स्वामी, जेठमलानी, अमर सिंह जैसे लोग संगठन लायक नहीं

संपादकीय
27 जून  2016
भाजपा के राज्यसभा में अभी-अभी गए सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जिस अंदाज में सरकार के एक-एक ओहदे को छांटकर उस पर सार्वजनिक निशानेबाजी चला रखी है, वह भाजपा के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी की नौबत भी है, और हैरानी की बात भी है। यह हैरानी लोगों को है कि भाजपा राम जेठमलानी, या सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों को क्यों पार्टी में लाती है, या क्यों राज्यसभा पहुंचाती है जो कि बेकाबू हैं, बागी हैं, और पूरी तरह अराजक मिजाज के हैं। इन दोनों को लेकर भाजपा पहले भी अपने हाथ जला चुकी है, और सुब्रमण्यम स्वामी को राज्यसभा भेजने के काफी पहले से ये सार्वजनिक रूप से केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली को देश का एक वित्तीय अपराधी, या वित्तीय अपराधियों का रहनुमान बताते हुए लगातार उनके खिलाफ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठियां लिखते आ रहे थे, और केन्द्र सरकार के लिए असुविधा खड़ी करने को उन्होंने अपना पेशा ही बना रखा था। अब पता नहीं क्या सोचकर भाजपा ने उनको राज्यसभा भेजा।
ऐसा कई पार्टियों के साथ होता है, समाजवादी पार्टी में हाल ही में स्वघोषित दलाल अमर सिंह को पार्टी में दाखिला दिया और राज्यसभा भेजा। हो सकता है कि उत्तरप्रदेश चुनाव के लिए लंबी-चौड़ी रकम का इंतजाम करने के लिए पार्टी को दलालों की जरूरत हो, या कोई और वजह हो, लेकिन अमर सिंह ने पिछले बरसों में समाजवादी पार्टी के लिए जितने किस्म की शर्मिंदगी खड़ी की थी, उसे देखते हुए, उनके संदिग्ध और रहस्यमय सौदों को देखते हुए, देश से लेकर विदेश तक नेताओं की खरीदी-बिक्री के उन पर आरोपों को देखते हुए, अपने साथ की महिलाओं के खिलाफ ओछी और अश्लील बातों की उनकी रिकॉर्डिंग को देखते हुए, यह हैरानी होती है कि कोई पार्टी आखिर क्या सोचकर ऐसे लोगों को दाखिला देती है?
हमारा ख्याल है कि कुछ लोग अपनी तबाही की ताकत के गुरूर में पार्टी संगठन को पांवपोंछना समझते हैं, और पार्टी से आते-जाते रहते हैं, और वे किसी संगठन के तहत काम करने के आदी नहीं रहते। इस बात को समझना हो तो कब्ज के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाले जमालघोटे के बीज से समझा जा सकता है कि उसे खाकर पेट नहीं भरा जा सकता, भरा हुआ पेट खाली जरूर किया जा सकता है। स्वामी और जेठमलानी किसी ढांचे को गिराने वाले बुलडोजर की तरह काम जरूर कर सकते हैं, लेकिन वे इमारत को खड़ा करने के लिए इस्तेमाल होने वाली क्रेन की तरह काम नहीं कर सकते। आज भाजपा में सुब्रमण्यम स्वामी को लेकर खासा विरोध चल रहा है, और लोगों को इस बात की हैरानी है कि अपनी ही पार्टी के मंत्री, या अपनी ही पार्टी की सरकार के महत्वपूर्ण लोगों के खिलाफ स्वामी को ऐसा अभियान क्यों चलाने दिया जा रहा है? ऐसे लोगों के लिए एक शब्द, चिरअसंतोषी इस्तेमाल किया जाता है। न महज भाजपा को, बल्कि तमाम पार्टियों को ऐसे लोगों से परहेज करना चाहिए जो कि संगठन के ढांचे को पिंजरे की कैद समझते हों। हालांकि हम ऐसे बागी तेवरों के खिलाफ नहीं हैं, क्योंकि संगठनों से परे जब ऐसे लोग खतरे झेलते हुए भी भ्रष्टाचार या किसी बुराई के खिलाफ खड़े होने का दमखम रखते हैं, अदालतों तक लंबी लड़ाई लड़ते हैं, तो वह काम कई बार संगठन नहीं कर पाते, क्योंकि वे बेबसी में कई किस्म के समझौते करते रहते हैं।

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