योग के फायदे तो अनगिनत पर धर्मांधता से दूर ही रखें

संपादकीय
21 जून  2016
भारत की सदियों पुरानी जीवनशैली का एक हिस्सा, योग अब पूरी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में अधिक प्रचलित होते चल रहा है। वैसे तो भारत में दिलचस्पी रखने वाले लोग जमाने से योग सीखने भारत आते थे, और बहुत सी पुरानी तस्वीरें बताती हैं कि आधी-पौन सदी पहले भी पश्चिम में योग का प्रचलन था। लेकिन नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह अंतरराष्ट्रीय दिवस भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्रसंघ से घोषित हुआ और आज भारत के तकरीबन हर हिस्से में योग का सार्वजनिक अभ्यास हुआ। टेलीविजन पर ऐसा बहुत समय बाद हुआ कि सुबह के दो घंटे हत्या और बलात्कार से आजाद रहे, और सिर्फ योग और उसके फायदों पर चर्चा होती रही। कुछ भाजपा विरोधी पार्टियों के राज वाले राज्यों को छोड़ दें, तो बाकी सारे देश में सरकार ने इस दिन इस समारोह को सरकारी स्तर पर किया, और स्कूल-कॉलेज के बच्चों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
बिना किसी खर्च के, बिना बिजली और बिना किसी मशीन के जो योग हो सकता है, वह लोगों को बहुत सी बीमारियों से बचाता है। हम बाबा रामदेव जैसे कुछ नाटकीय योग की बात नहीं करते, जिसके फायदे को लेकर डॉक्टरों को कई तरह के शक हैं, और जिससे होने वाले नुकसान को लेकर कई तरह आशंकाएं भी हैं, हम भारत के परंपरागत योग की बात करते हैं जो कि रामदेव के पैदा होने के सदियों पहले से बिना किसी बाजारू नाटकीयता के चल रहा है, और आज भी मुंगेर जैसे विश्वविख्यात योग संस्थानों से लेकर दक्षिण भारत के कई योग गुरुओं तक ने बिना साबुन और नूडल्स बेचे सिर्फ योग को फैलाया है। यह अलग बात है कि आज रामदेव भारत के राजकीय योग गुरु बने बैठे हैं, और सरकारी मंच से शोहरत पाते हुए अपने हजारों करोड़ के कारोबार को दसियों हजार करोड़ का कर रहे हैं।
लेकिन इन सबसे परे अगर हम पते की बात पर सीधे आएं, तो राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थानों को साफ-सुथरी, खुली और हवादार जगहों पर योग का इंतजाम करना चाहिए जिससे कि भारत की आबादी में बढ़ते चल रहे डायबिटीज सरीखे रोग पर काबू हो सके। और कई किस्म की गंभीर बीमारियां भी इस मुफ्त की जीवनशैली से घट सकती हैं, जिंदगी बढ़ सकती है, और चुस्त-दुरुस्त रहने से इंसान की उत्पादकता भी बढऩे की गारंटी रहती है। आज दिक्कत यह है कि खुली हुई जितनी जगह सरकार के पास है, उस पर स्थानीय संस्थाएं और सरकारी संस्थाएं सिर्फ कारोबार के कॉम्पलेक्स बनाने पर आमादा रहती हैं, और जनता की जरूरत के लायक मैदान और बाग-बगीचे बच नहीं जा रहे। देश में सरकार ही जमीनों की सबसे बड़ी मालिक है, इसलिए जमीन तो उसे ही देनी होगी, लेकिन समाज योग प्रशिक्षकों को जुटाने में मदद कर सकता है, और बहुत मामूली से खर्च से लोगों की जिंदगी को बहुत ही सेहतमंद बनाया जा सकता है, बीमारियों से लोगों को बचाया जा सकता है जो कि आगे चलकर सरकारी खर्च में बचत का एक तरीका भी साबित होगा।
स्कूल और कॉलेज भी खेलकूद के साथ-साथ योग को अपना सकते हैं, और इससे नफा छोड़ कोई नुकसान नहीं होगा। आज जिस तरह से योग को एक साम्प्रदायिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है, उसके चलते इसका विरोध भी हो रहा है। वरना यह वही देश है जिसके हर सरकारी दफ्तर में आजादी के भी दशकों पहले से हर तिजोरी, हर खजाने, और और हर बहीखाते की लक्ष्मी पूजा होते आई है, और किसी भी धर्म के अधिकारी वहां रहे हों, कभी किसी को इस पूजा से ऐतराज नहीं रहा। लेकिन अगर कोई यह नारा लगाए कि भारत में सरकारी नौकरी करना है तो लक्ष्मी पूजा करना होगा, तो हो सकता है कि परंपरागत लक्ष्मी पूजा का विरोध भी होने लगे। इसी तरह योग को अगर सचमुच बढ़ावा देना है तो उसे साम्प्रदायिक धर्मांधता से अलग रखना होगा, वरना धर्मांधता जरूर बढ़ जाएगी, योग पिछड़ा ही रह जाएगा।

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