केजरीवाल की नौटंकी, थका देने वाली, और अलोकतांत्रिक

संपादकीय
26 जून  2016
दिल्ली आज एक और नाटक देख रही है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लगातार केन्द्र सरकार के साथ एक टकराव बनाकर रखा हुआ है। यह सिलसिला उनके सत्ता में आने के पहले से शुरू हो चुका था, जो आज भी जारी है। इस पूरे दौर में कई मुद्दों पर उनका दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग के साथ लंबा और खुला टकराव चलते रहा, और जंग के खिलाफ अपनी जंग में केजरीवाल ने ऐसी जुबान का इस्तेमाल लगातार किया, जो कि बहुत से लोगों को खली। आज सुबह आम आदमी पार्टी के सारे विधायक दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ प्रधानमंत्री निवास पहुंच रहे थे, और उन्हें उस इलाके में लोगों के इक_े होने के खिलाफ स्थायी रूप से लगे प्रतिबंध को तोडऩे के लिए गिरफ्तार किया गया है। और मनीष सिसोदिया का प्रधानमंत्री निवास जाने का मकसद भी यही था कि वे वहां जाकर एक मामले में गिरफ्तारी देना चाहते थे जो कि अभी तक पुलिस में दर्ज भी नहीं हुआ है।
कल मनीष सिसोदिया के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में सब्जी मंडी के व्यापारियों ने रिपोर्ट लिखाई थी कि सिसोदिया ने उन्हें धमकाया। इस पर पुलिस ने अब तक एफआईआर भी कायम नहीं की थी, और आम आदमी पार्टी के विधायक गिरफ्तारी देने पहुंचे थे। दरअसल दो ही दिन पहले दिल्ली के एक आप विधायक को पुलिस ने मीडिया से बात करने के दौरान ही गिरफ्तार किया था, क्योंकि उसके खिलाफ एक जुर्म दर्ज था, और वह पूछताछ के लिए पुलिस के पास जा नहीं रहा था। मनीष सिसोदिया ने आप विधायकों पर कार्रवाई को लेकर मोदी के नाम यह ट्वीट किया है- मोदीजी आपकी हमसे दुश्मनी है, हमें गिरफ्तार कर लो, पर दिल्ली के काम मत रोको। हम सब आपके सामने सरेंडर करने आ रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल की शक्ल में दिल्ली को एक राजनीतिक विकल्प मिला था, और वहां के लोगों ने परंपरागत दोनों पार्टियों को खारिज करते हुए एक शानदार बहुमत से आम आदमी पार्टी को सत्ता दे दी थी। दिल्ली से परे पंजाब में भी इस पार्टी को कुछ कामयाबी मिली थी, और पंजाब में आने वाले चुनाव को लेकर आप की संभावनाएं दिख भी रही हैं। ऐसे में केजरीवाल का आज सुबह का यह नाटक हमारे हिसाब से इस पार्टी की पंजाब की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएगा, और दिल्ली की बाद की संभावनाओं को भी। देश में कानून का राज लाने की बात करने वाले और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के लिए लोकपाल के मंत्र को सत्ता में आने के पहले तक दिन में सौ-सौ बार दुहराने वाले अरविंद केजरीवाल आज अगर यह चाहते हैं कि उनकी पार्टी के विधायकों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने पर भी कार्रवाई न हो, तो यह लोकतंत्र में मुमकिन नहीं है। हो सकता है कि केन्द्र के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस राजनीतिक दबाव में भाजपाविरोधी आप विधायकों के खिलाफ गलत कार्रवाई कर रही हो, लेकिन यह नौबत तो देश के हर राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच आ सकती है, और हो सकता है कि हो भी। लेकिन क्या पुलिस की किसी कार्रवाई के पहले ही, जुर्म भी कायम होने के पहले ही उपमुख्यमंत्री गिरफ्तारी देने प्रधानमंत्री-निवास पर पहुंचते रहें? केजरीवाल की नौटंकी का यह सिलसिला थका देने वाला है। क्या दिल्ली के लोगों को यह हक नहीं है कि वे केजरीवाल के विधायकों या मंत्रियों के खिलाफ शिकायत कर सकें? और अगर ऐसी शिकायत पर किसी कार्रवाई की जरूरत हो, तो क्या पुलिस कार्रवाई न करे? और क्या दिल्ली की जिंदगी ऐसे ही फिजूल के नाटकों से घिरी रहे?
दुनिया इस बात को जानती है कि अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट तक के बड़े-बड़े वकीलों का मशविरा हासिल है, और ऐसे में अगर वे पुलिस और अदालत का सामना करने के बजाय एक पुलिस-शिकायत के खिलाफ आत्मसमर्पण करने प्रधानमंत्री-निवास अपने लोगों को भेज रहे हैं, तो इसके पीछे कौन सा तर्क है? ऐसे कुतर्क का काम ठीक नहीं हैं, और इससे देश में एक वैकल्पिक राजनीतिक पसंद की संभावना भी खत्म हो रही है। लोकतंत्र में मोर्चे कई तरह के रहते हैं, वे सरकार की टेबिलों पर रहते हैं, संसद या विधानसभाओं की सदनों में रहते हैं, मीडिया के बीच बात रखकर रहते हैं, अदालतों में अपील दायर करके, या जवाब देकर भी रहते हैं, और सड़क की लड़ाई के भी रहते हैं। लेकिन केजरीवाल के आत्मघाती तेवर सिर्फ सतही लड़ाई के दिख रहे हैं, और यह बात उन्हें भारत जैसी लोकतांत्रिक-संसदीय राजनीति में बहुत दूर तक नहीं ले जा सकती।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें