इसरो से देश को गौरव का एक और मौका

संपादकीय
22 जून  2016
भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो की एक और कामयाबी ने आज सुबह-सुबह देश का सिर ऊंचा किया। कल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की वजह से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को दिन की शुरूआत बलात्कार और हत्या से करने का मौका नहीं मिला था, और आज सुबह यह दूसरी सकारात्मक खबर थी कि दुनिया के विकसित देशों के उपग्रह लेकर भारतीय रॉकेट किस तरह अंतरिक्ष गया। आज अलग-अलग देशों और कंपनियों के 20 उपग्रह एक साथ भेजे गए, और यह पूरा मिशन बड़ी बारीक सफलता से पूरा हुआ। इस बड़े ही तकनीकी मामले पर वैसे तो हमको किसी विचार के लिखने की जरूरत नहीं होनी थी, लेकिन फिर भी एक सरकारी संस्थान इस देश की आम सरकारी संस्कृति के बीच भी किस बखूबी काम कर सकता है, यह देखने की जरूरत है। बुरी बातों पर लिखने का मौका तो दिन में चार बार मिलता है, लेकिन सरकार में किसी अच्छी बात पर लिखने के मुद्दों का अकाल बने रहता है।
यह इसरो केन्द्र सरकार के पैसों पर चलने वाला संस्थान ही है, और इसमें वे हिन्दुस्तानी वैज्ञानिक और तकनीशियन काम करते हैं, जिनकी राष्ट्रीयता के बारे में बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि हिन्दुस्तानी बुनियादी रूप से भ्रष्ट हैं, वे काम नहीं करते हैं, सरकार के हर काम में बड़ा भ्रष्टाचार रहता है, वगैरह-वगैरह। दूसरी दिलचस्प बात यह कि पिछली बार जब मंगल ग्रह के लिए भारत का यान रवाना हुआ, तो पहली बार यह बात सामने आई कि इसरो के उस अभियान से कितनी बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ी हुई थीं। आमतौर पर महिलाओं का मखौल बनाने के लिए यह कहा जाता है कि वे एक कार भी ठीक से पार्क नहीं कर सकतीं, और वे ही महिलाएं इसरो में काम करते हुए मंगलयान को भी मंगल पर ठीक से पार्क कर चुकी हैं। यह इसरो सरकारी खरीदी पर ही काम करता है, इसके वैज्ञानिक वे ही लोग हैं जिन्हें कि दुनिया के दूसरे देशों में इससे दस-बीस गुना बड़ी तनख्वाह मिल सकती है, और इस पर सरकार की वैसी ही राजनीति चल सकती है जैसी कि किसी भी दूसरे सरकारी संस्थान पर चलती है या चल सकती है। लेकिन ऐसी ही तमाम सीमाओं के बीच इतनी बड़ी महिला-भागीदारी के साथ इसरो ने जो कामयाबी पाई है, उसे देखकर इस देश को यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी हर कोने पर थूकने या मूतने से बेहतर भी बहुत से काम कर सकते हैं, और करते हैं।
किसी देश के लिए राष्ट्रीय गौरव बहुत जरूरी होता है। इसरो हर बरस एक से अधिक बार देश को ऐसा मौका देता है। ऐसा ही एक दूसरा संस्थान अमूल है जो कि  सहकारी क्षेत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें डेयरी चलाने के साथ-साथ आइसक्रीम से लेकर चॉकलेट तक, और दूध से लेकर मक्खन तक बनाकर अपने ब्रांड से बेचने में अमूल ने भारत में काम कर रही सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पछाड़ दिया है। और इस अमूल की एक खूबी यह भी है कि दशकों से इसके ऐसे कॉर्टूननुमा पोस्टर हर चर्चित घटना पर आते हैं, और सरकारी क्षेत्र की सहकारी संस्था होने के बाद भी ये पोस्टर सरकार का मजाक उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहते। गौरव का एक और संस्थान दिल्ली का मेट्रो था जिसे कि एक इंजीनियर-अफसर श्रीधरन ने बेमिसाल कामयाबी से बनाया था, और सरकार के भीतर रहते हुए शानदार काम करके दिखाया था। देश में ऐसी मिसालें कई जगह सामने आती हैं, और जनता से लेकर सरकार तक सभी को यह सोचना भी चाहिए कि कामयाबी की ऐसी मिसालें और कहां-कहां बढ़ाई जा सकती हैं। आज अगर कोई यह सोचे कि इसरो के रॉकेट में, या उसके उपग्रह में घटिया सामान सरकारी सप्लाई से खरीदकर लगाया गया होता, तो क्या आज इसरो मंगल पर पहुंचा होता? क्या वह दुनियाभर के देशों के लिए काम करता होता?
अंतरिक्ष में भारत की सफलता पूरी तरह से घरेलू तकनीक पर गढ़ी हुई है, और भारत को अपने बाकी सरकारी क्षेत्रों के बारे में यह सोचना चाहिए कि वहां ऐसी कामयाबी पाने के लिए क्या किया जा सकता है।

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