हथियार, इंसान, और सामाजिक तनाव का मेल ऐसा खतरनाक..

संपादकीय
19 जून  2016
एक तरफ अमरीका में घर-घर में हथियार रखने की आजादी के चलते बहुत से ऐसे मामले हो रहे हैं जिनमें सिरफिरे या आतंकी,या नस्लवादी, या साम्प्रदायिक हत्यारे आसानी से खरीदे गए घातक हथियारों से दर्जनों लोगों को भून डालते हैं, और इसके बाद राष्ट्रपति से लेकर और बहुत से लोगों तक हथियारों पर पाबंदी लगाने की मांग उठती है। दूसरी तरफ ब्रिटेन में अभी एक महिला सांसद को जिस तरह गोली मारी गई और उसके बाद उसे चाकू भी भोंके गए, वह घटना इस बात के बावजूद भी कि ब्रिटेन में हथियारों पर कड़ी पाबंदी है। भारत जैसे देश में मिलीजुली नौबत एक हथियार हैं भी, और अवैध हथियार भी खूब हैं, लेकिन अंधाधुंध गोलीबारी से बहुत से लोगों को मार डालने जैसे मामले शायद ही होते हैं, अधिकतर हत्याएं आपसी रंजिश में होती हैं।
इन तीनों स्थितियों को अगर देखें तो यह समझना कुछ मुश्किल है कि हथियार हिंसा बढ़ाने के लिए अकेले जिम्मेदार हैं, या कि उन हथियारों को चलाने वाली सोच जिम्मेदार हैं, या कि किसी देश में सामाजिक स्थिति उसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है? अमरीका के मामले में तो यह साफ लगता है कि निजी हथियारों को लेकर वहां पर लोगों में एक ताकत की भावना जिस तरह से बैठी हुई है, उसमें लोग बावलेपन की हद तक हथियार खरीदते हैं, और इक_े करते हैं। वहां की हथियार बनाने वाली कंपनियां हॉलीवुड की फिल्मों से लेकर लोगों की सीधी सोच तक, सबको प्रभावित करके गन-कल्चर को बढ़ावा देती हैं, और वहां की संसद को कभी यह तय नहीं करने देतीं कि हथियार घटाए जाएं। इसके बाद फिर अमरीका के कुछ गिने-चुने लोगों में तनाव इतना बढ़ जाता है कि वे ठंडे दिमाग से सोचकर चारों तरफ खून बहा देते हैं। यह बात सामाजिक तनाव की भी है, और धार्मिक नफरत की भी है। इससे परे एक खतरा और भी है कि दुनिया के कई मुस्लिम देशों में जिस तरह से अमरीकी फौजों ने हमला किया, उसका बदला लेने के लिए भी बहुत से बौखलाए हुए मुस्लिम नौजवान न सिर्फ अमरीका में, बल्कि योरप के भी कई देशों में ऐसा करते हैं।
अब भारत के लिए इन तमाम स्थितियों से सबक लेने की जरूरत है। एक तो निजी हथियारों में बड़ी कड़ाई से कमी होनी चाहिए। भारत के उत्तरप्रदेश-बिहार जैसे कुछ इलाके हैं जहां पर निजी हथियार रखना एक इज्जत की बात मानी जाती है, और वहां जो कोई बंदूक खरीद सकते हैं वे इसकी कोशिश करते हैं। कानूनी लाइसेंस न मिले तो भी लोग गैरकानूनी हथियार रख लेते हैं। देश में जिस तरह का धार्मिक उन्माद छाया हुआ है, और जिस तरह की साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, उसके चलते हुए यह खतरा बना हुआ है कि किसी दिन कोई अकेला सिरफिरा यह तय कर ले कि वह समाज से, सरकार से, या किसी तबके से हिसाब चुकता करने के लिए बहुत से लोगों को मार डालेगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके एक सिक्ख अंगरक्षक ने स्वर्ण मंदिर पर हुई फौजी कार्रवाई के विरोध में की थी। और प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द तैनात, जांचे-परखे हुए एक गार्ड ने जब ऐसा किया, तो किसी धार्मिक उन्माद में कोई व्यक्ति और बड़ी हिंसा, और बहुत सी हत्याएं कर सकते हैं।
इन दोनों-तीनों देशों को देखें, और पड़ोस के पाकिस्तान की बड़ी अलग स्थिति को देखें तो भी यह समझ आता है कि हथियारों पर काबू एक जरूरत है, दूसरी जरूरत यह भी है कि सामाजिक तनाव न बढ़ पाए। हथियारबंद और नफरत से भरे हुए लोग कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसकी मिसाल दुनिया भर में है। खाड़ी के जिन देशों में चारों तरफ हिंसा से देश के देश खंडहर बने जा रहे हैं, लाखों लोग मारे जा रहे हैं, और दसियों लाख देश छोड़कर जाने को मजबूर हो रहे हैं, वहां पर ये ही दो बातें तो हैं, एक तो धार्मिक उन्माद से भरी हुई नफरत, और दूसरा हथियार। इसलिए भारत को बहुत सावधानी से इन दोनों चीजों पर काबू रखना चाहिए, क्योंकि हथियारों की जांच-पड़ताल तो एक बार किसी तरह से हो भी सकती है, लोगों के दिल-दिमाग में बैठी हुई हिंसक धार्मिक नफरत की शिनाख्त भी किसी हिंसा के बाद ही जांच-पड़ताल में समझ में आ सकती है, तब तक नुकसान हो चुका रहता है। 

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