जनमतसंग्रह, ब्रिटेन से लेकर भारत-पाक के कश्मीर तक

संपादकीय
25 जून  2016
करीब आधी सदी से यूरोपीय समुदाय में रहते आए ब्रिटेन अब उससे बाहर हो रहा है, और डेढ़ दशक पहले उसने अपनी करेंसी और पासपोर्ट छोड़कर ईयू की करेंसी और वीजा नियमों को मान लिया था, और तब से अब तक वह यूरोपीय समुदाय का शायद सबसे ताकतवर सदस्य था। यह सदस्यता पूरी तरह से खत्म होते अभी कम से कम दो बरस लगेंगे, लेकिन ब्रिटिश नागरिकों ने एक जनमतसंग्रह में यह फैसला ले लिया है, और यह ब्रिटिश सरकार पर बंधनकारी भी है। इसके साथ ही जनमतसंग्रह शब्द से जुड़े हुए कुछ और मामले उठ रहे हैं। इसी ब्रिटेन की राजधानी लंदन ने इस जनमतसंग्रह में भारी बहुमत से ईयू में बने रहने के लिए वोट दिया था, और अब वहां के नए-नए मेयर से यह मांग हो रही है कि लंदन शहर एक जनमतसंग्रह कराए, और ब्रिटेन से अलग होकर ईयू का सदस्य हो जाए।
भारत में अगर देश से अलग होने की बात कोई ऐसे करे, तो उसके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज हो जाएगा, और उसका मुंह काला करके उसे पीटना शुरू हो जाएगा। लेकिन योरप की उदार परंपराओं के मुताबिक इस बात पर भी लंदन के लोगों ने ऑनलाईन अभियान छेड़ दिया है, क्योंकि वे देश के बाकी हिस्से के बहुमत से अलग सोचते हैं, और वे देश से अलग होकर भी यूरोपीय समुदाय में बने रहना चाहते हैं। दूसरी तरफ भारत में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जनमतसंग्रह की बात कही है, और इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उन पर हमला किया है। दिल्ली को यह दर्जा न होने के कारण पुलिस विभाग नहीं मिलता, और वहां के उपराज्यपाल दूसरे पूर्ण राज्यों के राज्यपालों के मुकाबले बहुत अधिक अधिकार रखते हैं। दिल्ली की राज्य सरकार एक किस्म से किसी दूसरी राज्य सरकार के तहत चलने वाली म्युनिसिपल की तरह है, और इस तस्वीर को बहुत से लोग बदलना चाहते हैं।
एक और जनमतसंग्रह कश्मीर में होना बाकी है जो कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद दोनों देशों के कब्जे में कश्मीर के कुछ-कुछ हिस्से को लेकर होना है, और जिसमें दोनों तरफ के लोगों को यह तय करने का मौका मिलना है कि वे इन दोनों में से किसी देश के साथ रहना चाहते हैं, या कि वे एक नया देश बनाना चाहते हैं। कश्मीर की इस इतिहास में दफन, लेकिन संवैधानिक रूप से अब भी जिंदा जनमतसंग्रह को लेकर भारत के कुछ राष्ट्रवादी तबकों की सोच बड़ी हमलावर है, और दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के एक चर्चित और प्रमुख वकील प्रशांत भूषण का मुंह इसी बात को लेकर काला किया गया था कि उन्होंने कश्मीर के जनमतसंग्रह को जायज ठहराया था।
दुनिया के सभ्य लोकतंत्र और विकसित संसदीय व्यवस्थाएं जनमतसंग्रह से नहीं डरतीं। जनमत को दबाए रखकर बंदूक का राज तो चलाया जा सकता है, लेकिन सभ्यता विकसित नहीं हो सकती। अमरीका सहित बहुत से ऐसे पश्चिमी देश हैं जहां पर शहरों के पुलिस प्रमुख चुनने के लिए जनता वोट देती है, और शहरों या राज्यों के सरकारी वकील तय करने के लिए भी वोट डलते हैं। अमरीका में तो ऐसे सरकारी वकील आगे चलकर सांसद भी बनते हैं, और उसे राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के लिए एक रास्ता माना जाता है। स्थानीय जनमत को पूरी तरह कुचलकर केन्द्र या राज्य की राजधानियों से बहुत सी बातें लादी जा सकती हैं, और भारत में भी लादी जाती हैं। हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाएं सड़कों पर झाड़ू लगाने की मशीनी गाडिय़ां थोक में खरीदें या नहीं, इसका फैसला भी राज्य सरकार लेती है। ऐसे ही स्थानीय लीडरशिप के बहुत से हक राज्य सरकारें अपने हाथ में ले लेती हैं, और म्युनिसिपलों से परे विश्वविद्यालयों में भी स्वायत्तता का कोई नाम नहीं रहता।
इसी सिलसिले में इस बात का जिक्र करना अच्छा होगा कि जिस ब्रिटेन के जनमतसंग्रह को लेकर आज दुनिया हिली हुई है, उसी ब्रिटेन में म्युनिसिपल के स्थानीय चुनावों में उन लोगों को भी वोट डालने का हक रहता है जो कि ब्रिटेन के किसी इलाके में छह महीने से अधिक से रह रहे हैं, फिर चाहे वे वहां के नागरिक हों, या न हों। वहां की सोच यह है कि जो लोग उस इलाके में रहते हैं, वे अगर विदेशी भी हैं, तो भी स्थानीय इंतजाम के लिए उनको प्रतिनिधि चुनने का हक रहना चाहिए।
जनमतसंग्रह एक अच्छी बात है, और संसद, विधानसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनावों से परे बहुत से मुद्दों पर इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। शहर की बहुत सी ऐसी बड़ी दानवाकार योजनाएं रहती हैं जिनका फैसला लेने से पहले स्थानीय स्तर पर ऐसा जनमतसंग्रह किया जा सकता है। 

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