आग को हवा देने के बजाय उसे बुझाना अधिक महत्वपूर्ण

संपादकीय
2 जून  2016
दिल्ली पुलिस ने मध्यस्थता करके दिल्ली के स्थानीय लोगों और दिल्ली में बसे हुए अफ्रीकी मूल के लोगों के बीच चल रहे तनाव को खत्म करने की कोशिश की है। आमतौर पर सरकार के लिए आलोचक समझे जाने वाले अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने इस पहल और तनाव घटने की रिपोर्ट छापी है, और भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस रिपोर्ट के लिए इस अखबार को ट्विटर पर धन्यवाद दिया है।
नकारात्मक खबरें अखबार में बड़ी आसानी से सुर्खियां बन जाती हैं। हिंसा और साम्प्रदायिकता की खबरें, एक-दूसरे के खिलाफ अश्लील और असंसदीय बयान की खबरें आम बात हैं। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर अपने दर्शक या पाठक जुटाने में लगे रहता है। ऐसे में तनाव को घटाने की कोशिशें अधिक मायने रखती हैं, और ऐसी किसी भी कोशिश को प्रमुखता से दिखाने में मीडिया को एक सामाजिक जिम्मेदारी और जवाबदेही भी दिखानी चाहिए। सरकार की बहुत सी खामियां हो सकती हैं, और समाज के अलग-अलग हिंसक तबकों के बहुत से जुर्म भी हो सकते हैं, लेकिन इनकी खबरों को छापने या दिखाने के साथ-साथ यह भी याद रखना चाहिए कि इससे समाज का व्यापक नफा होगा, या व्यापक नुकसान होगा? टीकाकरण के बाद कभी किसी बच्चे की मौत हो जाती है, तो उसे एक अनुपात और जरूरत से अधिक दिखाकर मीडिया एक ऐसी दहशत पैदा कर सकता है जिससे कि बाकी लाखों बच्चे टीकाकरण से दूर रह जाएं। जो भी गलतियां होती हैं, या गलत काम होते हैं, उनसे तो बचने की जरूरत है, लेकिन सरकार और समाज को आगाह करने के साथ-साथ यह भी समझना चाहिए कि मीडिया के मार्फत अगर हिंसा या बेचैनी भड़कती हैं, तो वह बात कहां तक जा सकती है? अभी जैसे छत्तीसगढ़ में  सरकारी स्कूलों में बच्चों को पिलाए गए दूध के बाद दो बच्चों की मौत हुई है, और कुछ जगहों पर बच्चे बीमार भी पड़े हैं। इस मामले की पूरी जांच और कार्रवाई तो जरूरी है, लेकिन सरकार के जनकल्याणकारी कार्यक्रम को गलत ठहराना सही नहीं होगा। यह एक गलती है, और इसे सुधार लेना बच्चों की सेहत के लिए जरूरी और अच्छा होगा, बजाय इसके कि ऐसे कार्यक्रम को खारिज कर दिया जाए।
भारत में दुनिया के बहुत से देशों से आए हुए छात्र-छात्राओं की पढ़ाई चलती है। खुद देश के भीतर बहुत से प्रदेशों के लोग दूसरे प्रदेशों में जाकर पढ़ते हैं, या काम करते हैं। हमने पहले भी देखा है कि जब किसी क्षेत्र, धर्म, रंग, या जाति के लोगों के खिलाफ तनाव भड़कता है, तो उसकी एक प्रतिक्रिया दूसरी जगहों पर भी होती है। भारत में एक अफ्रीकी नौजवान को अगर पीट-पीटकर मार डाला गया है, तो अफ्रीकी देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानियों के साथ वहां के हिंसक लोग इसका हिसाब चुकता कर सकते हैं। इस तरह के तनाव वे ही लोग खड़े करते हैं जिनके अपने लोग दूसरे देश-प्रदेश में बसे हुए नहीं रहते। आज कश्मीर के या उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ देश के बाकी प्रदेशों में बदसलूकी हो, तो इसकी प्रतिक्रिया देश के इन सरहदी प्रांतों में जाने वाले लोगों के साथ हो सकती है।
अगर किसी तरह की हिंसा किसी उत्तेजना या गलतफहमी में हो भी गई है, तो उस पर कड़ी कानूनी कार्रवाई से तुरंत काबू पाना चाहिए, और सोशल मीडिया पर, मूलधारा के मीडिया में, ऐसे मामलों की आग को हवा नहीं देनी चाहिए। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे देश-प्रदेश में अपने चुनावी हिसाब चुकते करने के लिए इन मामलों को न बढ़ाएं। कड़ी से कड़ी कार्रवाई जरूर होनी चाहिए, लेकिन ऐसी जवाबी हिंसा न हो, हिंसा इस तरह से न बढ़े कि आंख के बदले आंख निकालने का सिलसिला पूरी दुनिया को अंधा करके छोड़ दे। 

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