लातें खाकर भी सेंसरबोर्ड अक्ल से कोसों दूर...

संपादकीय
14 जून  2016
नशे में डूबे पंजाब पर बनी एक फिल्म, उड़ता पंजाब, को लेकर सेंसर बोर्ड ने अदालत से अभी इतनी लातें खाई हैं, उनसे बोर्ड के अध्यक्ष, एक बहुत ही औसत और घटिया दर्जे के बम्बईया फिल्मकार पहलाज निहलानी की अक्ल ठिकाने आ जानी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने उन्हें इस महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फजीहत करने के लिए एक बहुत ही ओछा बयान और भी दे दिया कि वे मोदी के चमचे हैं। अब देश में अपने किस्म के काम के लिए इस सबसे बड़े ओहदे पर बैठकर जैसी सस्ती और घटिया बातें वे कर रहे हैं, उस पर मुंबई हाईकोर्ट ने उन्हें पर्याप्त लताड़ लगाई है। लेकिन दूसरी खबर यह आई है कि उड़ता पंजाब के बाद अब एक और फिल्म में सेंसर बोर्ड ने सौ जगह काटने-छांटने को कहा है। यह दूसरी फिल्म गुजरात के पटेल आरक्षण आंदोलन को लेकर बनी है जिसमें इस आंदोलन के नौजवान नेता हार्दिक पटेल को हीरो की तरह दिखाने पर भी सेंसर बोर्ड ने आपत्ति की है।
इन दोनों फिल्मों को देखें तो इनमें सैकड़ों काट-छांट के पीछे एक बात लगती है कि इन दोनों से केंद्र की एनडीए सरकार के भागीदारों को असुविधा हो रही है। पंजाब में नशे की भयानक बुरी हालत के लिए वहां लंबे समय से सत्ता हांक रहे अकाली बाप-बेटे जिम्मेदार माने जाते हैं। और वहां सामने चुनाव भी खड़े हैं, इसलिए प्रधानमंत्री के इस स्वघोषित चमचे ने शायद इसे अपनी जिम्मेदारी समझा हो कि इस फिल्म को तकरीबन रोक ही दिया जाए, ताकि अकाली-सरकार के तहत बदहाली कहानी की शक्ल में भी सामने न आए। इसी तरह गुजरात में हार्दिक पटेल को अगर कोई फिल्म नायक की तरह पेश करती है, तो जाहिर है कि इससे वहां सत्तारूढ़ भाजपा को नीचा देखना पड़ेगा, इसलिए पहलाज निहलानी ने इसे भी पशुओं के चारे की तरह काटकर कतरा-कतरा कर देने की कोशिश की है। जिन लोगों को याद न हो, उनके लिए यहां पर यह जिक्र जरूरी है कि पिछले आम चुनावों के पहले पहलाज निहलानी ने नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार के लिए एक विज्ञापन-फिल्म बनाई थी, और शायद वह फिल्म उनको इस एक सबसे महत्वपूर्ण, और सबसे गैरजरूरी कुर्सी तक पहुंचा गई।
सेंसर बोर्ड को लेकर लंबे समय से देश के कलाकारों और उदार विचारधारा के लोगों के बीच यह सोच चल रही है कि दुनिया के सभ्य और विकसित देशों की तरह भारत से सेंसर बोर्ड को खत्म कर देने की जरूरत है। कुछ दूसरे लोगों का यह मानना है कि सेंसर बोर्ड का अधिकार महज इतना रहना चाहिए कि वह फिल्म देखकर यह तय करे कि वह किस उम्र के दर्शकों के देखने के लायक है, और बस इसी बात का सर्टिफिकेट जारी करे। लेकिन सरकारों में कोई भी पार्टी बैठी रहे, किसी को यह नहीं सुहाता कि अपने हाथ से किसी भी अधिकार को निकलने दे। नतीजा यह होता है कि एक के बाद दूसरी पार्टी सेंसरशिप को जारी रखना जारी रखती है। भारत को अंगे्रजों के वक्त के ऐसे कानूनों से छुटकारा पाने की जरूरत है, सेंसर बोर्ड से ही, और उसके मुखिया के कुर्सी पर बैठाए गए ऐसे स्वघोषित-चमचे से भी।

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