भड़काऊ बात करने के पहले सच को परख लेना चाहिए

संपादकीय
17 जून  2016
उत्तरप्रदेश के एक संवेदनशील शहर या कस्बे कैराना को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश की हवा में एक तनाव भरी सनसनी फैलाई गई है, और उसे लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पार्टी बैठे-ठाले एक किनारे में घिर गई है। वहां के बड़बोले भाजपा सांसद ने सैकड़ों हिन्दू परिवारों की एक लिस्ट जारी करके यह आरोप लगाया कि कैराना में मुस्लिमों के आतंक से सैकड़ों हिन्दू परिवार घर छोड़कर, कस्बा छोड़कर जा चुके हैं। बात बहुत गंभीर थी और यह जायज भी था कि इस बात की तुलना तुरंत कश्मीर से आतंकतले भगाए गए पंडितों से की जाती, और वह काम भी शुरू हो गया। ऐसा लगने लगा कि मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की सरकार के राज में एक और कश्मीर बन रहा है। लेकिन मीडिया ने बड़े चौकन्नेपन से जब इन नामों को परखा, तो पता लगा कि सांसद की तकरीबन पूरी लिस्ट ही झूठी थी। और इसके आगे सांसद को भी अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मान लेना पड़ा। हालांकि वे अभी भी और लोगों के नाम ढूंढकर अपने मुद्दे को साबित करने की एक और खोखली कोशिश करते दिख रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी उत्तरप्रदेश में चुनाव तो लडऩे जा रही है, लेकिन अगर उसका अभियान ऐसे झूठ पर टिका रहेगा, जिसे कि दो दिनों के भीतर ही झूठ साबित कर दिया गया, तो इससे नफे के बजाय नुकसान बहुत बड़ा हो रहा है। चूंकि भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव इतने जटिल होते हैं कि यह अंदाज नहीं लगता कि किस वजह से कोई पार्टी या कोई नेता चुनाव जीते हैं या हारे हैं, इसलिए बहुत सी गलतियों को लोग चुनावी नतीजों के बाद भी गलतियां नहीं मानते, और नाकामयाबी का घड़ा फोडऩे के लिए कुछ दूसरे मुद्दों के सिर तलाश लेते हैं। फिर भी हमारी सलाह यह है कि देश के हित से परे भी, समाज की प्राथमिकताओं से परे भी, बुनियादी मुद्दों को छोड़कर भी अगर कोई पार्टी महज चुनावी जीत के हिसाब से कोई हरकत करती है, झूठ बोलती है, तो उसे कम से कम इतनी तैयारी रखनी चाहिए कि उसका झूठ रवाना होने के अगले ही चौराहे पर कपड़े न खो बैठे।
भारत में वैसे भी बहुत सी ताकतें सरहद के पार से भी हो सकता है कि तबाही लाने में लगी हुई हों, और ऐसी तबाही के लिए साम्प्रदायिक तनाव सबसे उम्दा किस्म का पेट्रोल हो सकता है। लेकिन देश का इतिहास ऐसी हरकतों को ठीक से दर्ज करते चलता है। और किसी भी पार्टी के, किसी भी नेता को ऐसी हरकत से बचना चाहिए। हम इसे किसी किस्म की गलती मानने से इंकार करते हैं, हमारा मानना है कि यह गलत काम है, गलती नहीं। और आज मीडिया-सोशल मीडिया की मेहरबानी से झूठ लंबे समय तक टिक नहीं पाता। इसलिए तनाव की बातें करने के पहले लोगों को उन्हें चार बार परख लेना चाहिए। जिस तरह लोग अपने बच्चों का रिश्ता तय करने के पहले चार अलग-अलग जगहों से पता लगा लेते हैं, उसी तरह लोगों को सार्वजनिक जीवन में भी किसी तरह की भड़काऊ बात करने के पहले सच को परख लेना चाहिए।

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