शब्दों के बीच का अनबोला, अनकहा, और अनपूछा...

संपादकीय
28 जून  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल एक अंगे्रजी समाचार चैनल टाईम्स नाऊ के मुखिया अर्नब गोस्वामी को एक इंटरव्यू दिया, तो उसमें उन्होंने जितनी बातें कहीं, उन पर तो कल रात से ही चर्चा शुरू हो गई, लेकिन दो और बातों पर जमकर चर्चा चल रही है कि कल कही बातों के पहले इतने वक्त से मोदी बहुत से जलते-सुलगते मुद्दों पर क्यों नहीं बोल रहे थे, और चुप क्यों थे? और दूसरी चर्चा यह शुरू हुई कि इंटरव्यू ले रहे बड़बोले और हमलावर तेवर वाले अर्नब गोस्वामी ने बहुत से सहज सूझते सवाल क्यों नहीं किए? कुछ बड़े अखबारनवीसों ने ऐसे संभावित सवालों की पूरी लिस्ट लिख डाली है जो कि कोई मामूली समझ वाला पत्रकार भी पूछ लेता, और जो कि इस नामी-गिरामी आत्ममुग्ध टीवी पत्रकार ने नहीं पूछे।
जो सवाल इस इंटरव्यू के खत्म होने के बाद उठ रहे हैं, वे उठना जायज हैं क्योंकि जब इतने बड़े ओहदे पर बैठा हुआ कोई नेता दर्जनों मुद्दों पर बोलता है, तो देश और दुनिया सुनते हैं। फिर जब कोई आमतौर पर हमलावर रहने वाला और आत्मप्रशंसक पत्रकार इस मुनादी के साथ इंटरव्यू शुरू करता है कि यह भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का किसी भी भारतीय चैनल को दिया हुआ पहला इंटरव्यू है, तो फिर लोगों की उम्मीदें इस महत्व के मुताबिक जागती हैं, और देखने-सुनने वाले लोग यह भांप लेते हैं कि कौन-कौन से बहुत ही स्वाभाविक रूप से उठने वाले सवाल नहीं पूछे गए।
दरअसल सवाल हों, या कि जवाब, इंटरव्यू हो, या कि कोई भाषण, चौकन्नी दुनिया में ये सब दर्ज होते जाता है कि बोलने की किस-किस मौके पर चुप रहा गया, और किस-किस मौके पर चुप रहकर दूसरे को बोलने का मौका देने के बजाय, खुद इंटरव्यू लेने वाला बोलते रह गया। अर्नब गोस्वामी इस बात के लिए भारी बदनाम हैं कि वे अपने कार्यक्रम में आमंत्रित लोगों को कुछ भी नहीं बोलने देते, और पूरे वक्त खुद ही बोलते चलते हैं। उनके इस मिजाज को लेकर अनगिनत लतीफे चलते हैं, और लोग लगातार उनके खिलाफ टीवी पर भी बोलते हैं। लेकिन जैसा कि किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में होता है, बदनाम होने से नाम तो होता ही है, ऐसा ही टीवी के लोगों को लेकर विवाद छिडऩे से भी होता है। अब मोदी का यह इंटरव्यू अगर ऐसे विवाद के बिना रहता, तो वह कल शाम ही आया-गया हो जाता। यह विवाद छिडऩे से ही अब वह कई दिनों तक खबरों में बने रहेगा। नेताओं या दूसरे महत्वपूर्ण लोगों की तो यह जिम्मेदारी नहीं होती कि वे खुद अपने लिए असुविधा की बातें करें, लेकिन उनसे इंटरव्यू लेने वालों की यह जिम्मेदारी जरूर होती है कि वे असुविधा की बातों से परहेज न करें, और उन लोगों को सस्ते में न छोड़ें जिनको बहुत से मुद्दों पर अपनी बात बोलने का मौका दिया जा रहा है। शब्दों के बीच का अनबोला, अनकहा, और अनपूछा भी बड़ी बारीकी से दर्ज होता है, और मीडिया के लोगों को यह याद रखना चाहिए। 

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