संसद-विधानसभा में लोकतंत्र की भावना को पीछे की सीट भी नहीं, बस दर्शकदीर्घा नसीब

संपादकीय
12 जून  2016
देश भर से राज्यसभा चुनाव की खबरों को देखें तो मोटे तौर पर एक बात उभरकर सामने आती है कि तकरीबन सभी पार्टियां बहुत से ऐसे लोगों को टिकटें दे रही हैं जो कि जरूरत पडऩे पर वोटों की खरीद-फरोख्त भी कर सकें। हम यहां एक सांस में तमाम लोगों को बेईमान कहना नहीं चाहते लेकिन कर्नाटक से लेकर हरियाणा तक और उत्तरप्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश तक बड़ी-बड़ी पार्टियों में ऐसे ही लोगों को उम्मीदवार अधिक बनाया, जो कि अरबपति हैं, या सत्ता के दलाल के रूप में जिनकी शोहरत रही हो, और कई राज्यों में वोटों की खुली खरीद-बिक्री भी सामने आई है। कर्नाटक में तो ऐसी खरीद-बिक्री खुफिया कैमरों पर रिकॉर्ड भी हो गई है और इसके बाद चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों के खिलाफ एफआईआर कायम करने भी कहा है।
हरियाणा के बारे में ये खबरें सामने आई हैं कि जी-टीवी के मालिक सुभाष चन्द्रा वहां भाजपा के समर्थन से उम्मीदवार थे, और उनको हराने के लिए एक उद्योगपति नवीन जिंदल ने पूरी ताकत लगा दी थी। वहीं से एक दूसरी क्षेत्रीय पार्टी के समर्थन से आर.के. आनंद नाम के एक ऐसे वकील ने उम्मीदवारी दर्ज कराई थी जो कि दिल्ली में एक मुकदमे में गवाहों की खरीद-बिक्री का सौदा करते हुए खुफिया कैमरे पर कैद भी हो गया था, और जिसे बाद में अदालत से किसी तरह की सजा भी हुई है। ऐसे दोनों अरबपतियों के बीच वहां पर मुकाबला था, और नवीन जिंदल नाम का तीसरा अरबपति हराने में लगा हुआ था। उत्तरप्रदेश में गुजरात से आई हुई एक चर्चित और विवादास्पद अरबपति महिला कारोबारी खड़ी हो गई थी, और उसके दाखिले से इस राज्य के राज्यसभा चुनाव में तगड़ी सौदेबाजी की खबरें आने लगी थीं, लेकिन यह महिला जीत नहीं पाईं। जिन पाठकों को संसद की पूरी जानकारी नहीं है उनके लिए यह बता देना ठीक होगा कि भारतीय संसद में राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है, और उसका दर्जा लोकसभा से ऊपर, अधिक सम्मान का माना जाता है। यह भी माना जाता है कि इस सदन में ऐसे लोगों को लाया जाना चाहिए जो कि आम चुनावों में जीतकर नहीं आ सकते, और जो चुनावी राजनीति से परे के हैं। ऐसे लोग राजनीतिक दलों के भी होते हैं, और गैरराजनीतिक भी होते हैं। पार्टियां भी अपने संगठन से परे के लोगों को भी राज्यसभा में भेजती हैं, और यह माना जाता है कि राज्यसभा में बहस का स्तर ऐसे लोगों की वजह से ऊंचा बने रहेगा। यह एक और बात है कि अब विजय माल्या जैसे लोग राज्यसभा के सदस्य हैं, और भी बहुत से अरबपति-खरबपति कारोबारी बिना किसी सार्वजनिक योगदान के, और बहुत से मामलों में तो बिना किसी राजनीतिक संबंध के भी, पार्टियों की मदद से, निर्दलीय वोटों को खरीदकर, पार्टियों के अतिरिक्त वोटों को खरीदकर राज्यसभा में पहुंच जाते हैं।
दूसरी तरफ इस देश में लोकसभा से लेकर विधानसभाओं तक में पहुंचने वाले लोगों में करोड़पति-अरबपति बढ़ते चल रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि गरीबों के मुद्दों की समझ भी अब सदनों के भीतर घटती चल रही है। सदनों में अब तकरीबन सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने भूख और गरीबी को कभी देखा नहीं है, बेरोजगारी को कभी भुगता नहीं है, और जिन्होंने देश की जमीनी हकीकत को छुआ नहीं है। देश की राजनीतिक पार्टियां संसद के उच्च सदन में अच्छे लोगों को भेजने या न भेजने को लेकर पूरी तरह बेशर्म हो गई हैं, और लोकतंत्र की भावना संसद-विधानसभाओं में पीछे की सीट भी नहीं पा रही है, शायद दर्शकदीर्घा में जाकर उसे बैठना पड़ रहा है। फिर आज की बाजार व्यवस्था और भाजपा-कांग्रेस से परे भी दलित पार्टी, समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों का बाजारू और कारोबारी रूख मिलकर इन सदनों की सीटों को बिक्री और नीलामी के लायक बना रहे हैं। ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि देश में जिन वजहों से नक्सल-आंदोलन शुरू हुआ, चल रहा है, उन मुद्दों की कोई भी समझ देश-प्रदेश के सदनों में अब न रह जाए।
भारत जैसे लोकतंत्र में अब लोकतंत्र का एक अघोषित स्तंभ, मीडिया पूरी तरह से बड़ा कारोबार बन गया है, और बड़े कारोबारियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण में है। फिर संसद और सरकार इन पर भी पैसों की पकड़ है। ऐसे में एक अकेली अदालत ऐसी है जो कि कभी-कभी सरकारी काम में दखल दे पाती है, प्रधानमंत्री की मौजूदगी में बेबसी के आंसू बहाती है, जो इस बात पर रोना रोती है कि किस तरह महंगे और चतुर वकील इंसाफ को पटरी से उतार देते हैं, और जो इस सरकारी तोहमत को भी झेलती है कि अदालतों को सरकार में दखल नहीं देना चाहिए। ऐसे लोकतंत्र में संसद से उम्मीद कल के राज्यसभा चुनावी नतीजों के बाद और खत्म हो गई है।

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