भारतीय महिला पायलटों की कामयाबी के मौके पर...

संपादकीय
18 जून  2016
भारतीय वायुसेना की महिला पायलटों में से आज से तीन को लड़ाकू विमानों के लिए तैनात किया गया है। अब तक भारत में एयरफोर्स की महिला पायलटें दूसरे विमान तो उड़ाती थीं, लेकिन लड़ाकू विमान और युद्ध के मोर्चे से उन्हें अलग रखा गया था। आज इस बात को भारतीय महिलाओं के लिए एक बड़ी ऐतिहासिक बात कहा जा रहा है। दूसरी तरफ पड़ोस के पाकिस्तान में मरियम मुख्तियार नाम की एक महिला लड़ाकू विमान पायलट एक विमान दुर्घटना में पिछले बरस मारी गई, और पाकिस्तानी एयरफोर्स में 2006 से 20 महिलाओं को लड़ाकू पायलट बनाया जा चुका था। भारत ठीक दस बरस बाद यह काम कर रहा है, इसलिए यह भारतीय सेना का देर से लिया गया फैसला है, जिसके लिए भारतीय महिलाओं की क्षमता को जोड़कर देखना ठीक नहीं है। यह एक खुशी का मौका जरूर हो सकता है, लेकिन इस मौके पर पाकिस्तान की मिसाल को भूलना ठीक नहीं है, और यह भी याद रखने की जरूरत है कि भारत में बाकी महिलाओं की आम हालत क्या है।
भारत में महिला अगर घर के बाहर से कमाकर नहीं लाती है, या कि घर में कोई रोजगार नहीं करती है, तो उसे घरेलू महिला कहा जाता है, और आम जुबान में यह कहा जाता है कि वह कोई काम नहीं करती। जो पूरे घर के काम को ढोती है, कुनबे की अगली पीढ़ी को पहले पेट के भीतर और बाद में गोद और कंधे पर ढोती है, जो पूरे घर को खिलाने के बाद सोती है, जो पूरी जिंदगी चूल्हे का धुआं झेलते हुए फेफड़े छलनी कर बैठती है, जिसकी मेहनत को रूपयों में आंका जाए, तो वह तमाम गरीब परिवारों में आदमी की कमाई से ज्यादा की होती है, उसके बारे में कह दिया जाता है कि वह कुछ नहीं करती। हिन्दुस्तानी समाज में नगद पैसों को ही घर चलाने में योगदान माना जाता है, और नगदी लाने वाले को ही कमाऊ-पूत माना जाता है। घर चलाने वाली महिला के लिए अधिक से अधिक सम्मान के साथ इन दिनों अंग्रेजी में होम-मेकर कह दिया जाता है।
देश में गिनी-चुनी महिलाओं की कामयाबी पर फख्र करना तो अच्छी बात है, लेकिन देश की बाकी महिलाओं के साथ बेइंसाफी खत्म करने के बारे में सोचना उससे कहीं जरूरी है। देश की आधी आबादी को अगर संसद और विधानसभाओं में आरक्षण देने में भी यह देश तंगदिली दिखाता है, और चौथाई सदी से उसे तरह-तरह से टाला जा रहा है, तो इस बारे में भी आज सोचना चाहिए कि भारतीय वायुसेना की लड़ाकू महिला पायलटें युद्ध छिडऩे तक देश के भीतर ही पुरूषप्रधान सोच पर बमबारी क्यों न करें? महिलाओं के साथ होती हिंसा, उन पर जुल्म और उनसे बेइंसाफी पर बमबारी क्यों न करें? देश की दिक्कत यह है कि कुछ गिनी-चुनी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा करने के बाद इस देश में एक ऐसा झांसा खड़ा कर दिया जाता है कि देश में महिलाओं का इतना सम्मान है इसके बाद कुछ गिनी-चुनी महिलाओं की कामयाबी की मिसाल को यह मान लिया जाता है कि देश में महिलाएं आसमान तक पहुंच रही हैं। लेकिन चावल की विशाल हंडी में उबलते दानों में से एक दाना पक जाए, और बाकी तमाम कच्चे पड़े हों, तो उस एक दाने को मिसाल मान लेेना बेइंसाफी को जारी रखने का हथियार भी बन जाता है। महिला अधिकारों की कामयाबी की गिनी-चुनी मिसालों के साथ-साथ देश की आधी आबादी की बाकी तकरीबन पूरी महिलाओं की हालत के बारे में भी सोचना चाहिए। जिस देश में महिलाओं को जन्म के पहले  से छांट-छांटकर मारा जाता है, इससे भी बच निकले तो पैदा होते ही मार दिया जाता है, उससे भी बच निकले तो बचपन से ही बलात्कार और हत्या उसके लिए तैयार रहते हैं, फिर आगे चलकर स्कूल-कॉलेज, और खेल के मैदान पर शोषण राह तकते रहता है, शादी के पहले दहेज, और शादी के बाद दहेज-हत्या, कामकाजी महिला का देह-शोषण, और वृंदावन में विधवा-जीवन, भारत में आम और तकरीबन पूरी महिलाओं की यही कहानी कही जाती है कि नारी तेरी यही कहानी, आंचल में दूध और आंखों में पानी।
भारतीय महिला पायलटों की आज की इस ऐतिहासिक शुरुआत के मौके पर देश में इनका सम्मान तभी हो सकता है, जब सबसे वंचित महिलाओं के हकों पर भी खुली बातचीत हो, और उनके लिए कोई रास्ता निकाला जाए।

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