सड़कों के मुजरिमों के साथ कोई रियायत नहीं हो...

संपादकीय
15 जून  2016
छत्तीसगढ़ में आज एकाएक कुछ घंटों के भीतर चारों तरफ से सड़क हादसों की खबरें इस रफ्तार से आईं कि इस घिसे-पिटे मुद्दे पर एक बार फिर लिखने की जरूरत हो रही है। राज्य सरकार का ध्यान राजधानी रायपुर में हेलमेट पर तो गया है, और अब सड़कों पर करीब एक चौथाई दुपहिया चालक हेलमेट लगाए दिखने लगे हैं, लेकिन लोगों की सड़क-जागरूकता अभी भी चालान के डर से परे पूरी तरह गायब है। कारों में सीट बेल्ट पड़े हुए हैं, जिन्हें कोई लगाते नहीं, सड़कों के किनारे अगर जगह खाली भी है, तो भी खड़ी रहने वाली गाडिय़ां किनारे लगाई नहीं जातीं, शराब पीकर गाड़ी चलाने के खतरे रोज सामने आते हैं, लेकिन ट्रक-बस और टैक्सी चलाने वाले नशे में रहते हैं तो भी उन्हें रोकने वाले कोई नहीं। ऐसा भी नहीं कि सरकार के अमले को ऐसी पूरी जांच करने पर चालान से सरकारी-कमाई न होती हो, लेकिन फिर भी यह ढील प्रदेश की संस्कृति बन गई है, और लोगों की जिंदगी की कीमत श्रद्धांजलि जितनी रह गई है।
छत्तीसगढ़ में सड़क हादसों में इतनी अधिक मौतें होती हैं, और हम लगातार यह भी लिखते आ रहे हैं कि इन मौतों से कई गुना अधिक ऐसे मामले रहते हैं जिनमें लोग विकलांग हो जाते हैं, और काम के लायक नहीं बचते हैं। लेकिन उनके आंकड़े सरकार के किसी रिकॉर्ड में नहीं आते, इसलिए लाशों से परे लोगों का ध्यान नहीं जाता। प्रदेश में गाडिय़ां चलाने वाले लोगों की क्षमता, उनकी सेहत और उनकी आंखों का हाल, गाड़ी चलाते समय उनके नशे की कोई जांच, गाड़ी की फिटनेस, आगे-पीछे लाईट, ब्रेक, इन सबका बुरा हाल है। और गाडिय़ां जिस तरह से प्रदूषण फैलाते दिखती हैं, उनसे सीधे तो मौत नहीं होती, लेकिन प्रदेश में गाडिय़ों पर सरकारी निगरानी का हाल उससे जरूर दिखता है।
पुलिस और ट्रांसपोर्ट विभाग, इन दोनों की जिम्मेदारी बंटी हुई भी है, और मिलीजुली भी है। लेकिन दोनों का मिलाजुला काम भी बेअसर दिखता है। यह बात समझ से परे है कि सड़कों पर नियम तोड़कर चलने वाले लोग दूसरों की जान के लिए जब खतरा बने रहते हैं, तो उन पर भी सरकार कड़ाई क्यों नहीं बरतती? सड़कों पर नियमों को तोडऩा दूसरों की जान लेने का काम होता है, और सरकार जब ऐसी रियायत नियम तोडऩे वालों के साथ बरतती है, तो यह लापरवाही और यह मनमानी संक्रामक रोग की तरह बाकी लोगों तक फैलने भी लगती है। यह सिलसिला सरकार को तुरंत खत्म करना चाहिए। आज नौबत यह है कि नई पीढ़ी के जो बच्चे बिना लाइसेंस दुपहिया और चौपहिया चलाना शुरू करते हैं, उनके सामने किसी नियम को मानने की कोई मिसाल नहीं रहती। उनको यह जरूर मालूम रहता है कि नियम तोडऩे से उनका कुछ नहीं बिगडऩा है। ऐसे में बेकसूर लोगों की जिंदगी रोज खत्म हो रही है, और इसकी जिम्मेदारी सीधे-सीधे सरकार पर है।
हमारा मानना है कि सड़कों पर खतरा खड़े करने वाले लोग महज कुछ सौ रूपयों के चालान पाकर छूट जाने के हकदार नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोगों को जनसुरक्षा के लिए खतरा मानकर गिरफ्तार भी किया जाना चाहिए, और ऐसी एक-एक गिरफ्तारी दूसरे हजारों लोगों को जिम्मेदार बनाने का काम भी करेगी। सरकार को कोई हक नहीं है कि सड़कों के मुजरिमों के साथ किसी तरह की रियायत बरते। 

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