स्मृति ईरानी, मोदी, उनके साथी और केजरीवाल की भाषा...

संपादकीय
16 जून  2016
भारत के बहुत से असल मुद्दों को हाशिए पर धकेलते हुए इन दिनों भाषा की बहस छिड़ी हुई है। मधुमक्खी के छत्ते की रानी मक्खी की तरह केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी बात-बात पर सार्वजनिक रूप से भड़ककर आए दिन नई मिसालें कायम करते चलती हैं। अभी बिहार के शिक्षा मंत्री से ट्विटर पर हुए एक सवाल-जवाब में जब राज्य के मंत्री ने उन्हें जवाब देते हुए डियर लिखा, तो उन्होंने झिड़कते हुए लिखा कि महिलाओं को कब से डियर कहने लगे? अब सोशल मीडिया पर कुछ कहकर बचना नामुमकिन रहता है इसलिए लोग स्मृति ईरानी को याद दिलाने लगे कि किस तरह पिछले बरसों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ट्विटर पर ही फिल्म अभिनेत्रियों, खिलाडिय़ों जैसी कई महिलाओं को डियर लिख चुके हैं, और खुद स्मृति ईरानी के एक मंत्री की चिट्ठी भी पोस्ट कर दी गई जिसमें उन्होंने स्मृति के लिए डियर लिखा था। यह बहस जितने गैरजरूरी मुद्दे पर शुरू हुई, उस पर हम इस जगह को और खराब न भी करते, अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उपराज्यपाल नजीब जंग को लिखी गई दो चिट्ठियां मीडिया में नहीं आई होतीं।
इन चिट्ठियों ने यह नई बहस छेड़ी है कि राज्यपाल के लिए मुख्यमंत्री की भाषा कैसी होनी चाहिए। अब केजरीवाल और जंग के बीच के सांप-नेवले जैसे मधुर संबंध पहले दिन से अब तक जारी हैं, और दिल्ली को चूंकि पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है इसलिए बाकी राज्यों की तरह वहां राज्य सरकार को सारे हक नहीं हैं, और बहुत से कामों के लिए सरकार को उपराज्यपाल का मुंह देखना पड़ता है। अब यह बात तो केजरीवाल के मिजाज को वैसे भी माकूल नहीं बैठती, और केन्द्रीय गृह मंत्रालय के मातहत काम करने वाले दिल्ली के उपराज्यपाल, और दिल्ली की पुलिस के साथ केजरीवाल का लंबा, स्थायी, और निरंतर टकराव दर्ज हो ही रहा है। ऐसे में जब वे नजीब जंग को लिखकर उसे सार्वजनिक रूप से उजागर करते हैं कि वे कितनी भी चापलूसी कर लें, नरेन्द्र मोदी उन्हें अगला उपराष्ट्रपति नहीं बनाएंगे, तो इसे देखने का एक नजरिया इसे आपत्तिजनक मान सकता है, और दूसरा नजरिया इसे एक ऐसा व्यंग्य मान सकता है, जिसकी जगह सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार की वजह से खत्म नहीं हो सकती। भारतीय राजनीति में ऐसे तंज कसने की लंबी परंपरा रही है, और अक्सर तो होता यह है कि किसी व्यंग्य से परे भी बहुत से नेता महज गाली-गलौज की जुबान में एक-दूसरे के लिए बात करने लगते हैं। लोगों को याद होगा कि बिहार में राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यपाल की शारीरिक दिक्कत को लेकर उनके बारे में सार्वजनिक रूप से लंगड़ा कहकर हिकारत जाहिर की थी। और दूसरे बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर समय-समय पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच कड़वाहट हुई है। चूंकि अरविंद केजरीवाल परंपरागत राजनेता नहीं हैं, और उनका भरोसा शीशे के मछलीघर में रहकर राजनीति करने में है, इसलिए वे हर बात को सार्वजनिक रूप से कहना ठीक और जरूरी दोनों समझते हैं।
अब हमारा ख्याल इस बारे में यह है कि भारतीय संसदीय राजनीति में इस तरह की जुबान नाजायज नहीं है, हो सकता है कि कुछ लोग ऐसी जुबान न बोलते हों, लेकिन  कुछ दूसरे लोग जिन्हें ऐसी जुबान पसंद है, उनको ऐसी जुबान कहने की आजादी रहनी चाहिए, चाहे वे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, या चाहे वे राज्यपाल के लिए ही क्यों न हो। हमारा ख्याल है कि जिस भारतीय लोकतंत्र में लोगों को भयानक साम्प्रदायिक साजिशें करके देश में दंगा फैलाने की पूरी आजादी है, जहां पर महिलाओं को सार्वजनिक रूप से, सोशल मीडिया पर लिखकर सामूहिक बलात्कार की धमकी देने की पूरी आजादी है, वहां पर किसी व्यंग्य को आपत्तिजनक मानना बड़ी अटपटी सोच है। लोगों ने स्मृति ईरानी को यह याद भी दिला दिया है कि उन्हें तो एक राज्य के शिक्षामंत्री के अगर औपचारिक शिष्टाचार के संबोधन डियर लिखने पर आपत्ति है, तो उन्हें अपनी पार्टी के, अपने समर्थकों के उन फतवों पर भी कुछ कहना चाहिए जिनमें सोशल मीडिया की दूसरी महिलाओं को बलात्कार की धमकी देने की रोजाना की आदत है। हमारा ख्याल है कि केजरीवाल ने लोगों को नाराज करने की तो बहुत सी बातें कही और लिखी हैं, लेकिन उन्होंने हिंसा की, साम्प्रदायिकता की, और बलात्कार की धमकी की कोई बात नहीं लिखी है। अरविंद केजरीवाल को अगर उनकी तीखी तेजाबी जुबान के लिए सजा देनी है, तो उसके पहले देश के सैकड़ों दूसरे सांसदों और विधायकों को, मंत्रियों को काले पानी पर अंडमान भेजना होगा, तब अरविंद केजरीवाल को भी अदालत उठने तक की एक दिन की कैद दी जा सकती है। किसी देश की सभ्यता और संस्कृति में टुकड़ा-टुकड़ा इंसाफ नहीं हो सकता, आज जो लोग बिहार के मंत्री पर या अरविंद केजरीवाल पर टूट पड़े हैं, उनको आज की हवा में भी तैर रही दूसरी बातों को भी देखना चाहिए, और उसके बाद पहला पत्थर मारना चाहिए। 

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