अमरीकी समलैंगिक क्लब पर आतंकी हमले के सबक

संपादकीय
13 जून  2016
अमरीका के एक समलैंगिक क्लब पर गोलीबारी करके एक मुस्लिम नौजवान ने पचास लोगों को मार डाला है, और बहुत से लोग जख्मी हैं। इसे अमरीका के विश्व व्यापार केंद्र की इमारतों पर विमान टकराकर किए गए आतंकी हमलों के बाद का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जा रहा है। कुछ लोग यह रियायत दे रहे हैं कि यह किसी धार्मिक नफरत या आतंक के लिए नहीं है, बल्कि समलैंगिक लोगों को नापसंद करने की वजह से किया गया हमला है। लेकिन इस हत्यारे नौजवान की पिछली कुछ बातों को लेकर दो बातें सामने आ रही हैं, एक तो यह कि वह परिवार के भीतर हिंसा करने का आदी रहा है, और दूसरी यह कि वह अपने-आपको इस्लामी-आतंकी संगठन आईएस का समर्थक घोषित करते हुए यह हमला कर रहा था। तीसरी बात यह भी है कि जो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा किसी भी हमले को नस्ली या आतंकी मानने के पहले खासा सोच-विचार लेते हैं, उन्होंने इसे अमरीका पर आतंकी हमला कहा है।
आतंक का मतलब सिर्फ किसी धर्म का नाम लेकर किसी धर्म पर हमला करना नहीं है। भारत के पुणे में न्याय और तर्क की बात करने वाले दाभोलकर की हत्या करने वाले हिंदू सनातनी संस्था के लोग आज मोदी सरकार की जांच एजेंसी ने ही, भाजपा शासित महाराष्ट्र के भीतर गिरफ्तार किए हैं। इस मामले में तो मरने वाला प्रगतिशील विचारों का एक कट्टरताविरोधी हिंदू ही था, और हत्यारा तो हिंदू धर्म का झंडा लेकर ही चल रहा था। ऐसे बहुत से मामले हैं, गांधी भी हिंदू थे, और गोडसे भी हिंदू था। पंजाब के आतंक के दिनों में अनगिनत सिख भी सिख-आतंकियों के हाथों मारे गए थे। पाकिस्तान से लेकर टर्की तक, और अफ्रीका से लेकर अमरीका तक ऐसे लाखों मुस्लिम मारे गए हैं जिन्हें इस्लामी आतंक के तहत मुस्लिमों ने ही मारा है। इसलिए धर्म कभी धार्मिक भेदभाव करके लोगों को मारता है, और कई बार वह अपने ही धर्म के लोगों को मारता है।
अमरीका के इस ताजा हत्याकांड के पीछे हम जो एक बात समलैंगिकता से नफरत से परे, धर्म और आतंक की सोच से परे देखते हैं, वह है लोगों का लोकतंत्र और इंसाफ पर से भरोसा उठना। और दुनिया के अलग-अलग बहुत से देशों में, भारत जैसे देश के बहुत से प्रदेशों में यह बात खुलकर सामने आ रही है कि धार्मिक नफरत को लोकतंत्र से ऊपर माना जा रहा है, इंसाफ से ऊपर माना जा रहा है, और लोगों की वैज्ञानिक सोच, उनकी तर्कशक्ति ऐसी नफरत के चलते खत्म होती जा रही है। पाकिस्तान में आए दिन समलैंगिकों, थर्ड जेंडर के लोगों, और बाकी तमाम किस्म के अल्पसंख्यकों की हत्या देखने में आती है। और समलैंगिकों से इसी किस्म की नफरत कल के अमरीका के हमले के पीछे कम से कम एक वजह तो रही ही है। दरअसल धर्म लोगों को दूसरे लोगों की आजादी छीन लेने की एक ऐसी हिंसक समझ देता है जिसके चलते कहीं पर लोग दूसरों के खानपान पर काबू करते हैं, कहीं पर वे दूसरों की उपासना की पद्धति को लेकर उन्हें मार डालते हैं, कहीं वे धार्मिक रीति-रिवाजों के चलते औरतों से बराबरी का हक छीनते हैं, या देते ही नहीं हैं, और इसी किस्म की सौ दूसरी नाइंसाफियां धर्म से जुड़े लोगों की सोच में और उनके हिंसा में सामने आती हैं।
अमरीका एक तरफ तो एक आधुनिक और लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता है, लेकिन दूसरी तरफ वह एक बहुत बड़े खतरे की कगार पर भी खड़ा हुआ है। वहां रिपब्लिकन पार्टी के भावी उम्मीदवार दिख रहे घोर हिंसक और युद्धोन्मादी, अल्पसंख्यकों से नफरत करने वाले डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह पिछले कई महीनों चुनाव प्रचार के दौरान जिस दर्जे की नफरत और हिंसा की बातें की हैं, उनको देखते हुए यह खतरा भी है कि अमरीका और दुनिया भर में बिखरे अमरीकी लोग जवाबी हिंसा के शिकार हो सकते हैं। अमरीका की यह घटना बाकी दुनिया के लिए भी एक सबक बनना चाहिए कि बढ़ाई जाती नफरत, सदियों से चली आ रही नफरत, ये सब किस बड़े दर्जे की हिंसा कर सकती हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें