...तो फिर ऐसे मीडिया का अस्तित्व कहां रह जाएगा?

संपादकीय
11 जून  2016
फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर खान को लेकर पिछले कई दिनों से मीडिया में ये खबरें तैर रही हैं कि वे खुशखबरी देने वाली हैं, और  मां बनने वाली हैं। जब कुछ दिन गुजर गए, तो करीना ने ऐसे मीडिया की विश्वसनीयता की धज्जी उड़ाते हुए कहा कि हां, खुशखबरी है कि लंदन में मेरे पांच बच्चे हैं और मैंने उनको छुपाकर रखा है। इंटरनेट पर अपने वेब पेज के हिट बढ़वाने के लिए देश के बड़े नामी-गिरामी अखबार भी सनसनीखेज, झांसा देने वाली, धोखेबाज सुर्खियां लगाकर तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करते हैं ताकि उन पर लोग पहुंचें, और कुछ देर वहां ठहरें। इंटरनेट का मीडिया ऐसा है कि जिस पर पहुंचने वाले लोगों की गिनती विज्ञापनदाता घर बैठे कर लेते हैं, और डिजिटल मीडिया का ऑनलाईन कारोबार इसी पर टिका रहता है कि उनके पन्नों को, खबरों और तस्वीरों को कितने लोग देखते हैं।
प्रिंट मीडिया के कारोबार में भी अखबारों के बीच एक गलाकाट मुकाबला चलते रहता है, लेकिन फिर भी एक अखबार के भीतर किस पन्ने को कितने लोग देखते हैं, किस समाचार या विचार को कितने लोग पढ़ते हैं, यह छपे हुए अखबार में गिना नहीं जा सकता है। दूसरी तरफ इंटरनेट पर तो जैसे ही किसी पन्ने या खबर, तस्वीर, वीडियो पर क्लिक किया जाता है, खुद वेबसाइट वालों को पता लग जाता है, और विज्ञापन देने वालों को भी। नतीजा यह होता है कि देश के सबसे बड़े अखबार के इंटरनेट संस्करण पर भी किसी अभिनेत्री के खुले बदन को और भी खुली सुर्खी लगाकर पेश किया जाता है- हे भगवान, इसका सीना दिख रहा है...।
बाजार में अपने को बेचने के लिए देह बेचने वाली महिला को वेश्या कहकर गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जबकि वह महज अपनी खुद की देह बेचती है, और किसी दूसरे की देह की तस्वीर नहीं, किसी दूसरे की देह की खबर नहीं। लेकिन आज देश के बड़े-बड़े मीडिया-कारोबारी ऐसे वीडियो से भरे हुए हैं जिनमें वे बिकिनी पहनी एक लड़की का वीडियो दिखा रहे हैं कि वह अमिताभ बच्चन की नातिन है। साथ-साथ यह दावा भी आखिर में लिख देते हैं कि वे इस वीडियो में दिख रही लड़की की पहचान की जिम्मेदारी नहीं लेते। मीडिया का यह कारोबार देह के धंधे से अधिक घटिया है। देह के धंधे में कोई महिला महज अपनी देह पेश करती है, और आज के सबसे नामी-गिरामी मीडिया-कारोबारी रात-दिन मेहनत करके दूसरों की देह की तस्वीरें और वीडियो ढूंढते हैं, और जब ऐसी तस्वीर नहीं भी मिल पाती, तो फिर वे शब्दों से एक झूठ गढ़ते हैं कि कौन सी अभिनेत्री मां बनने वाली है, या किसी और की देह का क्या हाल है।
एक दूसरी दिक्कत यह है कि देश का प्रिंट मीडिया भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या ऑनलाइन मीडिया को देख-देखकर एक हड़बड़ी में जीता है, और एक हीनभावना में भी जीता है। उसे यह समझ नहीं पड़ता कि अपने विज्ञापनदाता को इंटरनेट की तरफ जाने से कैसे रोके। ऐसे में बड़े-बड़े अखबार भी अपने इंटरनेट एडिशन ऐसे झूठ और ऐसी सनसनी से, ऐसी नग्नता और ऐसी अश्लीलता से भर देते हैं, जिसे कि वे खुद अपने पन्नों पर न छापें। इस तरह मीडिया के भीतर भी प्रिंट और ऑनलाइन के बीच जिस तरह का मुकाबला चल रहा है, उसमें एक अखबार के भीतर प्रिंट वालों को अधिक खर्च करके घाटा देने वाला, और डिजिटल वालों को कम खर्च में फायदा देने वाला भविष्य माना जा रहा है। ऐसा भी माना जा रहा है कि आने वाले कुछ बरसों में छपा हुआ अखबार घाटे की वजह से कम होते चलेगा, और उसी अखबार के ऑनलाइन संस्करण की कमाई बढ़ती चलेगी। ऑनलाइन संस्करण इंटरनेट पर रहने की वजह से इंटरनेट का अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीका बेझिझक इस्तेमाल कर लेते हैं, और वहां पर कोई भी चीज न तो अश्लील है, न हिंसक है, न आपत्तिजनक है।
अब एक सवाल यह बचता है कि आने वाले दिनों में मीडिया की गंभीरता, उसकी ईमानदारी, उसकी सामाजिक जवाबदेही, उसके नीति-सिद्धांत पर क्लिक करने वाले लोग बचेंगे या नहीं? और अगर इन बातों की कोई कद्र नहीं रह जाएगी, तो फिर ऐसे मीडिया का अस्तित्व कहां रह जाएगा? 

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