क्या सरकारी अफसरों को सामाजिक हकीकत बयां करने का हक हो, या नहीं?

विशेष संपादकीय 
23 जून 2016  
-सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के एक चर्चित आईएएस अफसर की एक ताजा फेसबुक पोस्ट को लेकर अलग-अलग बहुत से तबकों के लोग उस पर टूट पड़े हैं कि उसे नौकरी से हटाया जाए, या ओहदे से हटाया जाए, या कोई और सजा दी जाए। उसने फेसबुक पर लिखा था- 'क्या भारत की न्याय प्रणाली में कोई ऐसा पूर्वाग्रह है जिसकी वजह से मौत की सजा पाए हुए हिन्दुस्तानियों में से 94 फीसदी लोग दलित और मुस्लिम तबकों के हैंÓ। इसके पहले भी मध्यप्रदेश में कुछ अफसरों पर सोशल मीडिया पर लिखी गई बातों को लेकर कार्रवाई की गई है, और छत्तीसगढ़ के भी कुछ दूसरे अफसर ऐसे हैं जिनकी पोस्ट की गई बातों को लेकर बखेड़ा होते रहा है।
सरकारी अफसर अपने विचार किन मुद्दों पर, किस हद तक, और किन जगहों पर रख सकते हैं, यह कई बातों पर निर्भर करता है। जब तक कोई आपत्ति न करे, तब तक तो कई बातें खप जाती हैं। लेकिन जब कोई शिकायत होती है, या कोई बखेड़ा खड़ा होता है, तब यह बात सामने आती है कि शासकीय सेवा के नियम-कायदे किस तरह की सीमा सुझाते हैं। इस एक मामले को अगर देखें, तो यह बात साफ है कि देश के बहुत से दलित और अल्पसंख्यक ऐसा मानते हैं कि न केवल भारत की न्याय व्यवस्था में, बल्कि सामाजिक व्यवस्था में भी जाति व्यवस्था के पूर्वाग्रह वाला एक भेदभाव कायम है, और धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों को सार्वजनिक रूप से रोजाना ही जुबानी या तन-बदन की हिंसा झेलनी पड़ती है। इसलिए कोई सरकारी अधिकारी कुर्सी पर रहते हुए इस बात को उठाए, या न उठाए, यह बात एक हकीकत है, और इसे अनदेखा करना केवल वही तबका कर सकता है जो शोषकों के साथ, और जो शोषण का शिकार नहीं है। दूसरी तरफ जाति व्यवस्था के खिलाफ बोलने वाले लोग भारत की संविधान सभा से लेकर आज की संसद तक बहुत से, इस सामाजिक हकीकत की चर्चा करने हमारे हिसाब से कोई गलत बात नहीं है।
आज जिस बात को लेकर हम यह चर्चा कर रहे हैं उसमें इस नौजवान अफसर ने भारत की न्याय प्रणाली की बात कही है। न्याय प्रणाली एक व्यापक दायरा है जिसमें मुकदमा चलाने वाली जांच एजेंसियों से लेकर दोनों पक्षों के वकीलों तक, गवाहों और अदालती कर्मचारियों तक, और जजों तक, सभी की जगह है। और इन सबको मिलकर जो न्याय प्रणाली बनती है, उसके बारे में हम हमेशा से यह लिखते आए हैं कि यह तरह-तरह के वर्ण और वर्ग के पूर्वाग्रहों से भी प्रभावित रहती है, और इसका कुछ हिस्सा भ्रष्टाचार में डूबा रहता है, और सामाजिक यथार्थ यह है कि भ्रष्टाचार की ताकत दलितों और मुसलमानों में, आदिवासियों और गरीबों में बिल्कुल भी नहीं रहती है। इस तरह भारत की न्याय प्रणाली बड़े जाहिर तौर पर उच्च वर्ण, बहुसंख्यक धर्म, उच्च आय वर्ग, शहरी-शिक्षित, ऐसे ताकतवर तबकों को इंसाफ पाने, या दूसरों को बेइंसाफी देने की अधिक ताकत देती है।
यह बात अकेले हिन्दुस्तान की नहीं है। जब भी हिन्दुस्तान के दलित और आदिवासी तबके की बात होती है, उससे कुछ या अधिक हद तक मिलता-जुलता एक दूसरा मामला अमरीका के अश्वेतों का होता है, या दुनिया के बहुत से देशों के मूल निवासियों का होता है, जिन्हें भारत में आदिवासी कहते हैं। भारत सहित दुनिया के बहुत से लोकतंत्रों में यही हालत कायम है कि ऐसे तबकों को प्रताडऩा अधिक झेलनी पड़ती है, और इनके इंसाफ पाने की संभावना बड़ी कम रहती है। भारत में भी दलितों और मुस्लिमों का यही हाल है, और हम छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके की बात करें, तो सरकारी जुल्म और ज्यादती के शिकार आदिवासी तबकों की हालत भी यही है कि उनके इंसाफ पाने की संभावना न के बराबर रहती है। सामाजिक व्यवस्था के जातिवाद के तहत हालात इतने अधिक खराब रहते हैं कि संसद से लेकर सरकार तक, और अदालत से लेकर अखबार तक अगर दलित और मुस्लिम, आदिवासी और गरीब अगर किसी ताकत के ओहदे पर आ भी जाते हैं, तो भी वे अपने वर्गहितों से दूर जाकर,  परंपरागत ताकतवर तबकों के पूर्वाग्रहों को ओढ़ लेते हैं, और अपनी ही सामाजिक जड़ों से कट जाते हैं, उन्हें काटने लगते हैं। यही वजह है कि सरकार का हिस्सा बनने के बाद पुलिस में जो आदिवासी या दलित लोग आते भी हैं, वे भी दलित या आदिवासी लोगों से ज्यादती करने में भागीदार हो जाते हैं। सत्ता अपने आपमें एक बहुसंख्यक धर्म, राजा का धर्म, राजा की जाति का चरित्र सब पर डाल देती है, और इस सत्तारूढ़ पूर्वाग्रह से सामाजिक अन्याय बढ़ते ही चलता है।
अभी छत्तीसगढ़ के जिस आईएएस अफसर ने यह पोस्ट की है, उसके बारे में कुछ लोगों का यह मानना या कहना है कि वह दलित है, या वह ईसाई है, या वह नास्तिक है, या वह जाति व्यवस्था के खिलाफ है। लेकिन हमारा यह मानना है कि उसके लिखे हुए मुद्दे पर बात करने के बजाय अगर उसकी कलम की स्याही में गंगाजल या किसी चर्च का पानी ढूंढा जाएगा, और इस बात को अनदेखा कर दिया जाएगा कि आज भी इस देश में दलितों को कुओं से पीने का पानी लेने पर भी जगह-जगह रोक लगी हुई है, तो फिर स्याही की ऐसी जांच करने वाले लोगों का जनतांत्रिक-इंसाफ से कोई लेना-देना हो नहीं सकता।
हमारा मानना है कि सामाजिक हकीकत की बात को उठाना किसी सरकारी सेवा-नियम के खिलाफ नहीं हो सकता, और सरकार को अगर किसी पर कोई कार्रवाई करनी है, तो उसे एक अलोकतांत्रिक और तंगनजरिये से नहीं किया जाना चाहिए। इस देश में अनगिनत नेता और अफसर ऐसे हैं जो कि अपने धार्मिक प्रतीक चिन्हों, और धार्मिक मान्यताओं का खुला प्रदर्शन करते हैं, सरकारी खर्च पर करते हैं, और ऐसा करके वे जनता के बीच अपने निष्पक्ष और धार्मिक समभाव का भरोसा खत्म भी करते हैं। ऐसे लोगों पर कार्रवाई के बजाय अगर सामाजिक सच्चाई पर कार्रवाई करना है, तो यह आसान तो हो सकता है, लेकिन यह लोकतांत्रिक तो बिल्कुल भी नहीं होगा, न्याय तो बिल्कुल भी नहीं होगा। 

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