मथुरा में ऐसी अराजकता चलने क्यों दी जा रही थी?

संपादकीय
3 जून  2016
उत्तरप्रदेश के मथुरा में सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन बरसों से कब्जा जमाए हुए अराजक लोगों के एक समुदाय को हटाने के लिए जब अदालती आदेश पर पुलिस वहां पहुंची, तो इस समुदाय ने पुलिस पर अप्रत्याशित गोलीबारी करना शुरू कर दिया, जिसमें दो पुलिस अफसर मारे गए। बाद में पुलिस ने जवाबी गोलियां चलाईं, जिसमें करीब 20 लोगों के मारे जाने की खबर है। यह समुदाय एक धार्मिक-आध्यात्मिक किस्म का समुदाय था जो कि भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ बहुत सी सिरफिरी मांगों को करते हुए अपने कब्जे की जमीन पर अपने आपको एक अलग राष्ट्र या अलग शासन जैसा समझ रहा था और कहने के लिए अपने आपको सत्याग्रही भी कहता था। खबरों में यह आया है कि अभी दो बरस पहले तक यह समुदाय उत्तरप्रदेश के एक दूसरे गुरू, जय गुरूदेव के अनुयायियों का था, जो कि अलग होकर यह नया समुदाय बना चुके थे। यह समुदाय भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव रद्द करने की मांग कर रहा था, और भारतीय नोटों की जगह आजाद हिन्द फौज की करेंसी चलाने, एक रूपए में साठ लीटर डीजल या चालीस लीटर पेट्रोल देने की मांग कर रहा था। इसके हजारों लोग लगातार सरकारी कर्मचारियों से, सरकार के दफ्तरों से टकराव ले रहे थे, और अपने आपको एक अलग कानून बता रहे थे। यह सिलसिला बरसों से चले आ रहा था।
यह हैरानी की बात है कि उत्तरप्रदेश की सरकार ऐसी अराजकता को बरसों से बर्दाश्त करते आ रही थी, और आजाद भारत विधिक वैचारिक सत्याग्रही नाम के इस संगठन की ताकत इतनी बढऩे के पहले इसे हटाने का हौसला सरकार ने नहीं जुटाया था। अपने आपको सत्याग्रही कहने वाले इस समुदाय के लोगों ने हथियार और गोला-बारूद जमा कर रखे थे, और पुलिस के पहुंचने पर उस पर हमला भी किया। खबरों में यह भी आ रहा है कि यहां हथियारों का कारखाना बना रखा था, और इसमें मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ से हथियारों का कारोबार भी चलता था।
लोकतंत्र में जब कभी सरकारें अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से बचती हैं, तो अराजकता और जुर्म को ऐसा ही बढ़ावा मिलता है। लोगों को याद होगा कि बहुत पहले अमरीका में अपने आपको ईश्वर मानने वाला एक आदमी ऐसा ही एक बड़ा सा अहाता अपने कब्जे में करके बैठा था, और वहां पर उसे ईश्वर मानने वाले अनुयायी हजारों की संख्या में इक_ा थे। उसके इस डेरे की लंबी नाकाबंदी के बाद जब सुरक्षा बलों ने उस पर कार्रवाई की थी तो कई अफसर मारे गए थे, और इस समुदाय के लोग भी। दोनों तरफ से बड़े-बड़े हथियारों का इस्तेमाल हुआ था, और 51 दिनों तक यह कब्जा चला था। फिर अभी साल भर पहले हरियाणा में रामपाल नाम के एक गुरू ने इसी तरह से अपने आश्रम को हथियारबंद अड्डा बना लिया था और पुलिस को भारी मशक्कत के बाद उस पर कब्जा करके इस गुरू को गिरफ्तार करना पड़ा था।
आमतौर पर ऐसे सम्प्रदायों, समुदायों, और गुरूओं के प्रभाव के वोट पाने की उम्मीद में सत्तारूढ़ नेता इन पर सरकारी कार्रवाई होने नहीं देते, और विपक्ष के नेता इन गुरुओं की आपराधिक ताकत को बढ़ते देखते हुए भी अनदेखा करते चलते हैं। नतीजा यह होता है कि ऐसे गुरू अपने भक्तों से बलात्कार भी करते रहते हैं, उन्हें लूटते भी रहते हैं, उनसे हत्या और दूसरे तरह के जुर्म भी करवाते रहते हैं, और कानून के हाथ उन तक पहुंचने में बरसों की देर भी हो जाती है। आज अगर देखें कि आसाराम को लेकर गिरफ्तार लोग किस तरह के बलात्कार और कत्ल का भांडाफोड़ कर रहे हैं, तो यह समझ आएगा कि कानून से परे की ऐसी धर्मान्ध या अंधविश्वासी ताकत लोगों को अपने आपको कानून और ईश्वर मान लेने का मौका देती है। यह सिलसिला तेजी से खत्म होना चाहिए। आज अगर आसाराम बरसों से जेल में नहीं होता, तो हो सकता है कि और भी बहुत सी नाबालिग बच्चियां तबाह होते रहतीं। आज आसाराम के जेल में रहते हुए भी उसके भक्त देश भर में उसके नाम और तस्वीरों को लेकर सार्वजनिक प्रदर्शन करते ही रहते हैं। हमारा यह पक्का मानना है कि लोकतंत्र की न्याय की बुनियादी जरूरत, बुनियादी शर्त को पूरा न करने वाले लोग अपने जुर्म को ईश्वरीय या दैवीय काम भी मानते हैं। लोकतंत्र में ऐसे बाबाओं और ऐसे सम्प्रदायों के साथ कड़ाई से निपटना चाहिए, न कि इनके जुर्म की, इनके अवैध कब्जों की फेहरिस्त बहुत लंबी हो जाने के बाद। ऐसा एक सम्प्रदाय ऐसे दूसरे सम्प्रदायों को भी बढ़ावा देता है और यह सिलसिला बढऩे नहीं देना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें