस्तानी मैंगो-पीपुल के बीच के मेहनत करने वाले वेटरों की इज्जत का भी ख्याल हो आया।
जो लोग सोशल मीडिया पर सुब्रमण्यम स्वामी को लगातार देखते हैं वे जानते हैं कि स्वामी शायद किसी अदालती कार्रवाई से बचते हुए अपने हमले जारी रखने के लिए सोनिया गांधी का नाम लिए बिना उनके लिए लगातार ताड़का (राक्षसी) और राहुल के लिए लगातार बुद्धू शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। वे कई सुबूतों को लेकर जयललिता से लेकर नेशनल हेराल्ड के केस तक अदालतों में अपने विरोधियों की फजीहत भी कर चुके हैं, और अपने घर की दीवार पर उन्होंने ताजा ट्रॉफी आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन की लगा रखी है। लेकिन वे सोनिया परिवार के विदेशी कारोबार, विदेशी सौदों, विदेशी रिश्तेदारों और विदेश भाग जाने की अटकलों वाली ट्वीट करते ही रहते हैं। हो सकता है कि बैठे-ठाले रॉबर्ट वाड्रा को स्वामी की ऐसी ही बातों की वजह से वेटरों के लिए हमदर्दी उमड़ी, और उन्होंने स्वामी के बयान को वर्गवादी कहते हुए मेहनत के पेशे के सम्मान की वकालत की।
अगर स्वामी और सोनिया परिवार के बीच की निजी कड़वाहट को छोड़ दें, तो देश में मेहनत के पेशों को आज भी उसी हिकारत से देखा जाता है जिस हिकारत से मनुवादी जाति व्यवस्था में मेहनत करने वालों को शूद्र का दर्जा देकर समाज व्यवस्था में पांव के तलुओं तले रखा गया था। आज भी संपन्न, शहरी, शिक्षित, और सवर्ण तबकों की बातचीत में पैदल चलने वालों को सड़कछाप, आम जुबान बोलने वालों को फुटपाथी, झगडऩे वालों को नल पर झगडऩे वालों जैसा कहा जाता है, मानो कि महंगे क्लबों में दारू पीने के बाद कोई झगड़े ही नहीं होते। जब लोग एक-दूसरे के अपमान पर उतारू होते हैं, तो एक-दूसरे को फल्ली वाले जैसी जुबान वाला कहते हैं, गरीब होने पर उसे दो टके का कहते हैं, भले ही वह बिकाऊ न हो। हजारों बरस से चली आ रही सोच और सैकड़ों बरस से चली आ रही कहावतों को देखें, तो उनमें सामाजिक बेइंसाफी ठूंस-ठूंसकर भरी हुई दिखती है। गरीबी एक जुर्म दिखता है, जाति को नीचता से या महानता से जोड़ा हुआ दिखता है, औरत महज अपमान का सामान दिखती है, सारे के सारे पशु-पक्षी और मछलियों से लेकर कीट-पतंगों तक को गाली का सामान मान लिया जाता है। शारीरिक तकलीफों वाले तमाम लोगों को गालियों की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और लोगों को बद्दुआ देने के लिए उनका इस्तेमाल होता है।
लोग किसी के रूप-रंग को, बीमारी को, विकलांगता को, या कि जुबान की लडख़ड़ाहट तब तक गालियों की शक्ल में इस्तेमाल करते हैं, जब तक कि उनके खुद के परिवार में ऐसा कोई न आ जाए। जब घर पर इनमें से किसी किस्म का कोई हो, तभी जाकर इंसानों को अपनी जुबान सम्हालने की समझ आती है। और फिर गरीबी का मखौल, कमजोरी का मखौल, बुरे दिनों का मजाक उड़ाना यह सब तब तक जारी रहता है जब तक कि लोग खुद बुरे वक्त के अंधड़ में घिर नहीं जाते।
ऐसी ही सोच के तहत आम लोगों का मखौल उड़ाते हुए रॉबर्ट वाड्रा उन्हें मैंगो-पीपुल कहते हैं, और सुब्रमण्यम स्वामी वेटरों की पोशाक को अपमान मानकर चलते हैं। इस देश को अपने तंगनजरिए से निकलना होगा, और अपनी जुबान को, अपनी सोच को तंगदिली से बाहर लाना होगा।

स्वामी, जेठमलानी, अमर सिंह जैसे लोग संगठन लायक नहीं

संपादकीय
27 जून  2016
भाजपा के राज्यसभा में अभी-अभी गए सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जिस अंदाज में सरकार के एक-एक ओहदे को छांटकर उस पर सार्वजनिक निशानेबाजी चला रखी है, वह भाजपा के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी की नौबत भी है, और हैरानी की बात भी है। यह हैरानी लोगों को है कि भाजपा राम जेठमलानी, या सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों को क्यों पार्टी में लाती है, या क्यों राज्यसभा पहुंचाती है जो कि बेकाबू हैं, बागी हैं, और पूरी तरह अराजक मिजाज के हैं। इन दोनों को लेकर भाजपा पहले भी अपने हाथ जला चुकी है, और सुब्रमण्यम स्वामी को राज्यसभा भेजने के काफी पहले से ये सार्वजनिक रूप से केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली को देश का एक वित्तीय अपराधी, या वित्तीय अपराधियों का रहनुमान बताते हुए लगातार उनके खिलाफ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठियां लिखते आ रहे थे, और केन्द्र सरकार के लिए असुविधा खड़ी करने को उन्होंने अपना पेशा ही बना रखा था। अब पता नहीं क्या सोचकर भाजपा ने उनको राज्यसभा भेजा।
ऐसा कई पार्टियों के साथ होता है, समाजवादी पार्टी में हाल ही में स्वघोषित दलाल अमर सिंह को पार्टी में दाखिला दिया और राज्यसभा भेजा। हो सकता है कि उत्तरप्रदेश चुनाव के लिए लंबी-चौड़ी रकम का इंतजाम करने के लिए पार्टी को दलालों की जरूरत हो, या कोई और वजह हो, लेकिन अमर सिंह ने पिछले बरसों में समाजवादी पार्टी के लिए जितने किस्म की शर्मिंदगी खड़ी की थी, उसे देखते हुए, उनके संदिग्ध और रहस्यमय सौदों को देखते हुए, देश से लेकर विदेश तक नेताओं की खरीदी-बिक्री के उन पर आरोपों को देखते हुए, अपने साथ की महिलाओं के खिलाफ ओछी और अश्लील बातों की उनकी रिकॉर्डिंग को देखते हुए, यह हैरानी होती है कि कोई पार्टी आखिर क्या सोचकर ऐसे लोगों को दाखिला देती है?
हमारा ख्याल है कि कुछ लोग अपनी तबाही की ताकत के गुरूर में पार्टी संगठन को पांवपोंछना समझते हैं, और पार्टी से आते-जाते रहते हैं, और वे किसी संगठन के तहत काम करने के आदी नहीं रहते। इस बात को समझना हो तो कब्ज के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाले जमालघोटे के बीज से समझा जा सकता है कि उसे खाकर पेट नहीं भरा जा सकता, भरा हुआ पेट खाली जरूर किया जा सकता है। स्वामी और जेठमलानी किसी ढांचे को गिराने वाले बुलडोजर की तरह काम जरूर कर सकते हैं, लेकिन वे इमारत को खड़ा करने के लिए इस्तेमाल होने वाली क्रेन की तरह काम नहीं कर सकते। आज भाजपा में सुब्रमण्यम स्वामी को लेकर खासा विरोध चल रहा है, और लोगों को इस बात की हैरानी है कि अपनी ही पार्टी के मंत्री, या अपनी ही पार्टी की सरकार के महत्वपूर्ण लोगों के खिलाफ स्वामी को ऐसा अभियान क्यों चलाने दिया जा रहा है? ऐसे लोगों के लिए एक शब्द, चिरअसंतोषी इस्तेमाल किया जाता है। न महज भाजपा को, बल्कि तमाम पार्टियों को ऐसे लोगों से परहेज करना चाहिए जो कि संगठन के ढांचे को पिंजरे की कैद समझते हों। हालांकि हम ऐसे बागी तेवरों के खिलाफ नहीं हैं, क्योंकि संगठनों से परे जब ऐसे लोग खतरे झेलते हुए भी भ्रष्टाचार या किसी बुराई के खिलाफ खड़े होने का दमखम रखते हैं, अदालतों तक लंबी लड़ाई लड़ते हैं, तो वह काम कई बार संगठन नहीं कर पाते, क्योंकि वे बेबसी में कई किस्म के समझौते करते रहते हैं।

केजरीवाल की नौटंकी, थका देने वाली, और अलोकतांत्रिक

संपादकीय
26 जून  2016
दिल्ली आज एक और नाटक देख रही है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लगातार केन्द्र सरकार के साथ एक टकराव बनाकर रखा हुआ है। यह सिलसिला उनके सत्ता में आने के पहले से शुरू हो चुका था, जो आज भी जारी है। इस पूरे दौर में कई मुद्दों पर उनका दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग के साथ लंबा और खुला टकराव चलते रहा, और जंग के खिलाफ अपनी जंग में केजरीवाल ने ऐसी जुबान का इस्तेमाल लगातार किया, जो कि बहुत से लोगों को खली। आज सुबह आम आदमी पार्टी के सारे विधायक दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ प्रधानमंत्री निवास पहुंच रहे थे, और उन्हें उस इलाके में लोगों के इक_े होने के खिलाफ स्थायी रूप से लगे प्रतिबंध को तोडऩे के लिए गिरफ्तार किया गया है। और मनीष सिसोदिया का प्रधानमंत्री निवास जाने का मकसद भी यही था कि वे वहां जाकर एक मामले में गिरफ्तारी देना चाहते थे जो कि अभी तक पुलिस में दर्ज भी नहीं हुआ है।
कल मनीष सिसोदिया के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में सब्जी मंडी के व्यापारियों ने रिपोर्ट लिखाई थी कि सिसोदिया ने उन्हें धमकाया। इस पर पुलिस ने अब तक एफआईआर भी कायम नहीं की थी, और आम आदमी पार्टी के विधायक गिरफ्तारी देने पहुंचे थे। दरअसल दो ही दिन पहले दिल्ली के एक आप विधायक को पुलिस ने मीडिया से बात करने के दौरान ही गिरफ्तार किया था, क्योंकि उसके खिलाफ एक जुर्म दर्ज था, और वह पूछताछ के लिए पुलिस के पास जा नहीं रहा था। मनीष सिसोदिया ने आप विधायकों पर कार्रवाई को लेकर मोदी के नाम यह ट्वीट किया है- मोदीजी आपकी हमसे दुश्मनी है, हमें गिरफ्तार कर लो, पर दिल्ली के काम मत रोको। हम सब आपके सामने सरेंडर करने आ रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल की शक्ल में दिल्ली को एक राजनीतिक विकल्प मिला था, और वहां के लोगों ने परंपरागत दोनों पार्टियों को खारिज करते हुए एक शानदार बहुमत से आम आदमी पार्टी को सत्ता दे दी थी। दिल्ली से परे पंजाब में भी इस पार्टी को कुछ कामयाबी मिली थी, और पंजाब में आने वाले चुनाव को लेकर आप की संभावनाएं दिख भी रही हैं। ऐसे में केजरीवाल का आज सुबह का यह नाटक हमारे हिसाब से इस पार्टी की पंजाब की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएगा, और दिल्ली की बाद की संभावनाओं को भी। देश में कानून का राज लाने की बात करने वाले और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के लिए लोकपाल के मंत्र को सत्ता में आने के पहले तक दिन में सौ-सौ बार दुहराने वाले अरविंद केजरीवाल आज अगर यह चाहते हैं कि उनकी पार्टी के विधायकों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने पर भी कार्रवाई न हो, तो यह लोकतंत्र में मुमकिन नहीं है। हो सकता है कि केन्द्र के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस राजनीतिक दबाव में भाजपाविरोधी आप विधायकों के खिलाफ गलत कार्रवाई कर रही हो, लेकिन यह नौबत तो देश के हर राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच आ सकती है, और हो सकता है कि हो भी। लेकिन क्या पुलिस की किसी कार्रवाई के पहले ही, जुर्म भी कायम होने के पहले ही उपमुख्यमंत्री गिरफ्तारी देने प्रधानमंत्री-निवास पर पहुंचते रहें? केजरीवाल की नौटंकी का यह सिलसिला थका देने वाला है। क्या दिल्ली के लोगों को यह हक नहीं है कि वे केजरीवाल के विधायकों या मंत्रियों के खिलाफ शिकायत कर सकें? और अगर ऐसी शिकायत पर किसी कार्रवाई की जरूरत हो, तो क्या पुलिस कार्रवाई न करे? और क्या दिल्ली की जिंदगी ऐसे ही फिजूल के नाटकों से घिरी रहे?
दुनिया इस बात को जानती है कि अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट तक के बड़े-बड़े वकीलों का मशविरा हासिल है, और ऐसे में अगर वे पुलिस और अदालत का सामना करने के बजाय एक पुलिस-शिकायत के खिलाफ आत्मसमर्पण करने प्रधानमंत्री-निवास अपने लोगों को भेज रहे हैं, तो इसके पीछे कौन सा तर्क है? ऐसे कुतर्क का काम ठीक नहीं हैं, और इससे देश में एक वैकल्पिक राजनीतिक पसंद की संभावना भी खत्म हो रही है। लोकतंत्र में मोर्चे कई तरह के रहते हैं, वे सरकार की टेबिलों पर रहते हैं, संसद या विधानसभाओं की सदनों में रहते हैं, मीडिया के बीच बात रखकर रहते हैं, अदालतों में अपील दायर करके, या जवाब देकर भी रहते हैं, और सड़क की लड़ाई के भी रहते हैं। लेकिन केजरीवाल के आत्मघाती तेवर सिर्फ सतही लड़ाई के दिख रहे हैं, और यह बात उन्हें भारत जैसी लोकतांत्रिक-संसदीय राजनीति में बहुत दूर तक नहीं ले जा सकती।

जनमतसंग्रह, ब्रिटेन से लेकर भारत-पाक के कश्मीर तक

संपादकीय
25 जून  2016
करीब आधी सदी से यूरोपीय समुदाय में रहते आए ब्रिटेन अब उससे बाहर हो रहा है, और डेढ़ दशक पहले उसने अपनी करेंसी और पासपोर्ट छोड़कर ईयू की करेंसी और वीजा नियमों को मान लिया था, और तब से अब तक वह यूरोपीय समुदाय का शायद सबसे ताकतवर सदस्य था। यह सदस्यता पूरी तरह से खत्म होते अभी कम से कम दो बरस लगेंगे, लेकिन ब्रिटिश नागरिकों ने एक जनमतसंग्रह में यह फैसला ले लिया है, और यह ब्रिटिश सरकार पर बंधनकारी भी है। इसके साथ ही जनमतसंग्रह शब्द से जुड़े हुए कुछ और मामले उठ रहे हैं। इसी ब्रिटेन की राजधानी लंदन ने इस जनमतसंग्रह में भारी बहुमत से ईयू में बने रहने के लिए वोट दिया था, और अब वहां के नए-नए मेयर से यह मांग हो रही है कि लंदन शहर एक जनमतसंग्रह कराए, और ब्रिटेन से अलग होकर ईयू का सदस्य हो जाए।
भारत में अगर देश से अलग होने की बात कोई ऐसे करे, तो उसके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज हो जाएगा, और उसका मुंह काला करके उसे पीटना शुरू हो जाएगा। लेकिन योरप की उदार परंपराओं के मुताबिक इस बात पर भी लंदन के लोगों ने ऑनलाईन अभियान छेड़ दिया है, क्योंकि वे देश के बाकी हिस्से के बहुमत से अलग सोचते हैं, और वे देश से अलग होकर भी यूरोपीय समुदाय में बने रहना चाहते हैं। दूसरी तरफ भारत में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जनमतसंग्रह की बात कही है, और इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उन पर हमला किया है। दिल्ली को यह दर्जा न होने के कारण पुलिस विभाग नहीं मिलता, और वहां के उपराज्यपाल दूसरे पूर्ण राज्यों के राज्यपालों के मुकाबले बहुत अधिक अधिकार रखते हैं। दिल्ली की राज्य सरकार एक किस्म से किसी दूसरी राज्य सरकार के तहत चलने वाली म्युनिसिपल की तरह है, और इस तस्वीर को बहुत से लोग बदलना चाहते हैं।
एक और जनमतसंग्रह कश्मीर में होना बाकी है जो कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद दोनों देशों के कब्जे में कश्मीर के कुछ-कुछ हिस्से को लेकर होना है, और जिसमें दोनों तरफ के लोगों को यह तय करने का मौका मिलना है कि वे इन दोनों में से किसी देश के साथ रहना चाहते हैं, या कि वे एक नया देश बनाना चाहते हैं। कश्मीर की इस इतिहास में दफन, लेकिन संवैधानिक रूप से अब भी जिंदा जनमतसंग्रह को लेकर भारत के कुछ राष्ट्रवादी तबकों की सोच बड़ी हमलावर है, और दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के एक चर्चित और प्रमुख वकील प्रशांत भूषण का मुंह इसी बात को लेकर काला किया गया था कि उन्होंने कश्मीर के जनमतसंग्रह को जायज ठहराया था।
दुनिया के सभ्य लोकतंत्र और विकसित संसदीय व्यवस्थाएं जनमतसंग्रह से नहीं डरतीं। जनमत को दबाए रखकर बंदूक का राज तो चलाया जा सकता है, लेकिन सभ्यता विकसित नहीं हो सकती। अमरीका सहित बहुत से ऐसे पश्चिमी देश हैं जहां पर शहरों के पुलिस प्रमुख चुनने के लिए जनता वोट देती है, और शहरों या राज्यों के सरकारी वकील तय करने के लिए भी वोट डलते हैं। अमरीका में तो ऐसे सरकारी वकील आगे चलकर सांसद भी बनते हैं, और उसे राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के लिए एक रास्ता माना जाता है। स्थानीय जनमत को पूरी तरह कुचलकर केन्द्र या राज्य की राजधानियों से बहुत सी बातें लादी जा सकती हैं, और भारत में भी लादी जाती हैं। हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाएं सड़कों पर झाड़ू लगाने की मशीनी गाडिय़ां थोक में खरीदें या नहीं, इसका फैसला भी राज्य सरकार लेती है। ऐसे ही स्थानीय लीडरशिप के बहुत से हक राज्य सरकारें अपने हाथ में ले लेती हैं, और म्युनिसिपलों से परे विश्वविद्यालयों में भी स्वायत्तता का कोई नाम नहीं रहता।
इसी सिलसिले में इस बात का जिक्र करना अच्छा होगा कि जिस ब्रिटेन के जनमतसंग्रह को लेकर आज दुनिया हिली हुई है, उसी ब्रिटेन में म्युनिसिपल के स्थानीय चुनावों में उन लोगों को भी वोट डालने का हक रहता है जो कि ब्रिटेन के किसी इलाके में छह महीने से अधिक से रह रहे हैं, फिर चाहे वे वहां के नागरिक हों, या न हों। वहां की सोच यह है कि जो लोग उस इलाके में रहते हैं, वे अगर विदेशी भी हैं, तो भी स्थानीय इंतजाम के लिए उनको प्रतिनिधि चुनने का हक रहना चाहिए।
जनमतसंग्रह एक अच्छी बात है, और संसद, विधानसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनावों से परे बहुत से मुद्दों पर इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। शहर की बहुत सी ऐसी बड़ी दानवाकार योजनाएं रहती हैं जिनका फैसला लेने से पहले स्थानीय स्तर पर ऐसा जनमतसंग्रह किया जा सकता है। 

ब्रिटिश जनता का फैसला, योरप से परे बाकी दुनिया पर भी असर

संपादकीय
24 जून  2016
यूरोपीय समुदाय से अलग होने के मुद्दे पर ब्रिटेन में हुए जनमतसंग्रह के नतीजों को वहां के एक भारत-मित्र सांसद कीथ वाज ने एक सदमे की बात करार दिया है, और इसे वहां के संकीर्णतावादी लोगों के प्रभाव में मतदाताओं के बहुमत का दिया गया फैसला कहा है। उन्होंने इसे ब्रिटेन, और योरप के लिए एक भयानक दिन कहा है। और उन्होंने यह भी कहा कि वे हजार बरसों में भी ऐसा भरोसा नहीं कर सकते थे कि ब्रिटिश जनता ऐसा वोट देगी। उन्होंने कहा कि वे इस मतदान को तथ्यों पर गौर किए बिना भावनाओं के आधार पर ब्रिटिश जनता का फैसला मानते हैं। उन्होंने कहा कि यह ब्रिटेन के लिए तबाही लाने वाला फैसला है, और बाकी योरप के लिए भी, और बाकी दुनिया के लिए भी।
इस जनमत संग्रह के बारे में अधिकतर बातें खबरों में आई हैं, इसलिए हम उनके बारे में यहां अधिक नहीं लिख रहे हैं। लेकिन बहुत से दूसरे मुद्दों के साथ-साथ जिस एक बात ने ब्रिटेन को जनमतसंग्रह की तरफ धकेला, वह बात है खाड़ी के देशों और दूसरी जगहों से योरप और ब्रिटेन में बड़ी संख्या में पहुंचने वाले शरणार्थियों को लेकर ब्रिटेन की जनता के एक बड़े हिस्से की फिक्र। और यह फिक्र छोटी नहीं है, ब्रिटेन के बहुत से लोग यह सोचते हैं कि यूरोपीय समुदाय का हिस्सा बने रहने से ब्रिटेन को शरणार्थियों का जितना बोझ उठाना पड़ रहा है, और उठाना पड़ेगा, और जारी रखना पड़ेगा, उससे ब्रिटेन पर आर्थिक और सामाजिक बोझ इतना अधिक पड़ रहा है, और पड़ेगा, कि उससे देश चरमरा जाएगा। दूसरी तरफ यूरोपीय समुदाय में बने रहने के पक्षधर, सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री सहित और कई लोगों की सोच एक उदार सामाजिक व्यवस्था की रही, और ये लोग ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही पर टिके रहना चाहते थे, घरेलू दिक्कतों के बढऩे की कीमत पर भी। इस जनमतसंग्रह के नतीजे के बाद यह खबर है कि प्रधानमंत्री डेविड केमरून ने इस्तीफा दे दिया है।
ब्रिटेन के किसी भी आम चुनाव की तरह इस मुद्दे पर जनमत संग्रह के लिए खूब जमकर प्रचार हुआ, और लोगों के बीच भावनाएं भी भड़काई गईं, और तथ्य भी रखे गए। हम इस नौबत की तुलना भारत की किसी मिसाल से किए बिना महज दो बातों का जिक्र यहां पर करना चाहते हैं। 1971 में बांग्लादेश बनने के वक्त वहां से दसियों लाख शरणार्थी भारत आए थे, और उनमें से शायद पूरे के पूरे कानूनी रूप से भारत में रह गए। इनसे परे असम जैसे राज्य में अवैध रूप से आकर बसे हुए दसियों लाख बांग्लादेशियों का मुद्दा लंबे समय से भारत की राजनीति में उठाया जाता रहा, और इस बार असम में भाजपा की पहली सरकार बनने के पीछे जो वजहें गिनाई जाती हैं, उनमें ऐसे अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा भी एक है, जिनकी वजह से असम के कुछ लोगों का यह मानना रहा है कि उससे राज्य का चरित्र ही बदल गया है, और स्थानीय लोगों के हक छिने जा रहे हैं। ऐसी एक दूसरी नौबत भारत में कानूनी रूप से बसाए गए तिब्बती शरणार्थियों की है जो कि चीन के कब्जे वाले तिब्बत को छोड़कर दलाई लामा के साथ भारत में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं, और इनको भी भारत ने खुले दिल से जगह दी है, और सरकारी खर्च पर इनको बसाया है। भारत का रिकॉर्ड आसपास के देशों के शरणार्थियों को लेकर बड़ा शानदार रहा है, और उसने अपने दरवाजे लोगों के लिए बंद नहीं किए, और 1971 में तो सिनेमा टिकटों पर एक शरणार्थी टैक्स लगाकर इंदिरा सरकार ने खर्च जुटाया था। लेकिन आज ब्रिटेन में वैध-अवैध प्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर स्थानीय नागरिकों की जिस तरह की फिक्र सामने आई है, वह योरप के भी बहुत से और देशों को प्रभावित कर सकती है जहां पर पहुंचे हुए शरणार्थियों को लेकर कई देशों में कई तबकों में बड़ी फिक्र है। योरप के कुछ कस्बे तो ऐसे भी हैं जहां पर स्थानीय आबादी से अधिक शरणार्थियों के बसा दिए जाने से वहां के मूल निवासी रातों-रात अल्पसंख्यक हो गए हैं, और सांस्कृतिक फर्क की वजह से वे फिक्रमंद भी हैं। ब्रिटेन में जनमतसंग्रह की यह ताजा जीत एक उदार लोकतंत्र की हार भी है क्योंकि लोकतंत्र कई तरह के नुकसान झेलते हुए भी अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां पूरी करता है। फिलहाल ब्रिटेन के यूरोपीय समुदाय से अलग होने से भारत के साथ ब्रिटिश कारोबार पर भी बड़ा असर पडऩे वाला है, इस आशंका में दुनिया के कई शेयर बाजार आज सुबह नींद से उठते ही औंधे मुंह गिर पड़े, और आने वाले दिन बताएंगे कि ब्रिटेन की जनता ब्रिटेन को फिर से अपनी बंद सरहदों वाला देश बनाकर बाकी दुनिया पर कैसा असर डालने जा रही है। इससे दुनिया के बाकी देशों में भी संकीर्णतावादी, राष्ट्रवादी ताकतों को बढ़ावा मिलना तय है।

क्या सरकारी अफसरों को सामाजिक हकीकत बयां करने का हक हो, या नहीं?

विशेष संपादकीय 
23 जून 2016  
-सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के एक चर्चित आईएएस अफसर की एक ताजा फेसबुक पोस्ट को लेकर अलग-अलग बहुत से तबकों के लोग उस पर टूट पड़े हैं कि उसे नौकरी से हटाया जाए, या ओहदे से हटाया जाए, या कोई और सजा दी जाए। उसने फेसबुक पर लिखा था- 'क्या भारत की न्याय प्रणाली में कोई ऐसा पूर्वाग्रह है जिसकी वजह से मौत की सजा पाए हुए हिन्दुस्तानियों में से 94 फीसदी लोग दलित और मुस्लिम तबकों के हैंÓ। इसके पहले भी मध्यप्रदेश में कुछ अफसरों पर सोशल मीडिया पर लिखी गई बातों को लेकर कार्रवाई की गई है, और छत्तीसगढ़ के भी कुछ दूसरे अफसर ऐसे हैं जिनकी पोस्ट की गई बातों को लेकर बखेड़ा होते रहा है।
सरकारी अफसर अपने विचार किन मुद्दों पर, किस हद तक, और किन जगहों पर रख सकते हैं, यह कई बातों पर निर्भर करता है। जब तक कोई आपत्ति न करे, तब तक तो कई बातें खप जाती हैं। लेकिन जब कोई शिकायत होती है, या कोई बखेड़ा खड़ा होता है, तब यह बात सामने आती है कि शासकीय सेवा के नियम-कायदे किस तरह की सीमा सुझाते हैं। इस एक मामले को अगर देखें, तो यह बात साफ है कि देश के बहुत से दलित और अल्पसंख्यक ऐसा मानते हैं कि न केवल भारत की न्याय व्यवस्था में, बल्कि सामाजिक व्यवस्था में भी जाति व्यवस्था के पूर्वाग्रह वाला एक भेदभाव कायम है, और धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों को सार्वजनिक रूप से रोजाना ही जुबानी या तन-बदन की हिंसा झेलनी पड़ती है। इसलिए कोई सरकारी अधिकारी कुर्सी पर रहते हुए इस बात को उठाए, या न उठाए, यह बात एक हकीकत है, और इसे अनदेखा करना केवल वही तबका कर सकता है जो शोषकों के साथ, और जो शोषण का शिकार नहीं है। दूसरी तरफ जाति व्यवस्था के खिलाफ बोलने वाले लोग भारत की संविधान सभा से लेकर आज की संसद तक बहुत से, इस सामाजिक हकीकत की चर्चा करने हमारे हिसाब से कोई गलत बात नहीं है।
आज जिस बात को लेकर हम यह चर्चा कर रहे हैं उसमें इस नौजवान अफसर ने भारत की न्याय प्रणाली की बात कही है। न्याय प्रणाली एक व्यापक दायरा है जिसमें मुकदमा चलाने वाली जांच एजेंसियों से लेकर दोनों पक्षों के वकीलों तक, गवाहों और अदालती कर्मचारियों तक, और जजों तक, सभी की जगह है। और इन सबको मिलकर जो न्याय प्रणाली बनती है, उसके बारे में हम हमेशा से यह लिखते आए हैं कि यह तरह-तरह के वर्ण और वर्ग के पूर्वाग्रहों से भी प्रभावित रहती है, और इसका कुछ हिस्सा भ्रष्टाचार में डूबा रहता है, और सामाजिक यथार्थ यह है कि भ्रष्टाचार की ताकत दलितों और मुसलमानों में, आदिवासियों और गरीबों में बिल्कुल भी नहीं रहती है। इस तरह भारत की न्याय प्रणाली बड़े जाहिर तौर पर उच्च वर्ण, बहुसंख्यक धर्म, उच्च आय वर्ग, शहरी-शिक्षित, ऐसे ताकतवर तबकों को इंसाफ पाने, या दूसरों को बेइंसाफी देने की अधिक ताकत देती है।
यह बात अकेले हिन्दुस्तान की नहीं है। जब भी हिन्दुस्तान के दलित और आदिवासी तबके की बात होती है, उससे कुछ या अधिक हद तक मिलता-जुलता एक दूसरा मामला अमरीका के अश्वेतों का होता है, या दुनिया के बहुत से देशों के मूल निवासियों का होता है, जिन्हें भारत में आदिवासी कहते हैं। भारत सहित दुनिया के बहुत से लोकतंत्रों में यही हालत कायम है कि ऐसे तबकों को प्रताडऩा अधिक झेलनी पड़ती है, और इनके इंसाफ पाने की संभावना बड़ी कम रहती है। भारत में भी दलितों और मुस्लिमों का यही हाल है, और हम छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके की बात करें, तो सरकारी जुल्म और ज्यादती के शिकार आदिवासी तबकों की हालत भी यही है कि उनके इंसाफ पाने की संभावना न के बराबर रहती है। सामाजिक व्यवस्था के जातिवाद के तहत हालात इतने अधिक खराब रहते हैं कि संसद से लेकर सरकार तक, और अदालत से लेकर अखबार तक अगर दलित और मुस्लिम, आदिवासी और गरीब अगर किसी ताकत के ओहदे पर आ भी जाते हैं, तो भी वे अपने वर्गहितों से दूर जाकर,  परंपरागत ताकतवर तबकों के पूर्वाग्रहों को ओढ़ लेते हैं, और अपनी ही सामाजिक जड़ों से कट जाते हैं, उन्हें काटने लगते हैं। यही वजह है कि सरकार का हिस्सा बनने के बाद पुलिस में जो आदिवासी या दलित लोग आते भी हैं, वे भी दलित या आदिवासी लोगों से ज्यादती करने में भागीदार हो जाते हैं। सत्ता अपने आपमें एक बहुसंख्यक धर्म, राजा का धर्म, राजा की जाति का चरित्र सब पर डाल देती है, और इस सत्तारूढ़ पूर्वाग्रह से सामाजिक अन्याय बढ़ते ही चलता है।
अभी छत्तीसगढ़ के जिस आईएएस अफसर ने यह पोस्ट की है, उसके बारे में कुछ लोगों का यह मानना या कहना है कि वह दलित है, या वह ईसाई है, या वह नास्तिक है, या वह जाति व्यवस्था के खिलाफ है। लेकिन हमारा यह मानना है कि उसके लिखे हुए मुद्दे पर बात करने के बजाय अगर उसकी कलम की स्याही में गंगाजल या किसी चर्च का पानी ढूंढा जाएगा, और इस बात को अनदेखा कर दिया जाएगा कि आज भी इस देश में दलितों को कुओं से पीने का पानी लेने पर भी जगह-जगह रोक लगी हुई है, तो फिर स्याही की ऐसी जांच करने वाले लोगों का जनतांत्रिक-इंसाफ से कोई लेना-देना हो नहीं सकता।
हमारा मानना है कि सामाजिक हकीकत की बात को उठाना किसी सरकारी सेवा-नियम के खिलाफ नहीं हो सकता, और सरकार को अगर किसी पर कोई कार्रवाई करनी है, तो उसे एक अलोकतांत्रिक और तंगनजरिये से नहीं किया जाना चाहिए। इस देश में अनगिनत नेता और अफसर ऐसे हैं जो कि अपने धार्मिक प्रतीक चिन्हों, और धार्मिक मान्यताओं का खुला प्रदर्शन करते हैं, सरकारी खर्च पर करते हैं, और ऐसा करके वे जनता के बीच अपने निष्पक्ष और धार्मिक समभाव का भरोसा खत्म भी करते हैं। ऐसे लोगों पर कार्रवाई के बजाय अगर सामाजिक सच्चाई पर कार्रवाई करना है, तो यह आसान तो हो सकता है, लेकिन यह लोकतांत्रिक तो बिल्कुल भी नहीं होगा, न्याय तो बिल्कुल भी नहीं होगा। 

इसरो से देश को गौरव का एक और मौका

संपादकीय
22 जून  2016
भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो की एक और कामयाबी ने आज सुबह-सुबह देश का सिर ऊंचा किया। कल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की वजह से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को दिन की शुरूआत बलात्कार और हत्या से करने का मौका नहीं मिला था, और आज सुबह यह दूसरी सकारात्मक खबर थी कि दुनिया के विकसित देशों के उपग्रह लेकर भारतीय रॉकेट किस तरह अंतरिक्ष गया। आज अलग-अलग देशों और कंपनियों के 20 उपग्रह एक साथ भेजे गए, और यह पूरा मिशन बड़ी बारीक सफलता से पूरा हुआ। इस बड़े ही तकनीकी मामले पर वैसे तो हमको किसी विचार के लिखने की जरूरत नहीं होनी थी, लेकिन फिर भी एक सरकारी संस्थान इस देश की आम सरकारी संस्कृति के बीच भी किस बखूबी काम कर सकता है, यह देखने की जरूरत है। बुरी बातों पर लिखने का मौका तो दिन में चार बार मिलता है, लेकिन सरकार में किसी अच्छी बात पर लिखने के मुद्दों का अकाल बने रहता है।
यह इसरो केन्द्र सरकार के पैसों पर चलने वाला संस्थान ही है, और इसमें वे हिन्दुस्तानी वैज्ञानिक और तकनीशियन काम करते हैं, जिनकी राष्ट्रीयता के बारे में बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि हिन्दुस्तानी बुनियादी रूप से भ्रष्ट हैं, वे काम नहीं करते हैं, सरकार के हर काम में बड़ा भ्रष्टाचार रहता है, वगैरह-वगैरह। दूसरी दिलचस्प बात यह कि पिछली बार जब मंगल ग्रह के लिए भारत का यान रवाना हुआ, तो पहली बार यह बात सामने आई कि इसरो के उस अभियान से कितनी बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ी हुई थीं। आमतौर पर महिलाओं का मखौल बनाने के लिए यह कहा जाता है कि वे एक कार भी ठीक से पार्क नहीं कर सकतीं, और वे ही महिलाएं इसरो में काम करते हुए मंगलयान को भी मंगल पर ठीक से पार्क कर चुकी हैं। यह इसरो सरकारी खरीदी पर ही काम करता है, इसके वैज्ञानिक वे ही लोग हैं जिन्हें कि दुनिया के दूसरे देशों में इससे दस-बीस गुना बड़ी तनख्वाह मिल सकती है, और इस पर सरकार की वैसी ही राजनीति चल सकती है जैसी कि किसी भी दूसरे सरकारी संस्थान पर चलती है या चल सकती है। लेकिन ऐसी ही तमाम सीमाओं के बीच इतनी बड़ी महिला-भागीदारी के साथ इसरो ने जो कामयाबी पाई है, उसे देखकर इस देश को यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी हर कोने पर थूकने या मूतने से बेहतर भी बहुत से काम कर सकते हैं, और करते हैं।
किसी देश के लिए राष्ट्रीय गौरव बहुत जरूरी होता है। इसरो हर बरस एक से अधिक बार देश को ऐसा मौका देता है। ऐसा ही एक दूसरा संस्थान अमूल है जो कि  सहकारी क्षेत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें डेयरी चलाने के साथ-साथ आइसक्रीम से लेकर चॉकलेट तक, और दूध से लेकर मक्खन तक बनाकर अपने ब्रांड से बेचने में अमूल ने भारत में काम कर रही सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पछाड़ दिया है। और इस अमूल की एक खूबी यह भी है कि दशकों से इसके ऐसे कॉर्टूननुमा पोस्टर हर चर्चित घटना पर आते हैं, और सरकारी क्षेत्र की सहकारी संस्था होने के बाद भी ये पोस्टर सरकार का मजाक उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहते। गौरव का एक और संस्थान दिल्ली का मेट्रो था जिसे कि एक इंजीनियर-अफसर श्रीधरन ने बेमिसाल कामयाबी से बनाया था, और सरकार के भीतर रहते हुए शानदार काम करके दिखाया था। देश में ऐसी मिसालें कई जगह सामने आती हैं, और जनता से लेकर सरकार तक सभी को यह सोचना भी चाहिए कि कामयाबी की ऐसी मिसालें और कहां-कहां बढ़ाई जा सकती हैं। आज अगर कोई यह सोचे कि इसरो के रॉकेट में, या उसके उपग्रह में घटिया सामान सरकारी सप्लाई से खरीदकर लगाया गया होता, तो क्या आज इसरो मंगल पर पहुंचा होता? क्या वह दुनियाभर के देशों के लिए काम करता होता?
अंतरिक्ष में भारत की सफलता पूरी तरह से घरेलू तकनीक पर गढ़ी हुई है, और भारत को अपने बाकी सरकारी क्षेत्रों के बारे में यह सोचना चाहिए कि वहां ऐसी कामयाबी पाने के लिए क्या किया जा सकता है।

योग के फायदे तो अनगिनत पर धर्मांधता से दूर ही रखें

संपादकीय
21 जून  2016
भारत की सदियों पुरानी जीवनशैली का एक हिस्सा, योग अब पूरी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में अधिक प्रचलित होते चल रहा है। वैसे तो भारत में दिलचस्पी रखने वाले लोग जमाने से योग सीखने भारत आते थे, और बहुत सी पुरानी तस्वीरें बताती हैं कि आधी-पौन सदी पहले भी पश्चिम में योग का प्रचलन था। लेकिन नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह अंतरराष्ट्रीय दिवस भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्रसंघ से घोषित हुआ और आज भारत के तकरीबन हर हिस्से में योग का सार्वजनिक अभ्यास हुआ। टेलीविजन पर ऐसा बहुत समय बाद हुआ कि सुबह के दो घंटे हत्या और बलात्कार से आजाद रहे, और सिर्फ योग और उसके फायदों पर चर्चा होती रही। कुछ भाजपा विरोधी पार्टियों के राज वाले राज्यों को छोड़ दें, तो बाकी सारे देश में सरकार ने इस दिन इस समारोह को सरकारी स्तर पर किया, और स्कूल-कॉलेज के बच्चों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
बिना किसी खर्च के, बिना बिजली और बिना किसी मशीन के जो योग हो सकता है, वह लोगों को बहुत सी बीमारियों से बचाता है। हम बाबा रामदेव जैसे कुछ नाटकीय योग की बात नहीं करते, जिसके फायदे को लेकर डॉक्टरों को कई तरह के शक हैं, और जिससे होने वाले नुकसान को लेकर कई तरह आशंकाएं भी हैं, हम भारत के परंपरागत योग की बात करते हैं जो कि रामदेव के पैदा होने के सदियों पहले से बिना किसी बाजारू नाटकीयता के चल रहा है, और आज भी मुंगेर जैसे विश्वविख्यात योग संस्थानों से लेकर दक्षिण भारत के कई योग गुरुओं तक ने बिना साबुन और नूडल्स बेचे सिर्फ योग को फैलाया है। यह अलग बात है कि आज रामदेव भारत के राजकीय योग गुरु बने बैठे हैं, और सरकारी मंच से शोहरत पाते हुए अपने हजारों करोड़ के कारोबार को दसियों हजार करोड़ का कर रहे हैं।
लेकिन इन सबसे परे अगर हम पते की बात पर सीधे आएं, तो राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थानों को साफ-सुथरी, खुली और हवादार जगहों पर योग का इंतजाम करना चाहिए जिससे कि भारत की आबादी में बढ़ते चल रहे डायबिटीज सरीखे रोग पर काबू हो सके। और कई किस्म की गंभीर बीमारियां भी इस मुफ्त की जीवनशैली से घट सकती हैं, जिंदगी बढ़ सकती है, और चुस्त-दुरुस्त रहने से इंसान की उत्पादकता भी बढऩे की गारंटी रहती है। आज दिक्कत यह है कि खुली हुई जितनी जगह सरकार के पास है, उस पर स्थानीय संस्थाएं और सरकारी संस्थाएं सिर्फ कारोबार के कॉम्पलेक्स बनाने पर आमादा रहती हैं, और जनता की जरूरत के लायक मैदान और बाग-बगीचे बच नहीं जा रहे। देश में सरकार ही जमीनों की सबसे बड़ी मालिक है, इसलिए जमीन तो उसे ही देनी होगी, लेकिन समाज योग प्रशिक्षकों को जुटाने में मदद कर सकता है, और बहुत मामूली से खर्च से लोगों की जिंदगी को बहुत ही सेहतमंद बनाया जा सकता है, बीमारियों से लोगों को बचाया जा सकता है जो कि आगे चलकर सरकारी खर्च में बचत का एक तरीका भी साबित होगा।
स्कूल और कॉलेज भी खेलकूद के साथ-साथ योग को अपना सकते हैं, और इससे नफा छोड़ कोई नुकसान नहीं होगा। आज जिस तरह से योग को एक साम्प्रदायिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है, उसके चलते इसका विरोध भी हो रहा है। वरना यह वही देश है जिसके हर सरकारी दफ्तर में आजादी के भी दशकों पहले से हर तिजोरी, हर खजाने, और और हर बहीखाते की लक्ष्मी पूजा होते आई है, और किसी भी धर्म के अधिकारी वहां रहे हों, कभी किसी को इस पूजा से ऐतराज नहीं रहा। लेकिन अगर कोई यह नारा लगाए कि भारत में सरकारी नौकरी करना है तो लक्ष्मी पूजा करना होगा, तो हो सकता है कि परंपरागत लक्ष्मी पूजा का विरोध भी होने लगे। इसी तरह योग को अगर सचमुच बढ़ावा देना है तो उसे साम्प्रदायिक धर्मांधता से अलग रखना होगा, वरना धर्मांधता जरूर बढ़ जाएगी, योग पिछड़ा ही रह जाएगा।

छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति अब पिछले चुनाव जैसी नहीं

संपादकीय
20 जून  2016
छत्तीसगढ़ की राजनीति ने ऐसी करवट बदली है कि अगले विधानसभा चुनाव में जो पार्टी या जो विधायक अपने-आपकी जीत तय मानकर चलेंगे, वे खासा बड़ा झटका खा सकते हैं। भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांगे्रस के भीतर लगातार एक बेचैन-बागी बने हुए अजीत जोगी अब अपने बेटे के साथ खुद की एक पार्टी बनाकर चुनाव में उतर रहे हैं, और उनका कितनी सीटों पर क्या असर होगा, कांगे्रस और भाजपा के चुनिंदा लोगों के साथ उनका कैसा तालमेल रहेगा, इसका अंदाज आज शायद कोई न लगा पाए। दूसरी तरफ इसी तरह के बागी तेवरों के साथ भाजपा छोडऩे वाले बस्तर के भूतपूर्व सांसद सोहन पोटाई ने भी विधानसभा चुनाव में अलग झंडे तले पार्टी बनाकर लडऩे की घोषणा की है। इन सबसे परे आम आदमी पार्टी है जिसने कि दिल्ली और पंजाब के चुनावों में सबको चौंका दिया था, और दिल्ली राज्य पर कब्जा करने के साथ-साथ संसद में भी वह पंजाब के रास्ते पहुंच गई थी, अब यह पार्टी भी बस्तर के सबसे जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर राज्य में सबसे अधिक आक्रामक तेवरों के साथ है, और ऐसा मानने वाले लोग हैं कि अगली विधानसभा में इस पार्टी से भी कोई हो सकते हैं।
कांगे्रस और भाजपा के छत्तीसगढ़ में लगातार बने हुए आपसी-एकाधिकार की जमीन इस विधानसभा चुनाव में कुछ हिलती हुई दिख सकती है, और यह याद रखने की जरूरत है कि इन दोनों पार्टियों के बीच सीटों का फर्क तो पिछले चुनाव में साफ था, लेकिन दोनों के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी था। आज क्या कोई यह अंदाज लगा सकते हैं कि पिछले चुनाव से लेकर अब तक पौन फीसदी का यह फासला किस तरफ कितना घटा या बढ़ा होगा? और यह भी याद रखने की जरूरत है कि तीन कार्यकाल पूरे करते-करते हो सकता है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इस पौन फीसदी की लीड को भारतीय चुनावी राजनीति में प्रचलित एक शब्द, एंटी इंकम्बेंसी की वजह से खो भी चुकी हो। यह एक अलग बात है कि हो सकता है कि उसने इससे अधिक हासिल भी कर लिया हो। हम अभी उतनी बारीक अटकल पर नहीं जा रहे हैं, और हम मोटे तौर पर अगले चुनाव की एक तस्वीर भर सामने रख रहे हैं। पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटों के बारे में यह कहा जाता है कि वहां जोगी की मेहरबानी से भाजपा को अप्रत्याशित सीटें मिली थीं, और भाजपा की सरकार दुबारा लौटी थी। बस्तर और सरगुजा में आदिवासी सीटें भाजपा के हाथ से निकल गई थीं, और इस बार तो सोहन पोटाई की शक्ल में एक अलग चुनौती भी रहेगी। फिर बस्तर में पुलिस और प्रशासन के जुल्म-ज्यादती को लेकर जो भयानक नौबत है, उसे लेकर भी आम आदमी पार्टी बड़े आक्रामक तेवरों के साथ अभी से डट गई है।
कुल आधा दर्जन से कम सीटें, और कुल पौन फीसदी से कम का वोटों का फासला, अगले चुनाव में इनको किसी भी तरफ बदलने के लिए ये दो-तीन नए मोर्चे असर डाल सकते हैं। लेकिन हम इसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक लोकतांत्रिक परिवर्तन इसलिए मानते हैं कि दोनों बड़ी पार्टियों का एकाधिकार अब टूटते दिख रहा है, उनका विधानसभा के भीतर तो फिर भी मिला-जुला कब्जा हो सकता है, लेकिन चुनावी मैदान में इन दोनों पार्टियों से परे भी ऐसे लोग रहेंगे जो कि इन दोनों का जीना हराम करके रखेंगे।

हथियार, इंसान, और सामाजिक तनाव का मेल ऐसा खतरनाक..

संपादकीय
19 जून  2016
एक तरफ अमरीका में घर-घर में हथियार रखने की आजादी के चलते बहुत से ऐसे मामले हो रहे हैं जिनमें सिरफिरे या आतंकी,या नस्लवादी, या साम्प्रदायिक हत्यारे आसानी से खरीदे गए घातक हथियारों से दर्जनों लोगों को भून डालते हैं, और इसके बाद राष्ट्रपति से लेकर और बहुत से लोगों तक हथियारों पर पाबंदी लगाने की मांग उठती है। दूसरी तरफ ब्रिटेन में अभी एक महिला सांसद को जिस तरह गोली मारी गई और उसके बाद उसे चाकू भी भोंके गए, वह घटना इस बात के बावजूद भी कि ब्रिटेन में हथियारों पर कड़ी पाबंदी है। भारत जैसे देश में मिलीजुली नौबत एक हथियार हैं भी, और अवैध हथियार भी खूब हैं, लेकिन अंधाधुंध गोलीबारी से बहुत से लोगों को मार डालने जैसे मामले शायद ही होते हैं, अधिकतर हत्याएं आपसी रंजिश में होती हैं।
इन तीनों स्थितियों को अगर देखें तो यह समझना कुछ मुश्किल है कि हथियार हिंसा बढ़ाने के लिए अकेले जिम्मेदार हैं, या कि उन हथियारों को चलाने वाली सोच जिम्मेदार हैं, या कि किसी देश में सामाजिक स्थिति उसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है? अमरीका के मामले में तो यह साफ लगता है कि निजी हथियारों को लेकर वहां पर लोगों में एक ताकत की भावना जिस तरह से बैठी हुई है, उसमें लोग बावलेपन की हद तक हथियार खरीदते हैं, और इक_े करते हैं। वहां की हथियार बनाने वाली कंपनियां हॉलीवुड की फिल्मों से लेकर लोगों की सीधी सोच तक, सबको प्रभावित करके गन-कल्चर को बढ़ावा देती हैं, और वहां की संसद को कभी यह तय नहीं करने देतीं कि हथियार घटाए जाएं। इसके बाद फिर अमरीका के कुछ गिने-चुने लोगों में तनाव इतना बढ़ जाता है कि वे ठंडे दिमाग से सोचकर चारों तरफ खून बहा देते हैं। यह बात सामाजिक तनाव की भी है, और धार्मिक नफरत की भी है। इससे परे एक खतरा और भी है कि दुनिया के कई मुस्लिम देशों में जिस तरह से अमरीकी फौजों ने हमला किया, उसका बदला लेने के लिए भी बहुत से बौखलाए हुए मुस्लिम नौजवान न सिर्फ अमरीका में, बल्कि योरप के भी कई देशों में ऐसा करते हैं।
अब भारत के लिए इन तमाम स्थितियों से सबक लेने की जरूरत है। एक तो निजी हथियारों में बड़ी कड़ाई से कमी होनी चाहिए। भारत के उत्तरप्रदेश-बिहार जैसे कुछ इलाके हैं जहां पर निजी हथियार रखना एक इज्जत की बात मानी जाती है, और वहां जो कोई बंदूक खरीद सकते हैं वे इसकी कोशिश करते हैं। कानूनी लाइसेंस न मिले तो भी लोग गैरकानूनी हथियार रख लेते हैं। देश में जिस तरह का धार्मिक उन्माद छाया हुआ है, और जिस तरह की साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, उसके चलते हुए यह खतरा बना हुआ है कि किसी दिन कोई अकेला सिरफिरा यह तय कर ले कि वह समाज से, सरकार से, या किसी तबके से हिसाब चुकता करने के लिए बहुत से लोगों को मार डालेगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके एक सिक्ख अंगरक्षक ने स्वर्ण मंदिर पर हुई फौजी कार्रवाई के विरोध में की थी। और प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द तैनात, जांचे-परखे हुए एक गार्ड ने जब ऐसा किया, तो किसी धार्मिक उन्माद में कोई व्यक्ति और बड़ी हिंसा, और बहुत सी हत्याएं कर सकते हैं।
इन दोनों-तीनों देशों को देखें, और पड़ोस के पाकिस्तान की बड़ी अलग स्थिति को देखें तो भी यह समझ आता है कि हथियारों पर काबू एक जरूरत है, दूसरी जरूरत यह भी है कि सामाजिक तनाव न बढ़ पाए। हथियारबंद और नफरत से भरे हुए लोग कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसकी मिसाल दुनिया भर में है। खाड़ी के जिन देशों में चारों तरफ हिंसा से देश के देश खंडहर बने जा रहे हैं, लाखों लोग मारे जा रहे हैं, और दसियों लाख देश छोड़कर जाने को मजबूर हो रहे हैं, वहां पर ये ही दो बातें तो हैं, एक तो धार्मिक उन्माद से भरी हुई नफरत, और दूसरा हथियार। इसलिए भारत को बहुत सावधानी से इन दोनों चीजों पर काबू रखना चाहिए, क्योंकि हथियारों की जांच-पड़ताल तो एक बार किसी तरह से हो भी सकती है, लोगों के दिल-दिमाग में बैठी हुई हिंसक धार्मिक नफरत की शिनाख्त भी किसी हिंसा के बाद ही जांच-पड़ताल में समझ में आ सकती है, तब तक नुकसान हो चुका रहता है। 

भारतीय महिला पायलटों की कामयाबी के मौके पर...

संपादकीय
18 जून  2016
भारतीय वायुसेना की महिला पायलटों में से आज से तीन को लड़ाकू विमानों के लिए तैनात किया गया है। अब तक भारत में एयरफोर्स की महिला पायलटें दूसरे विमान तो उड़ाती थीं, लेकिन लड़ाकू विमान और युद्ध के मोर्चे से उन्हें अलग रखा गया था। आज इस बात को भारतीय महिलाओं के लिए एक बड़ी ऐतिहासिक बात कहा जा रहा है। दूसरी तरफ पड़ोस के पाकिस्तान में मरियम मुख्तियार नाम की एक महिला लड़ाकू विमान पायलट एक विमान दुर्घटना में पिछले बरस मारी गई, और पाकिस्तानी एयरफोर्स में 2006 से 20 महिलाओं को लड़ाकू पायलट बनाया जा चुका था। भारत ठीक दस बरस बाद यह काम कर रहा है, इसलिए यह भारतीय सेना का देर से लिया गया फैसला है, जिसके लिए भारतीय महिलाओं की क्षमता को जोड़कर देखना ठीक नहीं है। यह एक खुशी का मौका जरूर हो सकता है, लेकिन इस मौके पर पाकिस्तान की मिसाल को भूलना ठीक नहीं है, और यह भी याद रखने की जरूरत है कि भारत में बाकी महिलाओं की आम हालत क्या है।
भारत में महिला अगर घर के बाहर से कमाकर नहीं लाती है, या कि घर में कोई रोजगार नहीं करती है, तो उसे घरेलू महिला कहा जाता है, और आम जुबान में यह कहा जाता है कि वह कोई काम नहीं करती। जो पूरे घर के काम को ढोती है, कुनबे की अगली पीढ़ी को पहले पेट के भीतर और बाद में गोद और कंधे पर ढोती है, जो पूरे घर को खिलाने के बाद सोती है, जो पूरी जिंदगी चूल्हे का धुआं झेलते हुए फेफड़े छलनी कर बैठती है, जिसकी मेहनत को रूपयों में आंका जाए, तो वह तमाम गरीब परिवारों में आदमी की कमाई से ज्यादा की होती है, उसके बारे में कह दिया जाता है कि वह कुछ नहीं करती। हिन्दुस्तानी समाज में नगद पैसों को ही घर चलाने में योगदान माना जाता है, और नगदी लाने वाले को ही कमाऊ-पूत माना जाता है। घर चलाने वाली महिला के लिए अधिक से अधिक सम्मान के साथ इन दिनों अंग्रेजी में होम-मेकर कह दिया जाता है।
देश में गिनी-चुनी महिलाओं की कामयाबी पर फख्र करना तो अच्छी बात है, लेकिन देश की बाकी महिलाओं के साथ बेइंसाफी खत्म करने के बारे में सोचना उससे कहीं जरूरी है। देश की आधी आबादी को अगर संसद और विधानसभाओं में आरक्षण देने में भी यह देश तंगदिली दिखाता है, और चौथाई सदी से उसे तरह-तरह से टाला जा रहा है, तो इस बारे में भी आज सोचना चाहिए कि भारतीय वायुसेना की लड़ाकू महिला पायलटें युद्ध छिडऩे तक देश के भीतर ही पुरूषप्रधान सोच पर बमबारी क्यों न करें? महिलाओं के साथ होती हिंसा, उन पर जुल्म और उनसे बेइंसाफी पर बमबारी क्यों न करें? देश की दिक्कत यह है कि कुछ गिनी-चुनी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा करने के बाद इस देश में एक ऐसा झांसा खड़ा कर दिया जाता है कि देश में महिलाओं का इतना सम्मान है इसके बाद कुछ गिनी-चुनी महिलाओं की कामयाबी की मिसाल को यह मान लिया जाता है कि देश में महिलाएं आसमान तक पहुंच रही हैं। लेकिन चावल की विशाल हंडी में उबलते दानों में से एक दाना पक जाए, और बाकी तमाम कच्चे पड़े हों, तो उस एक दाने को मिसाल मान लेेना बेइंसाफी को जारी रखने का हथियार भी बन जाता है। महिला अधिकारों की कामयाबी की गिनी-चुनी मिसालों के साथ-साथ देश की आधी आबादी की बाकी तकरीबन पूरी महिलाओं की हालत के बारे में भी सोचना चाहिए। जिस देश में महिलाओं को जन्म के पहले  से छांट-छांटकर मारा जाता है, इससे भी बच निकले तो पैदा होते ही मार दिया जाता है, उससे भी बच निकले तो बचपन से ही बलात्कार और हत्या उसके लिए तैयार रहते हैं, फिर आगे चलकर स्कूल-कॉलेज, और खेल के मैदान पर शोषण राह तकते रहता है, शादी के पहले दहेज, और शादी के बाद दहेज-हत्या, कामकाजी महिला का देह-शोषण, और वृंदावन में विधवा-जीवन, भारत में आम और तकरीबन पूरी महिलाओं की यही कहानी कही जाती है कि नारी तेरी यही कहानी, आंचल में दूध और आंखों में पानी।
भारतीय महिला पायलटों की आज की इस ऐतिहासिक शुरुआत के मौके पर देश में इनका सम्मान तभी हो सकता है, जब सबसे वंचित महिलाओं के हकों पर भी खुली बातचीत हो, और उनके लिए कोई रास्ता निकाला जाए।

भड़काऊ बात करने के पहले सच को परख लेना चाहिए

संपादकीय
17 जून  2016
उत्तरप्रदेश के एक संवेदनशील शहर या कस्बे कैराना को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश की हवा में एक तनाव भरी सनसनी फैलाई गई है, और उसे लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पार्टी बैठे-ठाले एक किनारे में घिर गई है। वहां के बड़बोले भाजपा सांसद ने सैकड़ों हिन्दू परिवारों की एक लिस्ट जारी करके यह आरोप लगाया कि कैराना में मुस्लिमों के आतंक से सैकड़ों हिन्दू परिवार घर छोड़कर, कस्बा छोड़कर जा चुके हैं। बात बहुत गंभीर थी और यह जायज भी था कि इस बात की तुलना तुरंत कश्मीर से आतंकतले भगाए गए पंडितों से की जाती, और वह काम भी शुरू हो गया। ऐसा लगने लगा कि मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की सरकार के राज में एक और कश्मीर बन रहा है। लेकिन मीडिया ने बड़े चौकन्नेपन से जब इन नामों को परखा, तो पता लगा कि सांसद की तकरीबन पूरी लिस्ट ही झूठी थी। और इसके आगे सांसद को भी अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मान लेना पड़ा। हालांकि वे अभी भी और लोगों के नाम ढूंढकर अपने मुद्दे को साबित करने की एक और खोखली कोशिश करते दिख रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी उत्तरप्रदेश में चुनाव तो लडऩे जा रही है, लेकिन अगर उसका अभियान ऐसे झूठ पर टिका रहेगा, जिसे कि दो दिनों के भीतर ही झूठ साबित कर दिया गया, तो इससे नफे के बजाय नुकसान बहुत बड़ा हो रहा है। चूंकि भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव इतने जटिल होते हैं कि यह अंदाज नहीं लगता कि किस वजह से कोई पार्टी या कोई नेता चुनाव जीते हैं या हारे हैं, इसलिए बहुत सी गलतियों को लोग चुनावी नतीजों के बाद भी गलतियां नहीं मानते, और नाकामयाबी का घड़ा फोडऩे के लिए कुछ दूसरे मुद्दों के सिर तलाश लेते हैं। फिर भी हमारी सलाह यह है कि देश के हित से परे भी, समाज की प्राथमिकताओं से परे भी, बुनियादी मुद्दों को छोड़कर भी अगर कोई पार्टी महज चुनावी जीत के हिसाब से कोई हरकत करती है, झूठ बोलती है, तो उसे कम से कम इतनी तैयारी रखनी चाहिए कि उसका झूठ रवाना होने के अगले ही चौराहे पर कपड़े न खो बैठे।
भारत में वैसे भी बहुत सी ताकतें सरहद के पार से भी हो सकता है कि तबाही लाने में लगी हुई हों, और ऐसी तबाही के लिए साम्प्रदायिक तनाव सबसे उम्दा किस्म का पेट्रोल हो सकता है। लेकिन देश का इतिहास ऐसी हरकतों को ठीक से दर्ज करते चलता है। और किसी भी पार्टी के, किसी भी नेता को ऐसी हरकत से बचना चाहिए। हम इसे किसी किस्म की गलती मानने से इंकार करते हैं, हमारा मानना है कि यह गलत काम है, गलती नहीं। और आज मीडिया-सोशल मीडिया की मेहरबानी से झूठ लंबे समय तक टिक नहीं पाता। इसलिए तनाव की बातें करने के पहले लोगों को उन्हें चार बार परख लेना चाहिए। जिस तरह लोग अपने बच्चों का रिश्ता तय करने के पहले चार अलग-अलग जगहों से पता लगा लेते हैं, उसी तरह लोगों को सार्वजनिक जीवन में भी किसी तरह की भड़काऊ बात करने के पहले सच को परख लेना चाहिए।

स्मृति ईरानी, मोदी, उनके साथी और केजरीवाल की भाषा...

संपादकीय
16 जून  2016
भारत के बहुत से असल मुद्दों को हाशिए पर धकेलते हुए इन दिनों भाषा की बहस छिड़ी हुई है। मधुमक्खी के छत्ते की रानी मक्खी की तरह केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी बात-बात पर सार्वजनिक रूप से भड़ककर आए दिन नई मिसालें कायम करते चलती हैं। अभी बिहार के शिक्षा मंत्री से ट्विटर पर हुए एक सवाल-जवाब में जब राज्य के मंत्री ने उन्हें जवाब देते हुए डियर लिखा, तो उन्होंने झिड़कते हुए लिखा कि महिलाओं को कब से डियर कहने लगे? अब सोशल मीडिया पर कुछ कहकर बचना नामुमकिन रहता है इसलिए लोग स्मृति ईरानी को याद दिलाने लगे कि किस तरह पिछले बरसों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ट्विटर पर ही फिल्म अभिनेत्रियों, खिलाडिय़ों जैसी कई महिलाओं को डियर लिख चुके हैं, और खुद स्मृति ईरानी के एक मंत्री की चिट्ठी भी पोस्ट कर दी गई जिसमें उन्होंने स्मृति के लिए डियर लिखा था। यह बहस जितने गैरजरूरी मुद्दे पर शुरू हुई, उस पर हम इस जगह को और खराब न भी करते, अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उपराज्यपाल नजीब जंग को लिखी गई दो चिट्ठियां मीडिया में नहीं आई होतीं।
इन चिट्ठियों ने यह नई बहस छेड़ी है कि राज्यपाल के लिए मुख्यमंत्री की भाषा कैसी होनी चाहिए। अब केजरीवाल और जंग के बीच के सांप-नेवले जैसे मधुर संबंध पहले दिन से अब तक जारी हैं, और दिल्ली को चूंकि पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है इसलिए बाकी राज्यों की तरह वहां राज्य सरकार को सारे हक नहीं हैं, और बहुत से कामों के लिए सरकार को उपराज्यपाल का मुंह देखना पड़ता है। अब यह बात तो केजरीवाल के मिजाज को वैसे भी माकूल नहीं बैठती, और केन्द्रीय गृह मंत्रालय के मातहत काम करने वाले दिल्ली के उपराज्यपाल, और दिल्ली की पुलिस के साथ केजरीवाल का लंबा, स्थायी, और निरंतर टकराव दर्ज हो ही रहा है। ऐसे में जब वे नजीब जंग को लिखकर उसे सार्वजनिक रूप से उजागर करते हैं कि वे कितनी भी चापलूसी कर लें, नरेन्द्र मोदी उन्हें अगला उपराष्ट्रपति नहीं बनाएंगे, तो इसे देखने का एक नजरिया इसे आपत्तिजनक मान सकता है, और दूसरा नजरिया इसे एक ऐसा व्यंग्य मान सकता है, जिसकी जगह सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार की वजह से खत्म नहीं हो सकती। भारतीय राजनीति में ऐसे तंज कसने की लंबी परंपरा रही है, और अक्सर तो होता यह है कि किसी व्यंग्य से परे भी बहुत से नेता महज गाली-गलौज की जुबान में एक-दूसरे के लिए बात करने लगते हैं। लोगों को याद होगा कि बिहार में राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यपाल की शारीरिक दिक्कत को लेकर उनके बारे में सार्वजनिक रूप से लंगड़ा कहकर हिकारत जाहिर की थी। और दूसरे बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर समय-समय पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच कड़वाहट हुई है। चूंकि अरविंद केजरीवाल परंपरागत राजनेता नहीं हैं, और उनका भरोसा शीशे के मछलीघर में रहकर राजनीति करने में है, इसलिए वे हर बात को सार्वजनिक रूप से कहना ठीक और जरूरी दोनों समझते हैं।
अब हमारा ख्याल इस बारे में यह है कि भारतीय संसदीय राजनीति में इस तरह की जुबान नाजायज नहीं है, हो सकता है कि कुछ लोग ऐसी जुबान न बोलते हों, लेकिन  कुछ दूसरे लोग जिन्हें ऐसी जुबान पसंद है, उनको ऐसी जुबान कहने की आजादी रहनी चाहिए, चाहे वे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, या चाहे वे राज्यपाल के लिए ही क्यों न हो। हमारा ख्याल है कि जिस भारतीय लोकतंत्र में लोगों को भयानक साम्प्रदायिक साजिशें करके देश में दंगा फैलाने की पूरी आजादी है, जहां पर महिलाओं को सार्वजनिक रूप से, सोशल मीडिया पर लिखकर सामूहिक बलात्कार की धमकी देने की पूरी आजादी है, वहां पर किसी व्यंग्य को आपत्तिजनक मानना बड़ी अटपटी सोच है। लोगों ने स्मृति ईरानी को यह याद भी दिला दिया है कि उन्हें तो एक राज्य के शिक्षामंत्री के अगर औपचारिक शिष्टाचार के संबोधन डियर लिखने पर आपत्ति है, तो उन्हें अपनी पार्टी के, अपने समर्थकों के उन फतवों पर भी कुछ कहना चाहिए जिनमें सोशल मीडिया की दूसरी महिलाओं को बलात्कार की धमकी देने की रोजाना की आदत है। हमारा ख्याल है कि केजरीवाल ने लोगों को नाराज करने की तो बहुत सी बातें कही और लिखी हैं, लेकिन उन्होंने हिंसा की, साम्प्रदायिकता की, और बलात्कार की धमकी की कोई बात नहीं लिखी है। अरविंद केजरीवाल को अगर उनकी तीखी तेजाबी जुबान के लिए सजा देनी है, तो उसके पहले देश के सैकड़ों दूसरे सांसदों और विधायकों को, मंत्रियों को काले पानी पर अंडमान भेजना होगा, तब अरविंद केजरीवाल को भी अदालत उठने तक की एक दिन की कैद दी जा सकती है। किसी देश की सभ्यता और संस्कृति में टुकड़ा-टुकड़ा इंसाफ नहीं हो सकता, आज जो लोग बिहार के मंत्री पर या अरविंद केजरीवाल पर टूट पड़े हैं, उनको आज की हवा में भी तैर रही दूसरी बातों को भी देखना चाहिए, और उसके बाद पहला पत्थर मारना चाहिए। 

सड़कों के मुजरिमों के साथ कोई रियायत नहीं हो...

संपादकीय
15 जून  2016
छत्तीसगढ़ में आज एकाएक कुछ घंटों के भीतर चारों तरफ से सड़क हादसों की खबरें इस रफ्तार से आईं कि इस घिसे-पिटे मुद्दे पर एक बार फिर लिखने की जरूरत हो रही है। राज्य सरकार का ध्यान राजधानी रायपुर में हेलमेट पर तो गया है, और अब सड़कों पर करीब एक चौथाई दुपहिया चालक हेलमेट लगाए दिखने लगे हैं, लेकिन लोगों की सड़क-जागरूकता अभी भी चालान के डर से परे पूरी तरह गायब है। कारों में सीट बेल्ट पड़े हुए हैं, जिन्हें कोई लगाते नहीं, सड़कों के किनारे अगर जगह खाली भी है, तो भी खड़ी रहने वाली गाडिय़ां किनारे लगाई नहीं जातीं, शराब पीकर गाड़ी चलाने के खतरे रोज सामने आते हैं, लेकिन ट्रक-बस और टैक्सी चलाने वाले नशे में रहते हैं तो भी उन्हें रोकने वाले कोई नहीं। ऐसा भी नहीं कि सरकार के अमले को ऐसी पूरी जांच करने पर चालान से सरकारी-कमाई न होती हो, लेकिन फिर भी यह ढील प्रदेश की संस्कृति बन गई है, और लोगों की जिंदगी की कीमत श्रद्धांजलि जितनी रह गई है।
छत्तीसगढ़ में सड़क हादसों में इतनी अधिक मौतें होती हैं, और हम लगातार यह भी लिखते आ रहे हैं कि इन मौतों से कई गुना अधिक ऐसे मामले रहते हैं जिनमें लोग विकलांग हो जाते हैं, और काम के लायक नहीं बचते हैं। लेकिन उनके आंकड़े सरकार के किसी रिकॉर्ड में नहीं आते, इसलिए लाशों से परे लोगों का ध्यान नहीं जाता। प्रदेश में गाडिय़ां चलाने वाले लोगों की क्षमता, उनकी सेहत और उनकी आंखों का हाल, गाड़ी चलाते समय उनके नशे की कोई जांच, गाड़ी की फिटनेस, आगे-पीछे लाईट, ब्रेक, इन सबका बुरा हाल है। और गाडिय़ां जिस तरह से प्रदूषण फैलाते दिखती हैं, उनसे सीधे तो मौत नहीं होती, लेकिन प्रदेश में गाडिय़ों पर सरकारी निगरानी का हाल उससे जरूर दिखता है।
पुलिस और ट्रांसपोर्ट विभाग, इन दोनों की जिम्मेदारी बंटी हुई भी है, और मिलीजुली भी है। लेकिन दोनों का मिलाजुला काम भी बेअसर दिखता है। यह बात समझ से परे है कि सड़कों पर नियम तोड़कर चलने वाले लोग दूसरों की जान के लिए जब खतरा बने रहते हैं, तो उन पर भी सरकार कड़ाई क्यों नहीं बरतती? सड़कों पर नियमों को तोडऩा दूसरों की जान लेने का काम होता है, और सरकार जब ऐसी रियायत नियम तोडऩे वालों के साथ बरतती है, तो यह लापरवाही और यह मनमानी संक्रामक रोग की तरह बाकी लोगों तक फैलने भी लगती है। यह सिलसिला सरकार को तुरंत खत्म करना चाहिए। आज नौबत यह है कि नई पीढ़ी के जो बच्चे बिना लाइसेंस दुपहिया और चौपहिया चलाना शुरू करते हैं, उनके सामने किसी नियम को मानने की कोई मिसाल नहीं रहती। उनको यह जरूर मालूम रहता है कि नियम तोडऩे से उनका कुछ नहीं बिगडऩा है। ऐसे में बेकसूर लोगों की जिंदगी रोज खत्म हो रही है, और इसकी जिम्मेदारी सीधे-सीधे सरकार पर है।
हमारा मानना है कि सड़कों पर खतरा खड़े करने वाले लोग महज कुछ सौ रूपयों के चालान पाकर छूट जाने के हकदार नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोगों को जनसुरक्षा के लिए खतरा मानकर गिरफ्तार भी किया जाना चाहिए, और ऐसी एक-एक गिरफ्तारी दूसरे हजारों लोगों को जिम्मेदार बनाने का काम भी करेगी। सरकार को कोई हक नहीं है कि सड़कों के मुजरिमों के साथ किसी तरह की रियायत बरते। 

लातें खाकर भी सेंसरबोर्ड अक्ल से कोसों दूर...

संपादकीय
14 जून  2016
नशे में डूबे पंजाब पर बनी एक फिल्म, उड़ता पंजाब, को लेकर सेंसर बोर्ड ने अदालत से अभी इतनी लातें खाई हैं, उनसे बोर्ड के अध्यक्ष, एक बहुत ही औसत और घटिया दर्जे के बम्बईया फिल्मकार पहलाज निहलानी की अक्ल ठिकाने आ जानी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने उन्हें इस महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फजीहत करने के लिए एक बहुत ही ओछा बयान और भी दे दिया कि वे मोदी के चमचे हैं। अब देश में अपने किस्म के काम के लिए इस सबसे बड़े ओहदे पर बैठकर जैसी सस्ती और घटिया बातें वे कर रहे हैं, उस पर मुंबई हाईकोर्ट ने उन्हें पर्याप्त लताड़ लगाई है। लेकिन दूसरी खबर यह आई है कि उड़ता पंजाब के बाद अब एक और फिल्म में सेंसर बोर्ड ने सौ जगह काटने-छांटने को कहा है। यह दूसरी फिल्म गुजरात के पटेल आरक्षण आंदोलन को लेकर बनी है जिसमें इस आंदोलन के नौजवान नेता हार्दिक पटेल को हीरो की तरह दिखाने पर भी सेंसर बोर्ड ने आपत्ति की है।
इन दोनों फिल्मों को देखें तो इनमें सैकड़ों काट-छांट के पीछे एक बात लगती है कि इन दोनों से केंद्र की एनडीए सरकार के भागीदारों को असुविधा हो रही है। पंजाब में नशे की भयानक बुरी हालत के लिए वहां लंबे समय से सत्ता हांक रहे अकाली बाप-बेटे जिम्मेदार माने जाते हैं। और वहां सामने चुनाव भी खड़े हैं, इसलिए प्रधानमंत्री के इस स्वघोषित चमचे ने शायद इसे अपनी जिम्मेदारी समझा हो कि इस फिल्म को तकरीबन रोक ही दिया जाए, ताकि अकाली-सरकार के तहत बदहाली कहानी की शक्ल में भी सामने न आए। इसी तरह गुजरात में हार्दिक पटेल को अगर कोई फिल्म नायक की तरह पेश करती है, तो जाहिर है कि इससे वहां सत्तारूढ़ भाजपा को नीचा देखना पड़ेगा, इसलिए पहलाज निहलानी ने इसे भी पशुओं के चारे की तरह काटकर कतरा-कतरा कर देने की कोशिश की है। जिन लोगों को याद न हो, उनके लिए यहां पर यह जिक्र जरूरी है कि पिछले आम चुनावों के पहले पहलाज निहलानी ने नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार के लिए एक विज्ञापन-फिल्म बनाई थी, और शायद वह फिल्म उनको इस एक सबसे महत्वपूर्ण, और सबसे गैरजरूरी कुर्सी तक पहुंचा गई।
सेंसर बोर्ड को लेकर लंबे समय से देश के कलाकारों और उदार विचारधारा के लोगों के बीच यह सोच चल रही है कि दुनिया के सभ्य और विकसित देशों की तरह भारत से सेंसर बोर्ड को खत्म कर देने की जरूरत है। कुछ दूसरे लोगों का यह मानना है कि सेंसर बोर्ड का अधिकार महज इतना रहना चाहिए कि वह फिल्म देखकर यह तय करे कि वह किस उम्र के दर्शकों के देखने के लायक है, और बस इसी बात का सर्टिफिकेट जारी करे। लेकिन सरकारों में कोई भी पार्टी बैठी रहे, किसी को यह नहीं सुहाता कि अपने हाथ से किसी भी अधिकार को निकलने दे। नतीजा यह होता है कि एक के बाद दूसरी पार्टी सेंसरशिप को जारी रखना जारी रखती है। भारत को अंगे्रजों के वक्त के ऐसे कानूनों से छुटकारा पाने की जरूरत है, सेंसर बोर्ड से ही, और उसके मुखिया के कुर्सी पर बैठाए गए ऐसे स्वघोषित-चमचे से भी।

अमरीकी समलैंगिक क्लब पर आतंकी हमले के सबक

संपादकीय
13 जून  2016
अमरीका के एक समलैंगिक क्लब पर गोलीबारी करके एक मुस्लिम नौजवान ने पचास लोगों को मार डाला है, और बहुत से लोग जख्मी हैं। इसे अमरीका के विश्व व्यापार केंद्र की इमारतों पर विमान टकराकर किए गए आतंकी हमलों के बाद का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जा रहा है। कुछ लोग यह रियायत दे रहे हैं कि यह किसी धार्मिक नफरत या आतंक के लिए नहीं है, बल्कि समलैंगिक लोगों को नापसंद करने की वजह से किया गया हमला है। लेकिन इस हत्यारे नौजवान की पिछली कुछ बातों को लेकर दो बातें सामने आ रही हैं, एक तो यह कि वह परिवार के भीतर हिंसा करने का आदी रहा है, और दूसरी यह कि वह अपने-आपको इस्लामी-आतंकी संगठन आईएस का समर्थक घोषित करते हुए यह हमला कर रहा था। तीसरी बात यह भी है कि जो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा किसी भी हमले को नस्ली या आतंकी मानने के पहले खासा सोच-विचार लेते हैं, उन्होंने इसे अमरीका पर आतंकी हमला कहा है।
आतंक का मतलब सिर्फ किसी धर्म का नाम लेकर किसी धर्म पर हमला करना नहीं है। भारत के पुणे में न्याय और तर्क की बात करने वाले दाभोलकर की हत्या करने वाले हिंदू सनातनी संस्था के लोग आज मोदी सरकार की जांच एजेंसी ने ही, भाजपा शासित महाराष्ट्र के भीतर गिरफ्तार किए हैं। इस मामले में तो मरने वाला प्रगतिशील विचारों का एक कट्टरताविरोधी हिंदू ही था, और हत्यारा तो हिंदू धर्म का झंडा लेकर ही चल रहा था। ऐसे बहुत से मामले हैं, गांधी भी हिंदू थे, और गोडसे भी हिंदू था। पंजाब के आतंक के दिनों में अनगिनत सिख भी सिख-आतंकियों के हाथों मारे गए थे। पाकिस्तान से लेकर टर्की तक, और अफ्रीका से लेकर अमरीका तक ऐसे लाखों मुस्लिम मारे गए हैं जिन्हें इस्लामी आतंक के तहत मुस्लिमों ने ही मारा है। इसलिए धर्म कभी धार्मिक भेदभाव करके लोगों को मारता है, और कई बार वह अपने ही धर्म के लोगों को मारता है।
अमरीका के इस ताजा हत्याकांड के पीछे हम जो एक बात समलैंगिकता से नफरत से परे, धर्म और आतंक की सोच से परे देखते हैं, वह है लोगों का लोकतंत्र और इंसाफ पर से भरोसा उठना। और दुनिया के अलग-अलग बहुत से देशों में, भारत जैसे देश के बहुत से प्रदेशों में यह बात खुलकर सामने आ रही है कि धार्मिक नफरत को लोकतंत्र से ऊपर माना जा रहा है, इंसाफ से ऊपर माना जा रहा है, और लोगों की वैज्ञानिक सोच, उनकी तर्कशक्ति ऐसी नफरत के चलते खत्म होती जा रही है। पाकिस्तान में आए दिन समलैंगिकों, थर्ड जेंडर के लोगों, और बाकी तमाम किस्म के अल्पसंख्यकों की हत्या देखने में आती है। और समलैंगिकों से इसी किस्म की नफरत कल के अमरीका के हमले के पीछे कम से कम एक वजह तो रही ही है। दरअसल धर्म लोगों को दूसरे लोगों की आजादी छीन लेने की एक ऐसी हिंसक समझ देता है जिसके चलते कहीं पर लोग दूसरों के खानपान पर काबू करते हैं, कहीं पर वे दूसरों की उपासना की पद्धति को लेकर उन्हें मार डालते हैं, कहीं वे धार्मिक रीति-रिवाजों के चलते औरतों से बराबरी का हक छीनते हैं, या देते ही नहीं हैं, और इसी किस्म की सौ दूसरी नाइंसाफियां धर्म से जुड़े लोगों की सोच में और उनके हिंसा में सामने आती हैं।
अमरीका एक तरफ तो एक आधुनिक और लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता है, लेकिन दूसरी तरफ वह एक बहुत बड़े खतरे की कगार पर भी खड़ा हुआ है। वहां रिपब्लिकन पार्टी के भावी उम्मीदवार दिख रहे घोर हिंसक और युद्धोन्मादी, अल्पसंख्यकों से नफरत करने वाले डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह पिछले कई महीनों चुनाव प्रचार के दौरान जिस दर्जे की नफरत और हिंसा की बातें की हैं, उनको देखते हुए यह खतरा भी है कि अमरीका और दुनिया भर में बिखरे अमरीकी लोग जवाबी हिंसा के शिकार हो सकते हैं। अमरीका की यह घटना बाकी दुनिया के लिए भी एक सबक बनना चाहिए कि बढ़ाई जाती नफरत, सदियों से चली आ रही नफरत, ये सब किस बड़े दर्जे की हिंसा कर सकती हैं।

संसद-विधानसभा में लोकतंत्र की भावना को पीछे की सीट भी नहीं, बस दर्शकदीर्घा नसीब

संपादकीय
12 जून  2016
देश भर से राज्यसभा चुनाव की खबरों को देखें तो मोटे तौर पर एक बात उभरकर सामने आती है कि तकरीबन सभी पार्टियां बहुत से ऐसे लोगों को टिकटें दे रही हैं जो कि जरूरत पडऩे पर वोटों की खरीद-फरोख्त भी कर सकें। हम यहां एक सांस में तमाम लोगों को बेईमान कहना नहीं चाहते लेकिन कर्नाटक से लेकर हरियाणा तक और उत्तरप्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश तक बड़ी-बड़ी पार्टियों में ऐसे ही लोगों को उम्मीदवार अधिक बनाया, जो कि अरबपति हैं, या सत्ता के दलाल के रूप में जिनकी शोहरत रही हो, और कई राज्यों में वोटों की खुली खरीद-बिक्री भी सामने आई है। कर्नाटक में तो ऐसी खरीद-बिक्री खुफिया कैमरों पर रिकॉर्ड भी हो गई है और इसके बाद चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों के खिलाफ एफआईआर कायम करने भी कहा है।
हरियाणा के बारे में ये खबरें सामने आई हैं कि जी-टीवी के मालिक सुभाष चन्द्रा वहां भाजपा के समर्थन से उम्मीदवार थे, और उनको हराने के लिए एक उद्योगपति नवीन जिंदल ने पूरी ताकत लगा दी थी। वहीं से एक दूसरी क्षेत्रीय पार्टी के समर्थन से आर.के. आनंद नाम के एक ऐसे वकील ने उम्मीदवारी दर्ज कराई थी जो कि दिल्ली में एक मुकदमे में गवाहों की खरीद-बिक्री का सौदा करते हुए खुफिया कैमरे पर कैद भी हो गया था, और जिसे बाद में अदालत से किसी तरह की सजा भी हुई है। ऐसे दोनों अरबपतियों के बीच वहां पर मुकाबला था, और नवीन जिंदल नाम का तीसरा अरबपति हराने में लगा हुआ था। उत्तरप्रदेश में गुजरात से आई हुई एक चर्चित और विवादास्पद अरबपति महिला कारोबारी खड़ी हो गई थी, और उसके दाखिले से इस राज्य के राज्यसभा चुनाव में तगड़ी सौदेबाजी की खबरें आने लगी थीं, लेकिन यह महिला जीत नहीं पाईं। जिन पाठकों को संसद की पूरी जानकारी नहीं है उनके लिए यह बता देना ठीक होगा कि भारतीय संसद में राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है, और उसका दर्जा लोकसभा से ऊपर, अधिक सम्मान का माना जाता है। यह भी माना जाता है कि इस सदन में ऐसे लोगों को लाया जाना चाहिए जो कि आम चुनावों में जीतकर नहीं आ सकते, और जो चुनावी राजनीति से परे के हैं। ऐसे लोग राजनीतिक दलों के भी होते हैं, और गैरराजनीतिक भी होते हैं। पार्टियां भी अपने संगठन से परे के लोगों को भी राज्यसभा में भेजती हैं, और यह माना जाता है कि राज्यसभा में बहस का स्तर ऐसे लोगों की वजह से ऊंचा बने रहेगा। यह एक और बात है कि अब विजय माल्या जैसे लोग राज्यसभा के सदस्य हैं, और भी बहुत से अरबपति-खरबपति कारोबारी बिना किसी सार्वजनिक योगदान के, और बहुत से मामलों में तो बिना किसी राजनीतिक संबंध के भी, पार्टियों की मदद से, निर्दलीय वोटों को खरीदकर, पार्टियों के अतिरिक्त वोटों को खरीदकर राज्यसभा में पहुंच जाते हैं।
दूसरी तरफ इस देश में लोकसभा से लेकर विधानसभाओं तक में पहुंचने वाले लोगों में करोड़पति-अरबपति बढ़ते चल रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि गरीबों के मुद्दों की समझ भी अब सदनों के भीतर घटती चल रही है। सदनों में अब तकरीबन सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने भूख और गरीबी को कभी देखा नहीं है, बेरोजगारी को कभी भुगता नहीं है, और जिन्होंने देश की जमीनी हकीकत को छुआ नहीं है। देश की राजनीतिक पार्टियां संसद के उच्च सदन में अच्छे लोगों को भेजने या न भेजने को लेकर पूरी तरह बेशर्म हो गई हैं, और लोकतंत्र की भावना संसद-विधानसभाओं में पीछे की सीट भी नहीं पा रही है, शायद दर्शकदीर्घा में जाकर उसे बैठना पड़ रहा है। फिर आज की बाजार व्यवस्था और भाजपा-कांग्रेस से परे भी दलित पार्टी, समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों का बाजारू और कारोबारी रूख मिलकर इन सदनों की सीटों को बिक्री और नीलामी के लायक बना रहे हैं। ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि देश में जिन वजहों से नक्सल-आंदोलन शुरू हुआ, चल रहा है, उन मुद्दों की कोई भी समझ देश-प्रदेश के सदनों में अब न रह जाए।
भारत जैसे लोकतंत्र में अब लोकतंत्र का एक अघोषित स्तंभ, मीडिया पूरी तरह से बड़ा कारोबार बन गया है, और बड़े कारोबारियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण में है। फिर संसद और सरकार इन पर भी पैसों की पकड़ है। ऐसे में एक अकेली अदालत ऐसी है जो कि कभी-कभी सरकारी काम में दखल दे पाती है, प्रधानमंत्री की मौजूदगी में बेबसी के आंसू बहाती है, जो इस बात पर रोना रोती है कि किस तरह महंगे और चतुर वकील इंसाफ को पटरी से उतार देते हैं, और जो इस सरकारी तोहमत को भी झेलती है कि अदालतों को सरकार में दखल नहीं देना चाहिए। ऐसे लोकतंत्र में संसद से उम्मीद कल के राज्यसभा चुनावी नतीजों के बाद और खत्म हो गई है।

...तो फिर ऐसे मीडिया का अस्तित्व कहां रह जाएगा?

संपादकीय
11 जून  2016
फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर खान को लेकर पिछले कई दिनों से मीडिया में ये खबरें तैर रही हैं कि वे खुशखबरी देने वाली हैं, और  मां बनने वाली हैं। जब कुछ दिन गुजर गए, तो करीना ने ऐसे मीडिया की विश्वसनीयता की धज्जी उड़ाते हुए कहा कि हां, खुशखबरी है कि लंदन में मेरे पांच बच्चे हैं और मैंने उनको छुपाकर रखा है। इंटरनेट पर अपने वेब पेज के हिट बढ़वाने के लिए देश के बड़े नामी-गिरामी अखबार भी सनसनीखेज, झांसा देने वाली, धोखेबाज सुर्खियां लगाकर तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करते हैं ताकि उन पर लोग पहुंचें, और कुछ देर वहां ठहरें। इंटरनेट का मीडिया ऐसा है कि जिस पर पहुंचने वाले लोगों की गिनती विज्ञापनदाता घर बैठे कर लेते हैं, और डिजिटल मीडिया का ऑनलाईन कारोबार इसी पर टिका रहता है कि उनके पन्नों को, खबरों और तस्वीरों को कितने लोग देखते हैं।
प्रिंट मीडिया के कारोबार में भी अखबारों के बीच एक गलाकाट मुकाबला चलते रहता है, लेकिन फिर भी एक अखबार के भीतर किस पन्ने को कितने लोग देखते हैं, किस समाचार या विचार को कितने लोग पढ़ते हैं, यह छपे हुए अखबार में गिना नहीं जा सकता है। दूसरी तरफ इंटरनेट पर तो जैसे ही किसी पन्ने या खबर, तस्वीर, वीडियो पर क्लिक किया जाता है, खुद वेबसाइट वालों को पता लग जाता है, और विज्ञापन देने वालों को भी। नतीजा यह होता है कि देश के सबसे बड़े अखबार के इंटरनेट संस्करण पर भी किसी अभिनेत्री के खुले बदन को और भी खुली सुर्खी लगाकर पेश किया जाता है- हे भगवान, इसका सीना दिख रहा है...।
बाजार में अपने को बेचने के लिए देह बेचने वाली महिला को वेश्या कहकर गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जबकि वह महज अपनी खुद की देह बेचती है, और किसी दूसरे की देह की तस्वीर नहीं, किसी दूसरे की देह की खबर नहीं। लेकिन आज देश के बड़े-बड़े मीडिया-कारोबारी ऐसे वीडियो से भरे हुए हैं जिनमें वे बिकिनी पहनी एक लड़की का वीडियो दिखा रहे हैं कि वह अमिताभ बच्चन की नातिन है। साथ-साथ यह दावा भी आखिर में लिख देते हैं कि वे इस वीडियो में दिख रही लड़की की पहचान की जिम्मेदारी नहीं लेते। मीडिया का यह कारोबार देह के धंधे से अधिक घटिया है। देह के धंधे में कोई महिला महज अपनी देह पेश करती है, और आज के सबसे नामी-गिरामी मीडिया-कारोबारी रात-दिन मेहनत करके दूसरों की देह की तस्वीरें और वीडियो ढूंढते हैं, और जब ऐसी तस्वीर नहीं भी मिल पाती, तो फिर वे शब्दों से एक झूठ गढ़ते हैं कि कौन सी अभिनेत्री मां बनने वाली है, या किसी और की देह का क्या हाल है।
एक दूसरी दिक्कत यह है कि देश का प्रिंट मीडिया भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या ऑनलाइन मीडिया को देख-देखकर एक हड़बड़ी में जीता है, और एक हीनभावना में भी जीता है। उसे यह समझ नहीं पड़ता कि अपने विज्ञापनदाता को इंटरनेट की तरफ जाने से कैसे रोके। ऐसे में बड़े-बड़े अखबार भी अपने इंटरनेट एडिशन ऐसे झूठ और ऐसी सनसनी से, ऐसी नग्नता और ऐसी अश्लीलता से भर देते हैं, जिसे कि वे खुद अपने पन्नों पर न छापें। इस तरह मीडिया के भीतर भी प्रिंट और ऑनलाइन के बीच जिस तरह का मुकाबला चल रहा है, उसमें एक अखबार के भीतर प्रिंट वालों को अधिक खर्च करके घाटा देने वाला, और डिजिटल वालों को कम खर्च में फायदा देने वाला भविष्य माना जा रहा है। ऐसा भी माना जा रहा है कि आने वाले कुछ बरसों में छपा हुआ अखबार घाटे की वजह से कम होते चलेगा, और उसी अखबार के ऑनलाइन संस्करण की कमाई बढ़ती चलेगी। ऑनलाइन संस्करण इंटरनेट पर रहने की वजह से इंटरनेट का अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीका बेझिझक इस्तेमाल कर लेते हैं, और वहां पर कोई भी चीज न तो अश्लील है, न हिंसक है, न आपत्तिजनक है।
अब एक सवाल यह बचता है कि आने वाले दिनों में मीडिया की गंभीरता, उसकी ईमानदारी, उसकी सामाजिक जवाबदेही, उसके नीति-सिद्धांत पर क्लिक करने वाले लोग बचेंगे या नहीं? और अगर इन बातों की कोई कद्र नहीं रह जाएगी, तो फिर ऐसे मीडिया का अस्तित्व कहां रह जाएगा? 

छत्तीसगढ़ की राजनीति के इस बरमूडा-त्रिकोण में जरूरत एक और पार्टी की...

संपादकीय
10 जून  2016
छत्तीसगढ़ की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और भाजपा-सरकार दोनों के मजे दिख रहे हैं। पिछले खासे अरसे से कांग्रेस नेता अजीत जोगी, और बाकी की कांग्रेस पार्टी एक-दूसरे के पीछे लगे हुए थे, और दोनों तबकों की खासी ताकत एक-दूसरे पर खर्च हो रही थी। अब जोगी के कांग्रेस से निकलने के बाद भी ये दोनों तबके एक-दूसरे को अपना दुश्मन नंबर एक मानकर चल रहे हैं, और अगर चुनाव में इन दोनों की प्राथमिकता यही रही, तो फिर डॉ. रमन सिंह की पार्टी की चौथी पारी भी आ सकती है। लेकिन सांप-नेवले की इस लड़ाई के चलते छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र की जो बदहाली हो रही है, वह प्रदेश के लिए नुकसानदेह है।
देश हो या कोई भी प्रदेश हो, वहां पर अगर राजनीति या राजनीतिक कटुता इस कदर हावी हो जाती हैं कि लोग जनहित के मुद्दों पर आपस में बात न कर सकें, तो इसका नुकसान हमने बार-बार विधानसभाओं से लेकर संसद तक देखा है। छत्तीसगढ़ एक ऐसी ही कटुता को झेलते आ रहा है जिसमें कांग्रेस पार्टी के अब तक के दो हिस्सों के बीच दुश्मनी ने पार्टी को सरकार बनाने से रोक ही दिया था। अब जोगी कांग्रेस के बाहर हुए हैं, तो भी कांग्रेस और जोगी एक-दूसरे से उबर नहीं पा रहे हैं, और भाजपा अगले चुनाव में अपनी जीत को लेकर एक बार फिर उम्मीद से है। लेकिन इस बरमूडा-त्रिकोण में राज्य के हित डूबे चले जा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि छत्तीसगढ़ में मानो राजनीति के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं है, राजनीति से परे कोई काम नहीं है, और सरकार की कोई कमियां या खामियां नहीं हैं। यह सिलसिला किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बड़े नफे का होता है, और भारतीय जनता पार्टी अगले चुनाव में छत्तीसगढ़ की पुरानी राजनीतिक शोहरत के मुताबिक कांग्रेस और भूतपूर्व कांग्रेसी की इस तनातनी को बढ़ाने के लिए आग में ट्रकों से घी झोंकने के लिए बड़े उत्साह में रहेगी।
ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी तीसरी पार्टी के बाद अब एक चौथी पार्टी की और जरूरत हो गई है जो कि राज्य की जनता की बात कर सके। हो सकता है कि आम आदमी पार्टी के लोग इस वैचारिक-आंदोलनकारी कमी को पूरा कर सकें, और हो सकता है कि उनका वामपंथियों, बसपा के लोगों, के साथ किसी तरह का तालमेल हो सके। हम यह तालमेल किसी चुनावी जीत के हिसाब से नहीं कह रहे हैं, हो सकता है कि चुनाव के मैदान में ये लोग कहीं न टिकें, लेकिन लोकतंत्र महज चुनाव नहीं होता, लोकतंत्र बहुत से मुद्दों को जनता के बीच रखने और जनता के राजनीतिक शिक्षण का काम भी होता है। जैसे मीडिया के भीतर कुछ चैनल या कुछ अखबार सबसे अधिक बिकने वाले होते हैं, लेकिन हर देश में कुछ ऐसे छोटे अखबार या कम देखे जाने वाले चैनल होते हैं, जिनकी बात का असर अधिक होता है, और मीडिया का ऐसा हिस्सा अधिक खुलकर मुद्दों को उठा पाता है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में हम मुद्दों को उठाने वाले ऐसे ही लोगों की जरूरत देख रहे हैं जो कि कांग्रेस, भाजपा, और जोगी की आत्मकेन्द्रित राजनीति जैसी राजनीति में न उलझकर केवल जनता के मुद्दों पर काम करे।

अमरीकी संसद में गालियों को तालियों में तब्दील करते मोदी

संपादकीय
9 जून  2016
अमरीकी संसद के एक संयुक्त अधिवेशन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुनना बड़ा दिलचस्प था। यह कार्यक्रम अपने आपमें देखने और सुनने लायक तो था ही, इस कार्यक्रम के पहले के ऐतिहासिक संदर्भों को देखें, तो यह और महत्वपूर्ण लग रहा था। यह वही अमरीकी संसद है जहां के लोगों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का 2002 के दंगों के बाद लगातार विरोध किया था, और अमरीका आने का वीजा भी नहीं मिलने दिया था। आज भी मोदी का वीजा एक व्यक्ति के रूप में नहीं बना है, एक देश के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें मिला है, और यह ओहदे से जुड़ा हुआ विशेषाधिकार है। भारत में धार्मिक स्वतंत्रता न होने की बात कहते हुए अमरीका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने मोदी का वीजा रोककर रखा था, और इतने बरस वे अमरीका जा नहीं पाए थे। नतीजा यह है कि अपने दो बरस पूरे होते-होते प्रधानमंत्री मोदी आधा दर्जन बार अमरीकी राष्ट्रपति से मिल आए हैं।
अमरीकी संसद में उनका भाषण एक गजब के आत्मविश्वास से भरा हुआ था। हमने पहले भी इसी जगह उनके बारे में लिखा है कि जिस नरेन्द्र मोदी ने पूरी जिंदगी कभी केन्द्र सरकार में काम नहीं किया, भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की कोई जानकारी जिन्हें नहीं थी, जिन्होंने खुद अपनी पार्टी के केन्द्रीय संगठन में कभी ऐसे ओहदे पर काम नहीं किया था जिससे कि विदेशी संबंधों के बारे में कुछ समझने का मौका मिले, वे नरेन्द्र मोदी बिजली कड़कने की रफ्तार से दो बरस के भीतर तीन दर्जन से ज्यादा देशों में हो आए हैं, और अमरीकी राष्ट्रपति को बराक कहकर बुलाने जैसी दोस्ती कायम कर चुके हैं। जिस आत्मविश्वास से उन्होंने अमरीकी संसद में भाषण दिया वह देखने लायक था। अंग्रेजी कभी भी उनकी भाषा नहीं रही, और वे चाहते तो वहां हिन्दी में बोल सकते थे। लेकिन उन्होंने शायद लिखा हुआ अंग्रेजी भाषण टेलीप्रॉम्टर पर पढ़कर इस अंदाज में अमरीकी संसद को सुनाया कि टीवी पर देखने वालों को पल भर को भी यह नहीं लगा कि वे पढ़ रहे हैं। हम उनकी कही हुई बातों पर अधिक चर्चा इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि वे तकरीबन उम्मीद के मुताबिक ही थीं, और उन्होंने भारत के बारे में सच से परे भी कुछ ऐसे दावे किए जिनके बारे में अमरीका में सबको यह मालूम है कि भारत में ऐसी बराबरी नहीं है। फिर भी एक देश का प्रधानमंत्री बाहर जाकर अपनी सरकारतले की बदहाली गिनाएगा नहीं।
भारत में बहुत से लोग इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर मोदी पर हमला कर रहे हैं कि उनकी अंग्रेजी के कई हिज्जे बहुत खराब थे। हम इस बात को मोदी की एक खूबी मानते हैं कि वे एक नई भाषा को सीखने का कोई अंतरराष्ट्रीय मौका नहीं छोड़ रहे हैं, और उनका यह भरोसा देखने लायक है कि वे अंग्रेजी व्याकरण के शिक्षक नहीं हैं, एक कामयाब जननेता हैं, और अंग्रेजी उनकी मातृभाषा नहीं है, वे उसे सीख रहे हैं। यह आत्मविश्वास जिंदगी में और लोगों को, आम लोगों को भी इस्तेमाल करना चाहिए जो यह मानकर चलते हैं कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कहना, या कमजोर उच्चारण में किसी भाषा को कहने से अच्छा है कि उसका इस्तेमाल न करें। मोदी लगातार अपने आपको एक बड़े नेता के रूप में कम से कम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो स्थापित कर ही रहे हैं। उनके बर्ताव में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों में प्रचलित औपचारिकता से परे एक बेतकल्लुफी दिखाई पड़ती है और इसी वजह से दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुखों से उनके निजी संबंध बनते जा रहे हैं।
हम आज यहां पर उनकी विदेश नीति से देश को अब तक हुए, या आगे होते दिख रहे नफे-नुकसान का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, लेकिन मोदी ने दुनिया के साथ भारत के संबंधों को एक किस्म से मथकर रख दिया है। और यह बात इसलिए बड़ी हैरान करने वाली है कि मोदी का ऐसे विदेशी मोर्चे से कभी कोई लेना-देना नहीं था। आज भारत की विदेश नीति के विश्लेषकों का यह मानना है कि मोदी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में खतरे की हद तक रोमांचक दांव लगा रहे हैं, और उनके इन दो बरसों के कार्यकाल की सबसे बड़ी कामयाबी यही मोर्चा रहा है। उनके कुछ घरेलू आलोचक यह भी कहते हैं कि तीन बरस बाद के आम चुनाव में अंतरराष्ट्रीय संबंध मोदी को राष्ट्रीय वोट नहीं दिला पाएंगे, लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत के टीवी-दर्शक मतदाताओं का एक बड़ा तबका विदेश यात्राओं में मोदी का माहौल देखकर बड़ा प्रभावित है और यह असर चुनाव तक जारी और कायम रह सकता है। फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं है कि मोदी के विदेश प्रवासों से भारत का कोई नुकसान हुआ हो, और यह भी है कि जितने वक्त वे दूसरे देशों में व्यस्त रहते हैं, केन्द्र सरकार के मंत्रियों और अफसरों को चैन से सोने का मौका भी मिलता है।
फिलहाल अमरीकी संसद में मोदी के भाषण को बड़ी गर्मजोशी से सुना गया, और उस पर वहां की परंपरा के मुताबिक जमकर तालियां भी बजीं। किसी तरह का प्रतीकात्मक विरोध भी मोदी को गुजरात दंगों को लेकर नहीं झेलना पड़ा, और यह बात भी एक छोटी-मोटी कूटनीतिक कामयाबी ही है। जिस अमरीकी संसद में मोदी को गालियां दी जाती थीं, वहां उन्हें अब तालियां मिलीं, यह एक बड़ा अनोखा नजारा था। राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल का यह शायद मोदी का आखिरी अमरीका प्रवास था, और अगले बरस आने वाले नए अमरीकी राष्ट्रपति के सामने दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की एक नींव रहेगी, जिसे अनदेखा करना उसके लिए आसान नहीं रहेगा। 

एम्बुलेंस हड़ताल से बाहर रखना सरकार का जिम्मा

संपादकीय
8 जून  2016
छत्तीसगढ़ के गांव-शहर सभी जगह रात-दिन दौड़ते दिखने वाली हजारों एम्बुलेंस खड़ी हैं, क्योंकि उनके ड्राइवर और कर्मचारी हड़ताल पर हैं। राज्य सरकार ने एम्बुलेंस सेवा निजी कंपनियों के हवाले कर दी है, और उसका भुगतान करती है। इन निजी कंपनियों के खिलाफ कर्मचारियों की हड़ताल चल रही है, लेकिन सरकार का यह ढांचा चूंकि अब पूरी तरह इन्हीं पर टिक गया है, इसलिए चारों तरफ किसी न किसी की मौत एम्बुलेंस के बिना हो रही है। कहीं नवजात शिशु की निजी गाड़ी में मौत हो रही है, तो कहीं सड़कों पर लोग दम तोड़ते पड़े हैं, और एम्बुलेंस नहीं है।
राज्य सरकार को इस बारे में इसलिए सोचना पड़ेगा कि फायर ब्रिगेड, पुलिस, और एम्बुलेंस जैसी सेवाएं सरकार जिस तरह चाहे उस तरह चलाए, लेकिन इनमें हड़ताल की गुंजाइश नहीं रखी जा सकती। अभी कुछ बरस पहले तक सरकारी एम्बुलेंस ही रहती थीं, लेकिन अब सरकार ने अपनी इस जिम्मेदारी का पूरी तरह निजीकरण कर दिया है, और खुद महज भुगतान कर रही है। अब तक यह इंतजाम कामयाबी से चल रहा था, यह एक अलग बात है कि बीच-बीच में यह सुनाई पड़ता था कि सरकारी अस्पतालों में ले जाने के बजाय एम्बुलेंस कर्मचारी मरीजों और घायलों को निजी अस्पतालों की तरफ मोड़ रहे थे। निजीकरण के साथ ऐसे खतरे बढ़ते ही हैं, और जब बड़े-बड़े लोग भ्रष्टाचार में लगे हों, तब महज एम्बुलेंस कर्मचारियों से ईमानदारी की उम्मीद करना कुछ ज्यादती भी होगी।
लेकिन आज का मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं है, यह आपात सेवाओं का मुद्दा है, जिसमें हड़ताल की गुंजाइश नहीं रखी जा सकती। मध्यप्रदेश में राज्य सरकार ने पुलिस की गाडिय़ों का भी निजीकरण कर दिया है, और वहां सड़कों पर आम पुलिस दस्ते भी किराए की चमचमाती महंगी एसयूवी में दिखते हैं। अब कल को अगर ऐसी गाडिय़ों के कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएं, और जनता को पुलिस न मिल पाए तो क्या होगा? इसी तरह कल के दिन सरकार फायर ब्रिगेड का निजीकरण कर दे, और आग की नौबत में कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएं, तो क्या होगा? इसलिए अनिवार्य सेवाओं, आपात सेवाओं का निजीकरण करने के साथ-साथ यह इंतजाम भी पुख्ता रखना होगा कि ऐसी किसी हड़ताल से जनता की मौत न आ जाए। हमारा ख्याल तो यह है कि सरकार जब ऐसी आपात सेवाओं का निजीकरण करती है, तो उस निजी कंपनी के कर्मचारियों के काम की शर्तों पर भी सरकार का एक सीधा काबू रहना चाहिए, और सरकार इनके हक का भुगतान सीधे इनके खातों में करने का हक अपने पास रखे। ऐसे इंतजाम कई जगहों पर होते भी हैं जहां ठेका लेने वाली कंपनी कर्मचारियों को भुगतान नहीं करती है। आज भी सरकार के बहुत से विभागों में ठेकेदारों से यह जानकारी मांगी जाती है कि वे मजदूर और कर्मचारी कानूनों के मुताबिक प्रॉविडेंट फंड, कर्मचारी बीमा जैसी जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं या नहीं? इसके बाद ही उनका भुगतान होता है। हम अभी इन कर्मचारियों की हड़ताल की बारीकियों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन एम्बुलेंस सेवा को हड़ताल के खतरे से बाहर रखने का पुख्ता इंतजाम राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

होनहार का हक छीनने वाले सस्ती सजा में न छूटा करें

संपादकीय
7 जून  2016
बिहार में स्कूल के आखिरी इम्तिहान के बोर्ड की मेरिट लिस्ट में सबसे ऊपर आए हुए एक लड़के और एक लड़की के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की गई है। इन दोनों को जब मीडिया ने इंटरव्यू किया तो इन्हें अपने विषयों की जानकारी भी नहीं थी, और नाम भी नहीं मालूम थे। ऐसे में सरकार ने जांच करवाई तो पता लगा कि घपला करके इन दोनों को मेरिट में अव्वल लाया गया था। अब सरकार इनके, स्कूलों के, और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, और उनका रिजल्ट रद्द कर दिया गया है।
सवाल यह उठता है कि जो नीतीश कुमार बिहार से भ्रष्टाचार घटाने के नाम पर  सत्ता पर लौटकर आए थे, वहां पर ऐसा संगठित अपराध फिर कैसे होने लगा, जिसमें होनहार बच्चों का हक छीनकर ताकतवर मां-बाप अपने जाहिर तौर पर कमअक्ल बच्चों को मेरिट में अव्वल ला रहे हैं? देश की एक सामान्य जनधारणा को देखें तो बहुत से लोग यह मान रहे होंगे कि लालू यादव के सरकार में आ जाने के बाद अब ईमानदारी की गुंजाइश नीतीश सरकार में बचेगी भी कैसे? यह कुछ उसी तरह की बात है कि मनमोहन सिंह तो एक सज्जन प्रधानमंत्री माने जाते थे, लेकिन उनके मंत्रिमंडल में एक से बढ़कर एक मुजरिम मंत्री थे जो कि अव्वल दर्जे के संगठित भ्रष्टाचार में लगे हुए थे, और मनमौन सिंह यह सब देखते हुए चुप्पी साधे रखते थे। यूपीए-2 सरकार का कार्यकाल ऐसा था जिसमें प्रधानमंत्री को छोड़ बाकी तमाम देश को मंत्रियों के भ्रष्टाचार मालूम थे, और दिख रहे थे। ऐसी अनदेखी करने के लिए मनमोहन सिंह की जगह जेल छोड़ और कुछ नहीं हो सकती थी, लेकिन उनकी साख उनको अब तक बचा ले गई है, लेकिन आगे क्या होगा यह तो वक्त ही बताएगा।
फिलहाल हम भ्रष्टाचार के घिसे-पिटे मुद्दे पर एक बार और नहीं लिख रहे हैं, हम पढ़ाई में होने वाले घोटाले को लेकर बात करना चाहते हैं क्योंकि इसी बिहार की वे तस्वीरें दुनिया भर में कुख्यात हैं जिनमें नकल करवाने के लिए दर्जनों लोग इमारत पर बाहर से चढ़कर अपने लोगों की मदद कर रहे हैं। और अकेले बिहार की क्यों बात करें, मध्यप्रदेश में इतना बड़ा व्यापम घोटाला हुआ है जिसमें लाखों होनहार बच्चों के हक छीनकर राजनीति और पैसों की ताकत रखने वाले उन चुनिंदा सैकड़ों लोगों को मेडिकल दाखिला दिया गया जो कि आज अदालती निगरानी में चल रही जांच में फंसे हुए हैं। छत्तीसगढ़ में इतना बड़ा न सही, लेकिन छोटा-मोटा पीएमटी-पर्चा आउट होने की जांच चल ही रही है।
हमारा ख्याल है कि होनहार और मेहनतकश बच्चों का हक छीनने में जो बड़े लोग लगे रहते हैं, वैसे ताकतवर-बालिग लोगों के लिए अधिक बड़ी सजा का इंतजाम किया जाना चाहिए। ऐसा न होने पर लोकतंत्र और न्याय पर से लोगों को भरोसा उठते जा रहा है, और लोग सरकार के खिलाफ एक हिकारत और नफरत पाल चुके हैं कि कोई भी काम ईमानदारी से होता नहीं है, और ईमानदार का कोई हक रहता नहीं है। देश के लिए ऐसी नौबत बहुत ही शर्मनाक है, और भारत का अगर यही हाल रहा तो दुनिया भर में मेड-इन-इंडिया डिग्री की भी कोई इज्जत नहीं रहेगी, और ऐसी डिग्री तक पहुंचने वाले लोग भी देश के सबसे होनहार बच्चे नहीं रहेंगे।

बहुमत की असहमति रहते हुए भी अल्पमत के विचार पर विचार

6 जून 2016

स्विटरजरलैंड कल एक जनमतसंग्रह हुआ जिसमें लोगों से पूछा गया कि क्या हर नागरिक को जिंदा रहने के लिए जरूरी मदद सरकार की तरफ से की जाए ताकि वे कोई काम करना चाहें तो करें, या बिना काम किए भी रह सकें। ऐसी सोच के पीछे वे लोग थे जो यह सोचते हैं कि बहुत से लोग जिंदा रहने की मजबूरी अपनी पसंद के काम नहीं कर पाते और समाज में अपनी सबसे बड़ी खूबियों के मुताबिक योगदान नहीं कर पाते।
दुनिया के सबसे संपन्न देशों में से एक स्विटजरलैंड में योरप के बाकी कुछ देशों की तरह अब मशीनें बहुत सा काम करने लगी हैं, और लोग एक तरफ तो हफ्ते में काम के दिन घटाने में लगे हैं, और दूसरी तरफ रोजगार भी घटते चले जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था को देखें तो उसकी उत्पादकता में मशीनों का योगदान बढ़ते चल रहा है, और मशीनें कमा रही हैं, और इंसान खा रहे हैं, ऐसे एक दिन की तरफ विकसित और औद्योगिक दुनिया बढ़ती चल रही है।
इसलिए स्विटजरलैंड में कुछ लोगों ने यह राय सामने रखी थी कि सरकार अगर सबको बराबरी से एक न्यूनतम रिहायशी भत्ता देगी, तो लोग अपनी पसंद के काम कर सकेंगे। लेकिन स्विटजरलैंड की सरकार और वहां की सारी राजनीतिक पार्टियां इसके खिलाफ थीं, और लोगों से अपील की गई थी कि इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट डालें, नतीजा यह निकला कि यह प्रस्ताव खारिज ही हो गया। इस प्रस्ताव को कुछ लोगों ने एक कम्युनिस्ट या माक्र्सवादी सोच बताया।
यह बात सही है कि ऐसे एक न्यूनतम और बराबर गुजारा-भत्ते की सोच माक्र्सवादी लगती है ताकि समाज में हर कोई कम से कम एक न्यूनतम कमाई तो पा ही ले, और फिर जिंदा रहने के दबाव से परे जाकर अपनी मर्जी का काम कर सके। आज हम अपने आसपास देखते हैं कि बहुत से लोग सामाजिक मोर्चों पर काम करना चाहते हैं, राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेना चाहते हैं, पर्यावरण या पशु-पक्षियों के लिए कुछ करना चाहते हैं, कला या संगीत में जीना चाहते हैं, लेकिन जिंदा रहने की जरूरतें उन्हें काम के लिए मजबूर करती हैं, ऐसे कामों के लिए, जिनसे कि कमाई हो सके।
दुनिया के इतिहास में हिप्पियों सहित बहुत से ऐसे समुदाय रहे जिन्होंने समय-समय पर अपने कम्यून बनाए, और उनके भीतर वे बराबरी से रहे। अभी पिछले बरस ही पश्चिमी दुनिया में किसी जगह ऐसी ही एक कम्यून की तस्वीरों सहित रिपोर्ट आई थी, और उसमें शामिल होने के लिए हजारों लोग कतार में लगे हुए हैं यह बात भी उस रिपोर्ट में थी। लेकिन ऐसे कम्यून कई बार किसी एक आध्यात्मिक या किसी और तरह के गुरू के मातहत रहने और जीने वाले लोगों का एक जमावड़ा बनकर रह जाता है जहां पर उन्मुक्त सेक्स भी कभी-कभी एक जीवनशैली रहता है, और कभी-कभी ऐसे कम्यून तलवार के ढांचे को कुचलकर बनते हैं जहां पर सभी का बराबरी का हक हो, और जहां होने वाले बच्चों की सभी पर बराबर की जिम्मेदारी हो।
दिक्कत यह है कि ऐसे कम्यून के भीतर अधिकारों और जिम्मेदारियों का जो ढांचा रहता है, वह उसके देश के नियम-कायदों से मेल नहीं खाता, और किसी टकराव की हालत में ऐसे कम्यून के भीतर की व्यवस्था कानून की नजर में कोई दर्जा नहीं रहती। लोगों ने अभी चार दिन पहले ही भारत के उत्तरप्रदेश में मथुरा में एक ऐसे समुदाय से जुड़ी तबाही देखी है जो कि एक मुखिया के मातहत देश-प्रदेश के कानूनों को चुनौती देते हुए अपने आपमें एक साम्राज्य की तरह जी रहा था, और जिसने कानून पर बुरी तरह हमला भी किया।
यह कम्यून की बात स्विटजरलैंड के ताजा जनमतसंग्रह से कुछ अलग किस्म की भी है, लेकिन जब बराबरी के दर्जे की बात आती है, तो जिस तरह के कम्यून माक्र्सवादी विचारधारा को मानते हुए भी बनते और चलते हैं, वे भी बराबरी की कमाई की सोच पर टिके रहते हैं। इसलिए अगर किसी देश में संपन्नता या अतिसंपन्नता के चलते देश को ही एक ऐसा कम्यून बनाने की सोच उठी है जहां पर कि हर किसी को जिंदगी चलाने के न्यूनतम खर्चे सरकार की तरफ से दिए जाएं ताकि वे अपनी पसंद का काम कर सकें, तो यह बात भी बराबरी पर आधारित एक समुदाय की सोच है, जिसे कि स्विस नागरिकों ने सिरे से ही नकार दिया।
इस सोच का दूसरा पहलू यह है कि सरकार जनता के न्यूनतम खर्चों का बोझ उठाए। सोच का इतना हिस्सा तो भारत में जगह-जगह देखने मिलता है। केन्द्र सरकार भी गरीबों के लिए सौ किस्म की अलग-अलग रियायतें देती है, और राज्य सरकारें भी अपने खजाने से गरीबों की मदद करती हैं। इस मामले में एक तरफ तो तमिलनाडू जैसे राज्य सबसे आगे है जहां मुख्यमंत्री जयललिता हर किसी को लगभग मुफ्त रियायती खाना देती हैं, रियायती पानी, रियायती दवाएं, और मुफ्त के मंगलसूत्र जैसी कई और चीजें भी। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में करीब आधी आबादी को सरकार एक दिन की मजदूरी से भी कम पर पूरे परिवार का महीने भर का चावल देती है, मुफ्त की बिजली, मुफ्त की साइकिलें, और पढ़ाई का इंतजाम भी छत्तीसगढ़ में है, और देश के कई दूसरे राज्यों में भी।
लेकिन भारत जैसे देश में सरकारी रियायतें आमतौर पर गरीबों के जिंदा रहने के लिए मदद हैं। एक संपन्न दुनिया में लोगों को जिंदा रहने की कमाई हासिल रहने पर भी उन्हें एक बराबरी का गुजारा-भत्ता देना एक अलग सोच है कि वे अपनी मर्जी के काम कर सकें। भारत में आज ऐसी सोच के बारे में सोचना कुछ मुश्किल है क्योंकि अधिकतर लोग जिंदगी के एक संघर्ष में लगे हैं, और यहां पर मशीनों ने अभी इंसानों को राहत देना, या बेरोजगार करना उस हद तक शुरू नहीं किया है। फिर देश की संपन्नता अभी ऐसे किसी किनारे पर पहुंची भी नहीं है कि तमाम लोगों को जिंदा रहने के लिए कोई भत्ता दिया जा सके।
लेकिन स्विटजरलैंड में एक तबके की यह सोच और उस पर जनमतसंग्रह से यह तो पता लगता है कि बहुमत की असहमति रहते हुए भी अल्पमत के विचार पर विचार करना भी कितना महत्वपूर्ण माना जाता है।