छत्तीसगढ़ की राजनीति के इस बरमूडा-त्रिकोण में जरूरत एक और पार्टी की...

संपादकीय
10 जून  2016
छत्तीसगढ़ की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और भाजपा-सरकार दोनों के मजे दिख रहे हैं। पिछले खासे अरसे से कांग्रेस नेता अजीत जोगी, और बाकी की कांग्रेस पार्टी एक-दूसरे के पीछे लगे हुए थे, और दोनों तबकों की खासी ताकत एक-दूसरे पर खर्च हो रही थी। अब जोगी के कांग्रेस से निकलने के बाद भी ये दोनों तबके एक-दूसरे को अपना दुश्मन नंबर एक मानकर चल रहे हैं, और अगर चुनाव में इन दोनों की प्राथमिकता यही रही, तो फिर डॉ. रमन सिंह की पार्टी की चौथी पारी भी आ सकती है। लेकिन सांप-नेवले की इस लड़ाई के चलते छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र की जो बदहाली हो रही है, वह प्रदेश के लिए नुकसानदेह है।
देश हो या कोई भी प्रदेश हो, वहां पर अगर राजनीति या राजनीतिक कटुता इस कदर हावी हो जाती हैं कि लोग जनहित के मुद्दों पर आपस में बात न कर सकें, तो इसका नुकसान हमने बार-बार विधानसभाओं से लेकर संसद तक देखा है। छत्तीसगढ़ एक ऐसी ही कटुता को झेलते आ रहा है जिसमें कांग्रेस पार्टी के अब तक के दो हिस्सों के बीच दुश्मनी ने पार्टी को सरकार बनाने से रोक ही दिया था। अब जोगी कांग्रेस के बाहर हुए हैं, तो भी कांग्रेस और जोगी एक-दूसरे से उबर नहीं पा रहे हैं, और भाजपा अगले चुनाव में अपनी जीत को लेकर एक बार फिर उम्मीद से है। लेकिन इस बरमूडा-त्रिकोण में राज्य के हित डूबे चले जा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि छत्तीसगढ़ में मानो राजनीति के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं है, राजनीति से परे कोई काम नहीं है, और सरकार की कोई कमियां या खामियां नहीं हैं। यह सिलसिला किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बड़े नफे का होता है, और भारतीय जनता पार्टी अगले चुनाव में छत्तीसगढ़ की पुरानी राजनीतिक शोहरत के मुताबिक कांग्रेस और भूतपूर्व कांग्रेसी की इस तनातनी को बढ़ाने के लिए आग में ट्रकों से घी झोंकने के लिए बड़े उत्साह में रहेगी।
ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी तीसरी पार्टी के बाद अब एक चौथी पार्टी की और जरूरत हो गई है जो कि राज्य की जनता की बात कर सके। हो सकता है कि आम आदमी पार्टी के लोग इस वैचारिक-आंदोलनकारी कमी को पूरा कर सकें, और हो सकता है कि उनका वामपंथियों, बसपा के लोगों, के साथ किसी तरह का तालमेल हो सके। हम यह तालमेल किसी चुनावी जीत के हिसाब से नहीं कह रहे हैं, हो सकता है कि चुनाव के मैदान में ये लोग कहीं न टिकें, लेकिन लोकतंत्र महज चुनाव नहीं होता, लोकतंत्र बहुत से मुद्दों को जनता के बीच रखने और जनता के राजनीतिक शिक्षण का काम भी होता है। जैसे मीडिया के भीतर कुछ चैनल या कुछ अखबार सबसे अधिक बिकने वाले होते हैं, लेकिन हर देश में कुछ ऐसे छोटे अखबार या कम देखे जाने वाले चैनल होते हैं, जिनकी बात का असर अधिक होता है, और मीडिया का ऐसा हिस्सा अधिक खुलकर मुद्दों को उठा पाता है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में हम मुद्दों को उठाने वाले ऐसे ही लोगों की जरूरत देख रहे हैं जो कि कांग्रेस, भाजपा, और जोगी की आत्मकेन्द्रित राजनीति जैसी राजनीति में न उलझकर केवल जनता के मुद्दों पर काम करे।

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