छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति अब पिछले चुनाव जैसी नहीं

संपादकीय
20 जून  2016
छत्तीसगढ़ की राजनीति ने ऐसी करवट बदली है कि अगले विधानसभा चुनाव में जो पार्टी या जो विधायक अपने-आपकी जीत तय मानकर चलेंगे, वे खासा बड़ा झटका खा सकते हैं। भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांगे्रस के भीतर लगातार एक बेचैन-बागी बने हुए अजीत जोगी अब अपने बेटे के साथ खुद की एक पार्टी बनाकर चुनाव में उतर रहे हैं, और उनका कितनी सीटों पर क्या असर होगा, कांगे्रस और भाजपा के चुनिंदा लोगों के साथ उनका कैसा तालमेल रहेगा, इसका अंदाज आज शायद कोई न लगा पाए। दूसरी तरफ इसी तरह के बागी तेवरों के साथ भाजपा छोडऩे वाले बस्तर के भूतपूर्व सांसद सोहन पोटाई ने भी विधानसभा चुनाव में अलग झंडे तले पार्टी बनाकर लडऩे की घोषणा की है। इन सबसे परे आम आदमी पार्टी है जिसने कि दिल्ली और पंजाब के चुनावों में सबको चौंका दिया था, और दिल्ली राज्य पर कब्जा करने के साथ-साथ संसद में भी वह पंजाब के रास्ते पहुंच गई थी, अब यह पार्टी भी बस्तर के सबसे जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर राज्य में सबसे अधिक आक्रामक तेवरों के साथ है, और ऐसा मानने वाले लोग हैं कि अगली विधानसभा में इस पार्टी से भी कोई हो सकते हैं।
कांगे्रस और भाजपा के छत्तीसगढ़ में लगातार बने हुए आपसी-एकाधिकार की जमीन इस विधानसभा चुनाव में कुछ हिलती हुई दिख सकती है, और यह याद रखने की जरूरत है कि इन दोनों पार्टियों के बीच सीटों का फर्क तो पिछले चुनाव में साफ था, लेकिन दोनों के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी था। आज क्या कोई यह अंदाज लगा सकते हैं कि पिछले चुनाव से लेकर अब तक पौन फीसदी का यह फासला किस तरफ कितना घटा या बढ़ा होगा? और यह भी याद रखने की जरूरत है कि तीन कार्यकाल पूरे करते-करते हो सकता है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इस पौन फीसदी की लीड को भारतीय चुनावी राजनीति में प्रचलित एक शब्द, एंटी इंकम्बेंसी की वजह से खो भी चुकी हो। यह एक अलग बात है कि हो सकता है कि उसने इससे अधिक हासिल भी कर लिया हो। हम अभी उतनी बारीक अटकल पर नहीं जा रहे हैं, और हम मोटे तौर पर अगले चुनाव की एक तस्वीर भर सामने रख रहे हैं। पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटों के बारे में यह कहा जाता है कि वहां जोगी की मेहरबानी से भाजपा को अप्रत्याशित सीटें मिली थीं, और भाजपा की सरकार दुबारा लौटी थी। बस्तर और सरगुजा में आदिवासी सीटें भाजपा के हाथ से निकल गई थीं, और इस बार तो सोहन पोटाई की शक्ल में एक अलग चुनौती भी रहेगी। फिर बस्तर में पुलिस और प्रशासन के जुल्म-ज्यादती को लेकर जो भयानक नौबत है, उसे लेकर भी आम आदमी पार्टी बड़े आक्रामक तेवरों के साथ अभी से डट गई है।
कुल आधा दर्जन से कम सीटें, और कुल पौन फीसदी से कम का वोटों का फासला, अगले चुनाव में इनको किसी भी तरफ बदलने के लिए ये दो-तीन नए मोर्चे असर डाल सकते हैं। लेकिन हम इसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक लोकतांत्रिक परिवर्तन इसलिए मानते हैं कि दोनों बड़ी पार्टियों का एकाधिकार अब टूटते दिख रहा है, उनका विधानसभा के भीतर तो फिर भी मिला-जुला कब्जा हो सकता है, लेकिन चुनावी मैदान में इन दोनों पार्टियों से परे भी ऐसे लोग रहेंगे जो कि इन दोनों का जीना हराम करके रखेंगे।

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